aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bargad"
यही जगह थी यही दिन था और यही लम्हातसरों पे छाई थी सदियों से इक जो काली रातइसी जगह इसी दिन तो मिली थी उस को मातइसी जगह इसी दिन तो हुआ था ये एलानअँधेरे हार गए ज़िंदाबाद हिन्दोस्तानयहीं तो हम ने कहा था ये कर दिखाना हैजो ज़ख़्म तन पे है भारत के उस को भरना हैजो दाग़ माथे पे भारत के है मिटाना हैयहीं तो खाई थी हम सब ने ये क़सम उस दिनयहीं से निकले थे अपने सफ़र पे हम उस दिनयहीं था गूँज उठा वन्दे-मातरम उस दिनहै जुरअतों का सफ़र वक़्त की है राहगुज़रनज़र के सामने है साठ मील का पत्थरकोई जो पूछे किया क्या है कुछ किया है अगरतो उस से कह दो कि वो आए देख ले आ करलगाया हम ने था जम्हूरियत का जो पौधावो आज एक घनेरा सा ऊँचा बरगद हैऔर उस के साए में क्या बदला कितना बदला हैकब इंतिहा है कोई इस की कब कोई हद है
मेरे रस्ते में इक मोड़ थाऔर उस मोड़ परपेड़ था एक बरगद काऊँचाघनाजिस के साए में मेरा बहुत वक़्त बीता हैलेकिन हमेशा यही मैं ने सोचाकि रस्ते में ये मोड़ ही इस लिए हैकि ये पेड़ हैउम्र की आँधियों मेंवो पेड़ एक दिन गिर गया हैमोड़ लेकिन है अब तक वहीं का वहीं
इक परिंदा किसी इक पेड़ की टहनी पे चहकता है कहींएक गाता हुआ यूँ जाता है धरती से फ़लक की जानिबपूरी क़ुव्वत से कोई गेंद उछाले जैसेइक फुदकता है सर-ए-शाख़ पे जिस तरह कोईआमद-ए-फ़स्ल-ए-बहारी की ख़ुशी में नाचेगूँदनी बोझ से अपने ही झुकी पड़ती हैनाज़नीं जैसे है कोई ये भरी महफ़िल मेंऔर कल हाथ हुए हैं पीलेकोयलें कूकती हैंजामुनें पक्की हैं, आमों पे बहार आई हैअरग़नूँ बजता है यकजाई कानीम के पेड़ों में झूले हैं जिधर देखो उधरसावनी गाती हैं सब लड़कियाँ आवाज़ मिला कर हर-सूऔर इस आवाज़ से गूँज उट्ठी है बस्ती सारीमैं कभी एक कभी दूसरे झूले के क़रीं जाता हूँएक ही कम है, वही चेहरा नहींआख़िरश पूछ ही लेता हूँ किसी से बढ़ करक्यूँ हबीबा नहीं आई अब तक?खिलखिला पड़ती हैं सब लड़कियाँ सुन कर ये नामलो ये सपने में हैं, इक कहती हैबाओली सपना नहीं, शहर से आए हैं अभीदूसरी टोकती हैबात से बात निकल चलती हैठाट की आई थी बारात, चम्बेली ने कहाबैंड-बाजा भी था, दीपा बोलीऔर दुल्हन पे हुआ कितना बिखेरकुछ न कुछ कहती रहीं सब ही मगर मैं ने सिर्फ़इतना पूछा वो नदी बहती है अब भी, कि नहींजिस से वाबस्ता हैं हम और ये बस्ती सारी?क्यूँ नहीं बहती, चम्बेली ने कहाऔर वो बरगद का घना पेड़ किनारे उस के?वो भी क़ाएम है अभी तक यूँहीवादा कर के जो 'हबीबा' नहीं आती थी कभीआँखें धोता था नदी में जाकरऔर बरगद की घनी छाँव में सो जाता था
1ये शाम इक आईना-ए-नील-गूँ ये नम ये महकये मंज़रों की झलक खेत बाग़ दरिया गाँववो कुछ सुलगते हुए कुछ सुलगने वाले अलावसियाहियों का दबे-पाँव आसमाँ से नुज़ूललटों को खोल दे जिस तरह शाम की देवीपुराने वक़्त के बरगद की ये उदास जटाएँक़रीब ओ दूर ये गो धूल की उभरती घटाएँये काएनात का ठहराव ये अथाह सुकूतये नीम-तीरह फ़ज़ा रोज़-ए-गर्म का ताबूतधुआँ धुआँ सी ज़मीं है घुला घुला सा फ़लक2ये चाँदनी ये हवाएँ ये शाख़-ए-गुल की लचकये दौर-ए-बादा ये साज़-ए-ख़मोश फ़ितरत केसुनाई देने लगी