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नज़्म
हमारी इस्तलाहों से ज़बाँ ना-आश्ना होगी
लुग़ात-ए-मग़रिबी बाज़ार की भाषा से ज़म होंगे
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
वो बचपना जिसे बर्दाश्त अपनी मुश्किल हो
वो बचपना जो ख़ुद अपनी ही तेवरियाँ सी चढ़ाए
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
इन में छूत और छात नहीं झूटी ज़ात और पात नहीं
भाषा की तकरार नहीं मज़हब की दीवार नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ब्रिज-भाषा में है जो लज़्ज़त वो लज़्ज़त इस में है
साफ़ क़ंद-ए-फ़ारसी की भी हलावत इस में है
सफ़ी लखनवी
नज़्म
पीठ पर नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त इक बार-ए-गराँ
ज़ोफ़ से लर्ज़ी हुई सारे बदन की झुर्रियाँ
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
और मैं मुसलसल रोता ही रहता हूँ
जब उस से जुदाई का दर्द मेरी बर्दाश्त से बाहर हो जाता है