aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "baithaane"
फ़क़त हिस्से की ख़ातिरकट गई ये ज़िंदगी मीलाद सुनने मेंबिला जाने कि हिस्सा है तो कैसा और कितनाये सब आसाँ नहीं थागुलाब और इत्र से भारी फ़ज़ा में साँस लेनादेर तक आसाँ नहीं थान आसाँ था समझने की अदाकारी भी करनाउस ज़बाँ कोजिस से मैं ना-आश्ना था और वो भी बा-अदब रह करबहुत भारी था बेले का वो गजराजो पहनाया गया था मुझ को अगली सफ़ में बैठाने से पहलेहाँ सज़ा जैसा था मेरा बैठना उस सफ़ मेंजिस में एक भी बच्चा नहीं थाऔर जहाँ से दूर थीं सब चिलमनेंऔर उन से छनती रौनक़ेंये सब क़ुर्बानियाँ दे कर अगर हिस्से की ख़्वाहिश है मुझे तो क्या ग़लत हैमिरे हिस्से की ख़्वाहिश पर हँसो मतमिरा हिस्सा तो पक्का है अगर मैं सो भी जाऊँख़ुदा को सब पता है
ख़ुदातू ने मुझे घोड़ा बनाया तोमगर बारात काजिस के आगे नाचते रहते हैं लोगनोट दाँतों में दबाएक्या नज़र में हैं तिरी वो ज़ुल्मजो मुझ पर हुए हैं इस करम की आड़ मेंरेस के मैदान के बदलेकिसी मंडप तलक का ये सफ़रकितना थका देता है मुझ कोक्या तुझे मा'लूम हैक्या तुझे मा'लूम है दूल्हे का बोझउस को बैठाने की ज़िम्मेदारियाँऔर उस पर इस क़दर हस्सास दिलजो समझ सकता है इस दिन के म'आनी क्या हैं दूल्हे के लिएकोई कैसा भी पटाख़ा छोड़ दे पैरों में मेरेशोर से बाजे के मेरे कान भी फट जाएँ तो क्याचाल में अपनी ज़रा सा फ़र्क़ मैं आने न दूँगापीठ पर बैठे हुए दूल्हे की 'इज़्ज़त मेरी 'इज़्ज़तहाँ मगर ये भी ख़याल आता है अक्सरमैं तो हर ज़िल्लत उठा करअपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करूँगा और करता आ रहा हूँतू मगर कब इस तरह सोचेगा उस मख़्लूक़ के बारे मेंजो तेरी अमाँ में है
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगीजब अर्ज़-ए-ख़ुदा के काबे सेसब बुत उठवाए जाएँगेहम अहल-ए-सफ़ा मरदूद-ए-हरममसनद पे बिठाए जाएँगेसब ताज उछाले जाएँगेसब तख़्त गिराए जाएँगेबस नाम रहेगा अल्लाह काजो ग़ाएब भी है हाज़िर भीजो मंज़र भी है नाज़िर भीउट्ठेगा अनल-हक़ का नाराजो मैं भी हूँ और तुम भी हो
किसी के दूर जाने सेतअ'ल्लुक़ टूट जाने सेकिसी के मान जाने सेकिसी के रूठ जाने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी को आज़माने सेकिसी के आज़माने सेकिसी को याद रखने सेकिसी को भूल जाने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी को छोड़ देने सेकिसी के छोड़ जाने सेना शम्अ' को जलाने सेना शम्अ' को बुझाने सेमुझे अब डर नहीं लगताअकेले मुस्कुराने सेकभी आँसू बहाने सेना इस सारे ज़माने सेहक़ीक़त से फ़साने सेमुझे अब डर नहीं लगताकिसी की ना-रसाई सेकिसी की पारसाई सेकिसी की बेवफ़ाई सेकिसी दुख इंतिहाई सेमुझे अब डर नहीं लगताना तो इस पार रहने सेना तो उस पार रहने सेना अपनी ज़िंदगानी सेना इक दिन मौत आने सेमुझे अब डर नहीं लगता
फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूँढे हम ने बहाने होंफ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सच-मुच के मय-ख़ाने हों