जगमगाते सीनों मेंदिलों के नाज़ुक ओ शफ़्फ़ाफ़ आबगीनों मेंतिरे ख़याल की पड़ती हुई किरन की खनक3ये रात छनती हवाओं की सोंधी सोंधी महकये खेत करती हुई चाँदनी की नर्म दमकसुगंध रात की रानी की जब मचलती हैफ़ज़ा में रूह-ए-तरब करवटें बदलती हैये रूप सर से क़दम तक हसीन जैसे गुनाहये आरिज़ों की दमक ये फ़ुसून-ए-चश्म-ए-सियाहये धज न दे जो अजंता की सनअतों को पनाहये सीना पड़ ही गई देव लोक की भी निगाहये सर-ज़मीन से आकाश की परस्तिश-गाहउतारते हैं तिरी आरती सितारा ओ माहसजल बदन की बयाँ किस तरह हो कैफ़िय्यतसरस्वती के बजाते हुए सितार की गतजमाल-ए-यार तिरे गुल्सिताँ की रह रह केजबीन-ए-नाज़ तिरी कहकशाँ की रह रह केदिलों में आईना-दर-आईना सुहानी झलक4ये छब ये रूप ये जोबन ये सज ये धज ये लहकचमकते तारों की किरनों की नर्म नर्म फुवारये रसमसाते बदन का उठान और ये उभारफ़ज़ा के आईना में जैसे लहलहाए बहारये बे-क़रार ये बे-इख़्तियार जोश-ए-नुमूदकि जैसे नूर का फ़व्वारा हो शफ़क़-आलूदये जल्वे पैकर-ए-शब-ताब के ये बज़्म-ए-शोहूदये मस्तियाँ कि मय-ए-साफ़-ओ-दुर्द सब बे-बूदख़जिल हो लाल-ए-यमन उज़्व उज़्व की वो डलक5बस इक सितारा-ए-शिंगरफ़ की जबीं पे झमकवो चाल जिस से लबालब गुलाबियाँ छल्केंसकूँ-नुमा ख़म-ए-अबरू ये अध-खुलीं पलकेंहर इक निगाह से ऐमन की बिजलियाँ लपकेंये आँख जिस में कई आसमाँ दिखाई पड़ेंउड़ा दें होश वो कानों की सादा सादा लवेंघटाएँ वज्द में आएँ ये गेसुओं की लटक6ये कैफ़-ओ-रंग-ए-नज़ारा ये बिजलियों की लपककि जैसे कृष्ण से राधा की आँख इशारे करेवो शोख़ इशारे कि रब्बानियत भी जाए झपकजमाल सर से क़दम तक तमाम शोला हैसुकून जुम्बिश ओ रम तक तमाम शोला हैमगर वो शोला कि आँखों में डाल दे ठंडक7ये रात नींद में डूबे हुए से हैं दीपकफ़ज़ा में बुझ गए उड़ उड़ के जुगनुओं के शरारकुछ और तारों की आँखों का बढ़ चला है ख़ुमारफ़सुर्दा छिटकी हुई चाँदनी का धुँदला ग़ुबारये भीगी भीगी उदाहट ये भीगा भीगा नूरकि जैसे चश्मा-ए-ज़ुल्मात में जले काफ़ूरये ढलती रात सितारों के क़ल्ब का ये गुदाज़ख़ुनुक फ़ज़ा में तिरा शबनमी तबस्सुम-ए-नाज़झलक जमाल की ताबीर ख़्वाब आईना-साज़जहाँ से जिस्म को देखें तमाम नाज़-ओ-नियाज़जहाँ निगाह ठहर जाए राज़-अंदर-राज़सुकूत-ए-नीम-शबी लहलहे बदन का निखारकि जैसे नींद की वादी में जागता संसारहै बज़्म-ए-माह कि परछाइयों की बस्ती हैफ़ज़ा की ओट से वो ख़ामुशी बरसती हैकि बूँद बूँद से पैदा हो गोश ओ दिल में खनक8किसी ख़याल में है ग़र्क़ चाँदनी की चमकहवाएँ नींद के खेतों से जैसे आती होंहयात ओ मौत में सरगोशियाँ सी होती हैंकरोड़ों साल के जागे सितारे नम-दीदासियाह गेसुओं के साँप नीम-ख़्वाबीदाये पिछली रात ये रग रग में नर्म नर्म कसक
दूर बरगद की घनी छाँव में ख़ामोश ओ मलूलजिस जगह रात के तारीक कफ़न के नीचेमाज़ी ओ हाल गुनहगार नमाज़ी की तरहअपने आमाल पे रो लेते हैं चुपके चुपके
बरगद के नीचे बैठो या सूली चढ़ जाओभैंसे लड़ने से बाज़ नहीं आएँगेमौत से हम ने एक तआवुन कर रक्खा हैसड़कों पर से हर लम्हा इक मय्यत जाती हैपस-मंज़र में क्या होता है नज़र कहाँ जाती हैसामने जो कुछ है रंगों आवाज़ों चेहरों का मेला है!
