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नज़्म
वो सैल-ए-नूर है ख़ीरा है आदमी की नज़र
ब-सद ग़ुरूर-ओ-अदा ख़ंदा-ज़न है गर्दूं पर
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ये नग़्मा क्या है ज़ेर-ए-पर्दा-हा-ए-साज़ कम समझे
रहे सब गोश-बर-आवाज़ लेकिन राज़ कम समझे
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
''कोई माशूक़ ब-सद-शौकत-ओ-नाज़ आता है
सुर्ख़ बैरक़ है समुंदर में जहाज़ आता है''