सुनो मेरी कहानी पर मियाँ मेरी कहानी क्यामैं यकसर राइगानी हूँ हिसाब-ए-राइगानी क्याबहुत कुछ था कभी शायद पर अब कुछ भी नहीं हूँ मैंन अपना हम-नफ़स हूँ मैं न अपना हम-नशीं हूँ मैंकभी की बात है फ़रियाद मेरा वो कभी यानीनहीं इस का कोई मतलब नहीं इस के कोई मअनीमैं अपने शहर का सब से गिरामी नाम लड़का थामैं बे-हंगाम लड़का था मैं सद-हंगाम लड़का थामिरे दम से ग़ज़ब हंगामा रहता था मोहल्लों मेंमैं हश्र-आग़ाज़ लड़का था मैं हश्र-अंजाम लड़का थामिरे हिन्दू मुसलमाँ सब मुझे सर पर बिठाते थेउन्ही के फ़ैज़ से मअनी मुझे मअनी सिखाते थेसुख़न बहता चला आता है बे-बाइस के होंटों सेवो कुछ कहता चला आता है बे-बाइस के होंटों सेमैं अशराफ़-ए-कमीना-कार को ठोकर पे रखता थासो मैं मेहनत-कशों की जूतियाँ मिम्बर पे रखता थामैं शायद अब नहीं हूँ वो मगर अब भी वही हूँ मैंग़ज़ब हंगामा-परवर ख़ीरा-सरा अब भी वही हूँ मैंमगर मेरा था इक तौर और भी जो और ही कुछ थामगर मेरा था इक दौर और भी जो और ही कुछ थामैं अपने शहर-ए-इल्म-ओ-फ़न का था इक नौजवाँ काहिनमिरे तिल्मीज़-ए-इल्म-ओ-फ़न मिरे बाबा के थे हम-सिनमिरा बाबा मुझे ख़ामोश आवाज़ें सुनाता थावो अपने-आप में गुम मुझ को पुर-हाली सिखाता था
गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्तगर मुझे इस का यक़ीं हो कि तिरे दिल की थकनतिरी आँखों की उदासी तेरे सीने की जलनमेरी दिल-जूई मिरे प्यार से मिट जाएगीगर मिरा हर्फ़-ए-तसल्ली वो दवा हो जिस सेजी उठे फिर तिरा उजड़ा हुआ बे-नूर दिमाग़तेरी पेशानी से ढल जाएँ ये तज़लील के दाग़तेरी बीमार जवानी को शिफ़ा हो जाएगर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मरे दोस्तरोज़ ओ शब शाम ओ सहर मैं तुझे बहलाता रहूँमैं तुझे गीत सुनाता रहूँ हल्के शीरींआबशारों के बहारों के चमन-ज़ारों के गीतआमद-ए-सुब्ह के, महताब के, सय्यारों के गीततुझ से मैं हुस्न-ओ-मोहब्बत की हिकायात कहूँकैसे मग़रूर हसीनाओं के बरफ़ाब से जिस्मगर्म हाथों की हरारत में पिघल जाते हैंकैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नुक़ूशदेखते देखते यक-लख़्त बदल जाते हैंकिस तरह आरिज़-ए-महबूब का शफ़्फ़ाफ़ बिलोरयक-ब-यक बादा-ए-अहमर से दहक जाता हैकैसे गुलचीं के लिए झुकती है ख़ुद शाख़-ए-गुलाबकिस तरह रात का ऐवान महक जाता हैयूँही गाता रहूँ गाता रहूँ तेरी ख़ातिरगीत बुनता रहूँ बैठा रहूँ तेरी ख़ातिरपर मिरे गीत तिरे दुख का मुदावा ही नहींनग़्मा जर्राह नहीं मूनिस-ओ-ग़म ख़्वार सहीगीत नश्तर तो नहीं मरहम-ए-आज़ार सहीतेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवाऔर ये सफ़्फ़ाक मसीहा मिरे क़ब्ज़े में नहींइस जहाँ के किसी ज़ी-रूह के क़ब्ज़े में नहींहाँ मगर तेरे सिवा तेरे सिवा तेरे सिवा
तुम्हारी क़ब्र परमैं फ़ातिहा पढ़ने नहीं आयामुझे मालूम थातुम मर नहीं सकतेतुम्हारी मौत की सच्ची ख़बर जिस ने उड़ाई थीवो झूटा थावो तुम कब थेकोई सूखा हुआ पत्ता हवा से मिल के टूटा थामिरी आँखेंतुम्हारे मंज़रों में क़ैद हैं अब तकमैं जो भी देखता हूँसोचता हूँवो वही हैजो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थीकहीं कुछ भी नहीं बदलातुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में साँस लेते हैंमैं लिखने के लिएजब भी क़लम काग़ज़ उठाता हूँतुम्हें बैठा हुआ मैं अपनी ही कुर्सी में पाता हूँबदन में मेरे जितना भी लहू हैवो तुम्हारीलग़्ज़िशों नाकामियों के साथ बहता हैमिरी आवाज़ में छुप करतुम्हारा ज़ेहन रहता हैमिरी बीमारियों में तुममिरी लाचारियों में तुमतुम्हारी क़ब्र पर जिस ने तुम्हारा नाम लिखा हैवो झूटा हैतुम्हारी क़ब्र में मैं दफ़्न हूँतुम मुझ में ज़िंदा होकभी फ़ुर्सत मिले तो फ़ातिहा पढ़ने चले आना
वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइंदा भीमगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल औरमहके हुए रुकएकिताबें माँगने गिरने उठाने के बहाने रिश्ते बनते थेउन का क्या होगावो शायद अब नहीं होंगे!