मेरी एक दोस्तहम-दम और हमराज़उस की गहरी उदास आँखेंसुरूद के सुरों जैसीबरगद की छालों जैसे बालहोंटों पर अन-कहा प्यारलम्स में जाँ-गुदाज़ नर्मीउस की ख़ामोशी मेंआख़िरी-दम तकमेरी हम-सफ़री का वा'दा हैयास नाम है उस का
सड़क मसाफ़त की उजलतों मेंघिरे हुए सब मुसाफ़िरों कोब-ग़ौर फ़ुर्सत से देखती हैकिसी के चेहरे पे सुर्ख़ वहशत चमक रही हैकिसी के चेहरे से ज़र्द हैरत छलक रही हैकिसी की आँखें हरी-भरी हैंकबीर हद से उभर रहा हैसग़ीर क़द से गुज़र रहा हैकिसी का टायर किसी के पहिए को खा रहा हैकिसी का जूता किसी की चप्पल चबा रहा हैकिसी के पैरों में आ रहा है किसी का बच्चाकिसी का बच्चा किसी के शाने पे जा रहा हैकोई ठिकाने पे कोई खाने पे जा रहा हैहबीब दस्त-ए-रक़ीब थामेग़रीब-ख़ाने पे जा रहा हैअमीर पिंजरा बना रहा हैग़ुलाम कर्तब दिखा रहा हैऔर अपने बेटे के साथ छत परअमीन कुंडा लगा रहा हैनिज़ाम तांगा चला रहा हैकिसी कलाई पे जगमगाती हुई घड़ी हैमगर अभी वो रुकी हुई हैकिसी के चेहरे पे बारा बजने में पाँच सेकेंड रह गए हैंकिसी की हाथी-नुमा प्राडोसड़क से ऐसे गुज़र रही हैसिवाए इस के कहीं भी जैसे कोई नहीं होकिसी की मूँछें झुकी हुई हैंकिसी की बांछें खिली हुई हैंकिसी की टैक्सी किसी की फ़ोकसी मिली हुई हैंकिसी के लब और किसी की आँखें सिली हुई हैंकिसी के कपड़े फटे हुए हैंकिसी की पगड़ी चमक रही हैकिसी की रंगत किसी की टोपी उड़ी हुई हैशरीफ़ नज़रें उठा उठा करकमान जिस्मों पे अपनी वहशत के तीर कब से चला रहा हैनज़ीर नज़रें चुरा रहा हैनफ़ीस अपने कलफ़ की शिकनों को रो रहा हैहकीम अपने मतब के शीशों को धो रहा हैकिसी की आँखों के धुँदले शीशों में उस के माज़ी की झलकियाँ हैंकिसी की आँखों में आने वाले हसीन लम्हों की मस्तियाँ हैंकिसी की आँखों में रत-जगों की कुछ अर्ग़वानी सी डोरियाँ हैंकिसी के काँधे पे उस के ख़्वाबों की बोरियाँ हैंकबाड़-ख़ाने पे बासी टुकड़ों की ओर किताबों की बोरियाँ हैंबुज़ुर्ग बरगद के नीचे बूढ़ा खड़ा हुआ हैऔर उस के हाथों में टेप लिपटी हुई छड़ी हैपुलीस की गाड़ी पिकिट लगा करसड़क पे तिरछी खड़ी हुई हैऔर एक मज़दूर अपना दामन उठाए बे-बस खड़ा हुआ हैऔर इक सिपाही कि उस के नेफ़े में उँगलियों को घुमा रहा हैवहीं पे शाहिद सियाह चश्मा लगा के ख़ुद को छुपा रहा हैन्यूज़ चैनल की छोटी गाड़ी बड़ी ख़बर की तलाश में हैदो सब्ज़ी वाले भी अपनी फेरी लगा रहे हैंतो फूल वाले के सर पे फूलों की टोकरी हैकिसी की आँखों में नौकरी हैकिसी