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नज़्म
हाँ देखा कल हम ने उस को देखने का जिसे अरमाँ था
वो जो अपने शहर से आगे क़र्या-ए-बाग़-ओ-बहाराँ था
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
दिल की न पूछो क्या कुछ चाहे दिल का तो फैला है दामन
गीत से गाल ग़ज़ल सी आँखें साअद-ए-सीमीं बर्ग-ए-दहन
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
भड़के इक आह कहा चाँद ने यूँ ज़ोहरा से
ऐ निगार-ए-रुख़-ए-ज़ेबा-ए-बहार-ए-अफ़्लाक
तसद्द्क़ हुसैन ख़ालिद
नज़्म
शहीदान-ए-वफ़ा के क़तरा-ए-ख़ूँ काम आएँगे
उरूस-ए-मस्जिद-ए-ज़ेबा को अफ़्शाँ की ज़रूरत है
शिबली नोमानी
नज़्म
उसूल-ए-तंदुरुस्ती पर अगर दाइम चले इंसाँ
मिसाल-ए-नख़्ल बाग़-ए-बे-ख़िज़ाँ फूले फले इंसाँ
उफ़ुक़ लखनवी
नज़्म
कली से कह रही थी एक दिन शबनम गुलिस्ताँ में
रही मैं एक मुद्दत ग़ुंचा-हा-ए-बाग़-ए-रिज़वाँ में