aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "dostaa"
ज़माना तेज़ धार हैजो चल गया सो पार हैउसी से कोई सीख लेऔर अपना कुंद तीख लेनहीं तो कटवो इश्क़ क्या है दोस्ताजो ग़म नहीं परोसताये ज़ाइक़ा तो चख ज़राज़बाँ पे इस को रख ज़रामज़ा तो लेबदन पे जो लिबास हैधुनी हुई कपास हैतो ये फ़ना में है बक़ाकि इस का नाम है क़ज़ा
कभी तो बात भी ख़फ़ीकभी सुकूत भी सुख़नकभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँकभी उदासियों का बन
ये दुनिया जहाँ आदमी कुछ नहीं हैवफ़ा कुछ नहीं दोस्ती कुछ नहीं हैजहाँ प्यार की क़द्र ही कुछ नहीं हैये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चलफिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चलये नहीं मुमकिन तो फिर ऐ दोस्त वीराने में चलऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
आप को इल्म है वो आज नहीं आई हैं?मेरी हर दोस्त से उस ने यही पूछा होगाक्यूँ नहीं आई वो क्या बात हुई है आख़िरख़ुद से इस बात पे सौ बार वो उलझा होगाकल वो आएगी तो मैं उस से नहीं बोलूँगाआप ही आप कई बार वो रूठा होगावो नहीं है तो बुलंदी का सफ़र कितना कठिनसीढ़ियाँ चढ़ते हुए उस ने ये सोचा होगाराहदारी में हरे लॉन में फूलों के क़रीबउस ने हर सम्त मुझे आन के ढूँडा होगा
गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्तगर मुझे इस का यक़ीं हो कि तिरे दिल की थकनतिरी आँखों की उदासी तेरे सीने की जलनमेरी दिल-जूई मिरे प्यार से मिट जाएगीगर मिरा हर्फ़-ए-तसल्ली वो दवा हो जिस सेजी उठे फिर तिरा उजड़ा हुआ बे-नूर दिमाग़तेरी पेशानी से ढल जाएँ ये तज़लील के दाग़तेरी बीमार जवानी को शिफ़ा हो जाएगर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मरे दोस्तरोज़ ओ शब शाम ओ सहर मैं तुझे बहलाता रहूँमैं तुझे गीत सुनाता रहूँ हल्के शीरींआबशारों के बहारों के चमन-ज़ारों के गीतआमद-ए-सुब्ह के, महताब के, सय्यारों के गीततुझ से मैं हुस्न-ओ-मोहब्बत की हिकायात कहूँकैसे मग़रूर हसीनाओं के बरफ़ाब से जिस्मगर्म हाथों की हरारत में पिघल जाते हैंकैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नुक़ूशदेखते देखते यक-लख़्त बदल जाते हैंकिस तरह आरिज़-ए-महबूब का शफ़्फ़ाफ़ बिलोरयक-ब-यक बादा-ए-अहमर से दहक जाता हैकैसे गुलचीं के लिए झुकती है ख़ुद शाख़-ए-गुलाबकिस तरह रात का ऐवान महक जाता हैयूँही गाता रहूँ गाता रहूँ तेरी ख़ातिरगीत बुनता रहूँ बैठा रहूँ तेरी ख़ातिरपर मिरे गीत तिरे दुख का मुदावा ही नहींनग़्मा जर्राह नहीं मूनिस-ओ-ग़म ख़्वार सहीगीत नश्तर तो नहीं मरहम-ए-आज़ार सहीतेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवाऔर ये सफ़्फ़ाक मसीहा मिरे क़ब्ज़े में नहींइस जहाँ के किसी ज़ी-रूह के क़ब्ज़े में नहींहाँ मगर तेरे सिवा तेरे सिवा तेरे सिवा
लोगों पे ही हम ने जाँ वारी की हम ने ही उन्ही की ग़म-ख़्वारीहोते हैं तो हों ये हाथ क़लम शा'इर न बनेंगे दरबारीइब्लीस-नुमा इंसानों की ऐ दोस्त सना क्या लिखनाज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