की आँखों में छोकरी हैवक़ार सर को झुका रहा हैफ़राज़ खाई में जा रहा हैतो गीली सिगरेट के कश लगा करनवाब रिक्शा चला रहा हैसलीम कन्नी घुमा रहा हैवकील वर्दी में जा रहा हैज़मीर बग़लें बजा रहा हैऔर एक वाइज़ बता रहा हैख़ुदा को नाराज़ करने वाले जहन्नमी हैंख़ुदा को राज़ी करो ख़ुदाराख़ुदा को राज़ी करो ख़ुदाराऔर उस के आगे नसीर अकमल कमाल शादाब ग़ुलाम सारेनज़र झुकाए खड़े हुए हैंकि चश्म-ए-बीना अगर कहीं हैतो समझो पाताल तक गढ़ी हैकिसी को ए-सी ख़रीदना हैकिसी को पी सी ख़रीदना हैकिसी की बस और किसी की बी-सी निकल रही हैअक़ीला ख़ाला के दोनों हाथों में आठ थैले लटक रहे हैंऔर आते जाते सभी मुसाफ़िरउन्हें मुसलसल खटक रहे हैंज़िया अँधेरे में जा रहा हैगुलाब कचरा जला रहा हैअज़ीम मक्खी अड़ा रहा हैकलीम गुटका चबा रहा हैतो घंटा-पैकेज पे जाने कब सेफ़हीम गप्पें लड़ा रहा हैसबक़ मुसावात का सिखानेवज़ीर गाड़ी में जा रहा हैसना निदा को नए लतीफ़े सुना रही हैहिना हथेली को तकते तकते पुराने रस्ते से आ रही हैऔर अपनी भावज का हाथ थामेज़ुबैदा चैक-अप को जा रही हैवो अपनी नज़रें कभी इधर को कभी अधर को घुमा रही हैमगर कोई शय उसे मुसलसल बुला रही रही हैअजीब उजलत अजीब वहशत अजीब ग़फ़लत का माजरा हैकहूँ मैं किस से मिरे ख़ुदाया ये कैसी ख़िल्क़त का माजरा हैकि अपनी मस्ती में मस्त हो करये सब मुसाफ़िर गुज़र रहेनए मुसाफ़िर उभर रहे हैंसड़क जहाँ थी वहीं खड़ी हैमगर हक़ीक़त बहुत बड़ी हैसड़क पे बिल्ली मरी पड़ी है
हज़ारों सदियाँ गुज़र चुकी हैंकिसी समय में वो थी सतवंतीकहीं सावित्रीकहीं थी मीराहर एक युग मेंअक़ीदतों की लहर में भीगीतपस्या के सेहर में गुम-सुमरिवायतों के नशे में डूबीतुम्हारे क़दमों की गर्द को वो तिलक बनातीदिए जलाती थी नक़्श-ए-पा परजनम जनम का अटूट रिश्तानिबाहे जातीहज़ारों सदियों सफ़र किया हैनज़र जमाएतुम्हारे पीछेतुम्हारे दुख पर दुखी हुई हैतुम्हारे सुख पर सुखी हुई हैमगर बताओहज़ारों सदियों के दरमियाँ कोई ऐसा लम्हाजो तुम ने इस के लिए जिया होसिवाए आँसू के कोई जुगनूकभी जो आँचल में जड़ दिया होपुराने बरगद पे एक धागाकहीं तो उस के भी नाम का होअँधेरी ताक़ों पे उस की ख़ातिररखा हुआ भी तो इक दिया होनहीं है कुछ भीकहीं नहीं हैवो अपनी तारीख़ में तुम्हारालिखे भी गर नामकिस तरह से