हक़ बात पे कोड़े और ज़िंदाँ बातिल के शिकंजे में है ये जाँइंसाँ हैं कि सहमे बैठे हैं खूँ-ख़्वार दरिंदे हैं रक़्साँइस ज़ुल्म-ओ-सितम को लुत्फ़-ओ-करम इस दुख को दवा क्या लिखनाज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
इक रोज़ मगर बरखा-रुत में वो भादों थी या सावन थादीवार पे बीच समुंदर के ये देखने वालों ने देखामस्ताना हाथ में हाथ दिए ये एक कगर पर बैठे थेयूँ शाम हुई फिर रात हुई जब सैलानी घर लौट गएक्या रात थी वो जी चाहता है उस रात पे लिक्खें अफ़सानाइस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना
बेकारी में ज़ात के ज़ख़्मों की सोज़िश को और बढ़ानेतेज़-रवी की राहगुज़र से
आज के नामऔरआज के ग़म के नामआज का ग़म कि है ज़िंदगी के भरे गुलसिताँ से ख़फ़ाज़र्द पत्तों का बनज़र्द पत्तों का बन जो मिरा देस हैदर्द की अंजुमन जो मिरा देस हैक्लरकों की अफ़्सुर्दा जानों के नामकिर्म-ख़ुर्दा दिलों और ज़बानों के नामपोस्ट-मैनों के नामताँगे वालों का नामरेल-बानों के नामकार-ख़ानों के भूके जियालों के नामबादशाह-ए-जहाँ वाली-ए-मा-सिवा, नाएब-उल-अल्लाह फ़िल-अर्ज़दहक़ाँ के नामजिस के ढोरों को ज़ालिम हँका ले गएजिस की बेटी को डाकू उठा ले गएहाथ भर खेत से एक अंगुश्त पटवार ने काट ली हैदूसरी मालिये के बहाने से सरकार ने काट ली हैजिस की पग ज़ोर वालों के पाँव-तलेधज्जियाँ हो गई हैउन दुखी माओं के नामरात में जिन के बच्चे बिलकते हैं औरनींद की मार खाए हुए बाज़ुओं में सँभलते नहींदुख बताते नहींमिन्नतों ज़ारियों से बहलते नहीं
लाख बैठे कोई छुप-छुप के कमीं-गाहों मेंख़ून ख़ुद देता है जल्लादों के मस्कन का सुराग़साज़िशें लाख उड़ाती रहीं ज़ुल्मत की नक़ाबले के हर बूँद निकलती है हथेली पे चराग़
मैं जब भीज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तप करमैं जब भीदूसरों के और अपने झूट से थक करमैं सब से लड़ के ख़ुद से हार केजब भी उस एक कमरे में जाता थावो हल्के और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरावो बेहद मेहरबाँ कमराजो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता थाजैसे कोई माँबच्चे को आँचल में छुपा लेप्यार से डाँटेये क्या आदत हैजलती दोपहर में मारे मारे घूमते हो तुमवो कमरा याद आता हैदबीज़ और ख़ासा भारीकुछ ज़रा मुश्किल से खुलने वाला वो शीशम का दरवाज़ाकि जैसे कोई अक्खड़ बापअपने खुरदुरे सीने मेंशफ़क़त के समुंदर को छुपाए होवो कुर्सीऔर उस के साथ वो जुड़वाँ बहन उस कीवो दोनोंदोस्त थीं मेरीवो इक गुस्ताख़ मुँह-फट आईनाजो दिल का अच्छा थावो बे-हँगम सी अलमारीजो कोने में खड़ीइक बूढ़ी अन्ना की तरहआईने को तंबीह करती थीवो इक गुल-दाननन्हा साबहुत शैतानउन दिनों पे हँसता थादरीचाया ज़ेहानत से भरी इक मुस्कुराहटऔर दरीचे पर झुकी वो बेलकोई सब्ज़ सरगोशीकिताबेंताक़ में और शेल्फ़ परसंजीदा उस्तानी बनी बैठींमगर सब मुंतज़िर इस बात कीमैं उन से कुछ पूछूँसिरहानेनींद का साथीथकन का चारा-गरवो नर्म-दिल तकियामैं जिस की गोद में सर रख केछत को देखता थाछत की कड़ियों मेंन जाने कितने अफ़्सानों की कड़ियाँ थींवो छोटी मेज़ परऔर सामने दीवार परआवेज़ां तस्वीरेंमुझे अपनाइयत से और यक़ीं से देखती थींमुस्कुराती थींउन्हें शक भी नहीं थाएक दिनमैं उन को ऐसे छोड़ जाऊँगामैं इक दिन यूँ भी जाऊँगाकि फिर वापस न आऊँगा
दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमीऔर मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमीज़रदार-ए-बे-नवा है सो है वो भी आदमीनेमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमीटुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमीअब्दाल, क़ुतुब ओ ग़ौस वली-आदमी हुएमुंकिर भी आदमी हुए और कुफ़्र के भरेक्या क्या करिश्मे कश्फ़-ओ-करामात के लिएहत्ता कि अपने ज़ोहद-ओ-रियाज़त के ज़ोर सेख़ालिक़ से जा मिला है सो है वो भी आदमीफ़िरऔन ने किया था जो दावा ख़ुदाई काशद्दाद भी बहिश्त बना कर हुआ ख़ुदानमरूद भी ख़ुदा ही कहाता था बरमलाये बात है समझने की आगे कहूँ मैं क्यायाँ तक जो हो चुका है सो है वो भी आदमीकुल आदमी का हुस्न ओ क़ुबह में है याँ ज़ुहूरशैताँ भी आदमी है जो करता है मक्र-ओ-ज़ोरऔर हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमीमस्जिद भी आदमी ने बनाई है याँ मियाँबनते हैं आदमी ही इमाम और ख़ुत्बा-ख़्वाँपढ़ते हैं आदमी ही क़ुरआन और नमाज़ियाँऔर आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँजो उन को ताड़ता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी पे जान को वारे है आदमीऔर आदमी पे तेग़ को मारे है आदमीपगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमीचिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमीऔर सुन के दौड़ता है सो है वो भी आदमीचलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो ले के मालऔर आदमी ही मारे है फाँसी गले में डालयाँ आदमी ही सैद है और आदमी ही जालसच्चा भी आदमी ही निकलता है मेरे लालऔर झूट का भरा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही शादी है और आदमी बियाहक़ाज़ी वकील आदमी और आदमी गवाहताशे बजाते आदमी चलते हैं ख़्वाह-मख़ाहदौड़े हैं आदमी ही तो मशअ'ल जला के राहऔर ब्याहने चढ़ा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी नक़ीब हो बोले है बार बारऔर आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवारहुक़्क़ा सुराही जूतियाँ दौड़ें बग़ल में मारकाँधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहारऔर उस में जो पड़ा है सो है वो भी आदमीबैठे हैं आदमी ही दुकानें लगा लगाऔर आदमी ही फिरते हैं रख सर पे ख़ूनचाकहता है कोई लो कोई कहता है ला रे लाकिस किस तरह की बेचें हैं चीज़ें बना बनाऔर मोल ले रहा है सो है वो आदमीतबले मजीरे दाएरे सारंगियाँ बजागाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा-ब-जारंडी भी आदमी ही नचाते हैं गत लगाऔर आदमी ही नाचे हैं और देख फिर मज़ाजो नाच देखता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही लाल-ओ-जवाहर में बे-बहाऔर आदमी ही ख़ाक से बद-तर है हो गयाकाला भी आदमी है कि उल्टा है जूँ तवागोरा भी आदमी है कि टुकड़ा है चाँद-साबद-शक्ल बद-नुमा है सो है वो भी आदमीइक आदमी हैं जिन के ये कुछ ज़र्क़-बर्क़ हैंरूपे के जिन के पाँव हैं सोने के फ़र्क़ हैंझमके तमाम ग़र्ब से ले ता-ब-शर्क़ हैंकम-ख़्वाब ताश शाल दो-शालों में ग़र्क़ हैंऔर चीथडों लगा है सो है वो भी आदमीहैराँ हूँ यारो देखो तो क्या ये स्वाँग हैऔर आदमी ही चोर है और आपी थांग हैहै छीना झपटी और बाँग ताँग हैदेखा तो आदमी ही यहाँ मिस्ल-ए-रांग हैफ़ौलाद से गढ़ा है सो है वो भी आदमीमरने में आदमी ही कफ़न करते हैं तयारनहला-धुला उठाते हैं काँधे पे कर सवारकलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ारसब आदमी ही करते हैं मुर्दे के कारोबारऔर वो जो मर गया है सो है वो भी आदमीअशराफ़ और कमीने से ले शाह-ता-वज़ीरये आदमी ही करते हैं सब कार-ए-दिल-पज़ीरयाँ आदमी मुरीद है और आदमी ही पीरअच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ 'नज़ीर'और सब में जो बुरा है सो है वो भी आदमी
तेरी साँसों की थकन तेरी निगाहों का सुकूतदर-हक़ीक़त कोई रंगीन शरारत ही न होमैं जिसे प्यार का अंदाज़ समझ बैठा हूँवो तबस्सुम वो तकल्लुम तिरी आदत ही न हो
शायद मिरी उल्फ़त को बहुत याद करोगीअपने दिल-ए-मा'सूम को नाशाद करोगीआओगी मिरी गोर पे तुम अश्क बहानेनौ-ख़ेज़ बहारों के हसीं फूल चढ़ाने
ऐ अन्फ़ुस ओ आफ़ाक़ में पैदा तिरी आयातहक़ ये है कि है ज़िंदा ओ पाइंदा तिरी ज़ातमैं कैसे समझता कि तू है या कि नहीं हैहर दम मुतग़य्यर थे ख़िरद के नज़रियातमहरम नहीं फ़ितरत के सुरूद-ए-अज़ली सेबीना-ए-कवाकिब हो कि दाना-ए-नबातातआज आँख ने देखा तो वो 'आलम हुआ साबितमैं जिस को समझता था कलीसा के ख़ुराफ़ातहम बंद-ए-शब-ओ-रोज़ में जकड़े हुए बंदेतू ख़ालिक़-ए-आसार-ओ-निगारंदा-ए-आनातइक बात अगर मुझ को इजाज़त हो तो पूछूँहल कर न सके जिस को हकीमों के मक़ालातजब तक मैं जिया ख़ेमा-ए-अफ़्लाक के नीचेकाँटे की तरह दिल में खटकती रही ये बातगुफ़्तार के उस्लूब पे क़ाबू नहीं रहताजब रूह के अंदर मुतलातुम हों ख़यालातवो कौन सा आदम है कि तू जिस का है मा'बूदवो आदम-ए-ख़ाकी कि जो है ज़ेर-ए-समावातमशरिक़ के ख़ुदावंद सफ़ेदान-ए-रंगीमग़रिब के ख़ुदावंद दरख़्शंदा फ़िलिज़्ज़ातयूरोप में बहुत रौशनी-ए-इल्म-ओ-हुनर हैहक़ ये है कि बे-चश्मा-ए-हैवाँ है ये ज़ुल्मातरानाई-ए-तामीर में रौनक़ में सफ़ा मेंगिरजों से कहीं बढ़ के हैं बैंकों की इमारातज़ाहिर में तिजारत है हक़ीक़त में जुआ हैसूद एक का लाखों के लिए मर्ग-ए-मुफ़ाजातये 'इल्म ये हिकमत ये तदब्बुर ये हुकूमतपीते हैं लहू देते हैं तालीम-ए-मुसावातबेकारी ओ 'उर्यानी ओ मय-ख़्वारी ओ इफ़्लासक्या कम हैं फ़रंगी मदनियत की फ़ुतूहातवो क़ौम कि फ़ैज़ान-ए-समावी से हो महरूमहद उस के कमालात की है बर्क़ ओ बुख़ारातहै दिल के लिए मौत मशीनों की हुकूमतएहसास-ए-मुरव्वत को कुचल देते हैं आलातआसार तो कुछ कुछ नज़र आते हैं कि आख़िरतदबीर को तक़दीर के शातिर ने किया मातमय-ख़ाना की बुनियाद में आया है तज़लज़ुलबैठे हैं इसी फ़िक्र में पीरान-ए-ख़राबातचेहरों पे जो सुर्ख़ी नज़र आती है सर-ए-शामया ग़ाज़ा है या साग़र ओ मीना की करामाततू क़ादिर ओ 'आदिल है मगर तेरे जहाँ मेंहैं तल्ख़ बहुत बंदा-ए-मज़दूर के औक़ातकब डूबेगा सरमाया-परस्ती का सफ़ीनादुनिया है तिरी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-मुकाफ़ात
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