तुम्हारे देस में आया हूँ दोस्तो अब केन साज़-ओ-नग़्मा की महफ़िल न शाइ'री के लिएअगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिरचलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए
न दोस्ती न तकल्लुफ़ न दिलबरी न ख़ुलूसकिसी का कोई नहीं आज सब अकेले हैं
मैं जब भीज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में तप करमैं जब भीदूसरों के और अपने झूट से थक करमैं सब से लड़ के ख़ुद से हार केजब भी उस एक कमरे में जाता थावो हल्के और गहरे कत्थई रंगों का इक कमरावो बेहद मेहरबाँ कमराजो अपनी नर्म मुट्ठी में मुझे ऐसे छुपा लेता थाजैसे कोई माँबच्चे को आँचल में छुपा लेप्यार से डाँटेये क्या आदत हैजलती दोपहर में मारे मारे घूमते हो तुमवो कमरा याद आता हैदबीज़ और ख़ासा भारीकुछ ज़रा मुश्किल से खुलने वाला वो शीशम का दरवाज़ाकि जैसे कोई अक्खड़ बापअपने खुरदुरे सीने मेंशफ़क़त के समुंदर को छुपाए होवो कुर्सीऔर उस के साथ वो जुड़वाँ बहन उस कीवो दोनोंदोस्त थीं मेरीवो इक गुस्ताख़ मुँह-फट आईनाजो दिल का अच्छा थावो बे-हँगम सी अलमारीजो कोने में खड़ीइक बूढ़ी अन्ना की तरहआईने को तंबीह करती थीवो इक गुल-दाननन्हा साबहुत शैतानउन दिनों पे हँसता थादरीचाया ज़ेहानत से भरी इक मुस्कुराहटऔर दरीचे पर झुकी वो बेलकोई सब्ज़ सरगोशीकिताबेंताक़ में और शेल्फ़ परसंजीदा उस्तानी बनी बैठींमगर सब मुंतज़िर इस बात कीमैं उन से कुछ पूछूँसिरहानेनींद का साथीथकन का चारा-गरवो नर्म-दिल तकियामैं जिस की गोद में सर रख केछत को देखता थाछत की कड़ियों मेंन जाने कितने अफ़्सानों की कड़ियाँ थींवो छोटी मेज़ परऔर सामने दीवार परआवेज़ां तस्वीरेंमुझे अपनाइयत से और यक़ीं से देखती थींमुस्कुराती थींउन्हें शक भी नहीं थाएक दिनमैं उन को ऐसे छोड़ जाऊँगामैं इक दिन यूँ भी जाऊँगाकि फिर वापस न आऊँगा
मुजस्समों की तरह थे दोनोंन दोस्ती थी न दुश्मनी थी
वो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैंन कोई ख़ून का रिश्ता न कोई साथ सदियों कामगर एहसास अपनों सा वो अनजाने दिलाते हैंवो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैंख़फ़ा जब ज़िंदगी हो तो वो आ के थाम लेते हैंरुला देती है जब दुनिया तो आ कर मुस्कुराते हैंवो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैंअकेले रास्ते पे जब मैं खो जाऊँ तो मिलते हैंसफ़र मुश्किल हो कितना भी मगर वो साथ जाते हैंवो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैंनज़र के पास हों न हों मगर फिर भी तसल्ली हैवही मेहमान ख़्वाबों के जो दिल के पास रहते हैंवो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैंमुझे मसरूर करते हैं वो लम्हे आज भी 'इरफ़ान'कि जिन में दोस्तों के साथ के पल याद आते हैंवो कैसे लोग होते हैं जिन्हें हम दोस्त कहते हैं