हम पैदा करते हैंहम गीली मिट्टी को मुट्ठी में भींचा करते हैंतो शक्लें बनती हैंहम उन की चोंचें खोल के साँसें फूँका करते हैंजो मिट्टी थे वो छू लेने से ताइर होते हैंहम शाइ'र होते हैंकनआन में रहते हैंजब जल्वा करते हैंतो शश्दर अंगुश्तों को पोरें नश्तर देती हैंफिर ख़ून टपकता है जो सर्द नहीं होताइक सहमा सा सकता होता है दर्द नहीं होतायूनान के डाकू हैंहम देवताओं के महल में नक़ब लगाया करते हैंहम आसमान का नीला शह-दरवाज़ा तोड़ते हैंहम आग चुराते हैंतो इस दुनिया की यख़ चोटी से बर्फ़ पिघलती हैफिर जमे हुए सीने मिलते हैंसाँस हुमकती हैऔर शिरयानों के मुँह खुलते हैंख़ून धड़कता हैजीवन-रामायन मेंजब रावन इस्तिब्दादी कारोबार चलाता हैहम सीता लिखते हैंजब रथ के पहिए जिस्मों के पोशाक कुचलते हैंतो गीता लिखते हैंजब होंटों के सहमे कपड़ों पर बख़िया होता हैहम बोला करते हैंजब मंडी से एक एक तराज़ू ग़ाएब होता हैतो जीवन को मीज़ान पे रख कर तोला करते हैंमज़दूरी करते हैंहम लफ़्ज़ों के जंगल से लकड़ी काटा करते हैंहम अर्कशी के माहिर हैं अम्बार लगाते हैंफिर रंदा फेरते हैं फिर बर्मा देते हैंफिर बुध मिलाते हैं फिर चूल बिठाते हैंहम थोड़े थोड़े होते हैंइस भरी भराई दुनिया में हम कम-कम होते हैंजब शहर में जंगल दर आए और उस का चलन जंगलाएतो हम ग़ार से आते हैंजब जंगल शहर की ज़द में हो और उस का सुकूँ शहराएतो बरगद से निकलते हैंहम थोड़े थोड़े होते हैंहम कम-कम होते हैंहम शाइ'र होते हैं
हम दोनों इक बस्ती के दो बरगद थेहम दोनों पे बच्चे झूला करते थेहम दोनों को माएँ कोसा करती थींफिर हम में से एक ने चलना सीख लिया
मेरे बाप ने मरते दम भीमुझ से बस ये बात कही थीगर्दन भी उड़ जाए मेरीसच बोलूँ मैं झूट न बोलूँउस दिन से मैं आज के दिन तकपग पग झूट से टक्कर लेतासच को रेज़ा रेज़ा करताअपने दिल को इन रेज़ों से छलनी करताख़ून में लत-पत घूम रहा हूँऔर मिरा दामन है ख़ालीलेकिन अब मैं थक सा गया हूँबरगद की छाया में बैठा कितनी देर से सोच रहा हूँक्यूँ न झूट से हाथ मिला लूँऔर चुपके से क़ब्र पे अपने बाप की जा कर इतना कह दूँतुम झूटे थे
शफ़क़ जब फूल कर रंग-ए-हिना थीऔर हवा के लब सिले थेएक बूढ़ा पेड़ बरगद काखड़ा गँगा-किनारेदिल-गिरफ़्ताख़ुद से महव-ए-गुफ़्तुगू था''वो मिरी इक शाख़ का पत्तामिरे ही जिस्म का हिस्सागिरागिर कर सितारा हो गयापानी का प्यारा हो गयामुझ से किनारा हो गया''वहीं सरगोशियों मेंइक पतिंगागुनगुनाया कान में उस केनिराशा तुम में क्यूँ जागीमिरे बाबा?तुम्हारे अंग के कितने ही पत्तेअब भी गुन गाते तुम्हारा हैंसहारा तुम बनो उन कातुम्हारा वो सहारा हैंन इक पत्ते को रो बाबा!
हम कि वामांदगी-ए-शौक़ का लम्हा ले करआ गए हैं तिरे पैकर के उजालों के क़रीबकितनी सदियों की मसाफ़त ले करएक दरमाँदा तही-दस्त मुसाफ़िर की तरहआ के ठहरे हैं तिरे प्यार के बरगद नीचेहम कि मसहूर तिलिस्मात-कदे हैं तेरेतेरी आँखों तेरे होंटों तेरी ज़ुल्फ़ों के असीरतेरी तमन्ना के फ़क़ीरमुंतज़िर हैं कि तिरे जिस्म का परतव उभरेऔर रौशन हों तख़य्युल की वो राहें जिन परकब से फैली हुई गुमनाम सी तारीकी हैयूँ सिमट जाए मिरे बख़्त पे उतरी हुई रातनूर छन कर तिरे पैकर की तुनुक-ताबी सेमेरी बे-नूर सी दुनिया को मुनव्वर कर देमेरे ख़्वाबों को हक़ीक़त कर देऐ रुख़-ए-यार इधर देख ज़रामेरे दिल-दार इधर देख ज़राजिस का इक उम्र तमन्नाई रहाअपने गुल-रंग से जल्वों के तुफ़ैलमुझ को वो कैफ़ वो रानाई देएक बे-नाम से रिश्ते को पज़ीराई देअब तो इक लम्स-ए-मसीहाई देहम को ऐ जान-ए-जहाँ इतनी इजाज़त दे देजिस घड़ी शाम ढलेतेरी गेसू की तरह शब की हसीं ज़ुल्फ़ खुलेतेरे आँचल का किनारा ले करएक बे-नाम सहारा ले करअपनी बेताब तमन्नाओं की गिर्हें खोलेंतेरे ज़ानू पे ये सर रख केदो आँसू रो लें
नई नई दुनिया लगती थी नए नए से लोगखिलती कलियाँ सुब्ह सवेरे कैसे मद्धम मद्धमहैरत होती फूल पे कैसे जम जाती है शबनमचिड़ियों की आवाज़ सुनाती घुँगरू जैसी छम-छमबारिश की बूँदें गिरतीं पेड़ों पे रिम-झिम रिम-झिमबरगद की दाढ़ी को पकड़े बच्चे पेंग बढ़ातेकव्वे मैना कोयल चिड़ियाँ मिल कर शोर मचातेमाँ के हाथों की इक ख़ुशबू बस्ती थी रोटी मेंबिना शक्कर लगता था मीठा ठंडा ठंडा पानीथा कितना मासूम सा बचपन बात न हम ने जानीवो पंछी मीठी आवाज़ें नूर सी उजली भोरफिसल गई क्यों हाथ से अपने वो सपनों की डोर
जा नय्या नानी के गाँवठंडी है बरगद की छाँव
शाइ'रीतू परिंदों की चोंचों पे उगती हुई नग़्मगीतू दरख़्तों की छाँव में पलती हुई सादगीतू बहारों के दामन में बिखरी हुई बे-ख़ुदीतू सुलगते सवालों के बातिन में बहकी हुई आरज़ूतू है मा'सूम बच्चे की आँखों में हैरत-कदाकौन समझे तुझेतीरगी रौशनी ज़िंदगी बेबसी आदमीऔर इक कामनीकौन तेरी ज़बाँ से हुआ आश्नाकौन समझा तुझेपानियों की लड़ाई में मौजों ने तेरी कोईबात मानी है क्यासरहदों पर भड़कती हुई आग नेतेरे क़दमों पे बोसा दिया है कभीशाइ'रीआ ज़रा देख लेमेरे पहलू में बरगद के पाले हुए वसवसेअपने माथे से चुप की लकीरें मिटा और बताइस्तिआरों से बरगद की शाख़ें भी कटती हैं क्याशाइ'रीतुझ से तोकामनी का कोई एक जज़्बा भी महका नहींतुझ से दुनिया में क्या इंक़लाब आएगाशाइ'रीदेख मेरे सिरहाने तमन्नाएँ कितनी हैं ज़ंजीर-ए-पाकितने ख़्वाबों के टूटे हुएपर हैं बिखरे हुएआ कि मिल कर अजल के किसीगोशा-ए-नम में जाने को रख़्त-ए-सफ़र बाँध लेंकौन समझा तुझे कौन समझे तुझे
किस के क़दमों की आहट हैदरवाज़े पर कौन आया हैआधी रात के सन्नाटे में आहें भरनेउस से कह दोये घर सदियों से ख़ाली हैउल्लू चीख़ाबरगद बोलासर्द हवा का तन्हा झोंकादीवार-ए-दिल से सर टकरा करलौट गया है
शीशम सागी गोंदा सेमलसतकट बरगद आम और पीपल
थकनबोझल मनों बोझल बदन अपनाउठा कर चल पड़ीचलती रहीफिर एक दिनभारी पपोटों को उठा करउस ने देखारास्ते के बीचएक बरगद पुरानासमाधी ओढ़ कर बैठा हुआ थाथकनकुब्ड़े असा को टेकतीबरगद के साए में चली आईमअन ठिटकी ठिठक कर रुक गईबोलीचलो हम भी यहाँ रुक करसमाधी ओढ़ लेते हैंचलो हम भी उतरते हैंख़ुद अपनी तह के अंदरऔर ख़ुद को ढूँडते हैंअबद तकनींद के दरिया में हम भी ऊँघते हैं
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