ये आँसू क्या इक गवाह हैमेरी दर्द-मंदी का मेरी इंसान-दोस्ती काये आँसू क्या इक सुबूत हैमेरी ज़िंदगी में ख़ुलूस की एक रौशनी काये आँसू क्या ये बता रहा हैकि मेरे सीने में एक हस्सास दिल हैजिस ने किसी की दिल-दोज़ दास्ताँ जो सुनीतो सुन के तड़प उठा हैपराए शो'लों में जल रहा हैपिघल रहा हैमगर में फिर ख़ुद से पूछता हूँये दास्ताँ तो अभी सुनी हैये आँसू भी क्या अभी ढला हैये आँसूक्या मैं ये समझूँपहले कहीं नहीं थामुझे तो शक है कि ये कहीं थाये मेरे दिल और मेरी पलकों के दरमियाँइक जो फ़ासला हैजहाँ ख़यालों के शहर ज़िंदा हैंऔर ख़्वाबों की तुर्बतें हैंजहाँ मोहब्बत के उजड़े बाग़ों मेंतल्ख़ियों के बबूल हैंऔर कुछ नहीं हैजहाँ से आगे हैंउलझनों के घनेरे जंगल
आओ कि आज ग़ौर करें इस सवाल परदेखे थे हम ने जो वो हसीं ख़्वाब क्या हुएदौलत बढ़ी तो मुल्क में इफ़्लास क्यूँ बढ़ाख़ुश-हाली-ए-अवाम के अस्बाब क्या हुएजो अपने साथ साथ चले कू-ए-दार तकवो दोस्त वो रफ़ीक़ वो अहबाब क्या हुएक्या मोल लग रहा है शहीदों के ख़ून कामरते थे जिन पे हम वो सज़ा-याब क्या हुएबे-कस बरहनगी को कफ़न तक नहीं नसीबवो व'अदा-हा-ए-अतलस-ओ-किम-ख़्वाब क्या हुएजम्हूरियत-नवाज़ बशर-दोस्त अम्न-ख़्वाहख़ुद को जो ख़ुद दिए थे वो अलक़ाब क्या हुएमज़हब का रोग आज भी क्यूँ ला-'इलाज हैवो नुस्ख़ा-हा-ए-नादिर-ओ-नायाब क्या हुएहर कूचा शो'ला-ज़ार है हर शहर क़त्ल-गाहयक-जेहती-ए-हयात के आदाब क्या हुएसहरा-ए-तीरगी में भटकती है ज़िंदगीउभरे थे जो उफ़ुक़ पे वो महताब क्या हुएमुजरिम हूँ मैं अगर तो गुनहगार तुम भी होऐ रहबरना-ए-क़ौम ख़ता-कार तुम भी हो
राम बन-बास से जब लौट के घर में आएयाद जंगल बहुत आया जो नगर में आएरक़्स-ए-दीवानगी आँगन में जो देखा होगाछे दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगाइतने दीवाने कहाँ से मिरे घर में आएजगमगाते थे जहाँ राम के क़दमों के निशाँप्यार की काहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँमोड़ नफ़रत के उसी राहगुज़र में आएधर्म क्या उन का था, क्या ज़ात थी, ये जानता कौनघर न जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौनघर जलाने को मिरा लोग जो घर में आएशाकाहारी थे मेरे दोस्त तुम्हारे ख़ंजरतुम ने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थरहै मिरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आएपाँव सरजू में अभी राम ने धोए भी न थेकि नज़र आए वहाँ ख़ून के गहरे धब्बेपाँव धोए बिना सरजू के किनारे से उठेराम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठेराजधानी की फ़ज़ा आई नहीं रास मुझेछे दिसम्बर को मिला दूसरा बन-बास मुझे
बहार आई तो जैसे यक-बारलौट आए हैं फिर अदम सेवो ख़्वाब सारे शबाब सारेजो तेरे होंटों पे मर-मिटे थेजो मिट के हर बार फिर जिए थेनिखर गए हैं गुलाब सारेजो तेरी यादों से मुश्कबू हैंजो तेरे उश्शाक़ का लहू हैंउबल पड़े हैं अज़ाब सारेमलाल-ए-अहवाल-ए-दोस्ताँ भीख़ुमार-ए-आग़ोश-ए-मह-वशां भीग़ुबार-ए-ख़ातिर के बाब सारेतिरे हमारेसवाल सारे जवाब सारेबहार आई तो खुल गए हैंनए सिरे से हिसाब सारे
देर तक आँखों में चुभती रही तारों की चमकदेर तक ज़ेहन सुलगता रहा तन्हाई मेंअपने ठुकराए हुए दोस्त की पुर्सिश के लिएतो न आई मगर उस रात की पहनाई में
तुम्हें किस ने कहा थादोपहर के गर्म सूरज की तरफ़ देखोऔर इतनी देर तक देखोकि बीनाई पिघल जाएतुम्हें किस ने कहा थाआसमाँ से टूटती अंधी उलझती बिजलियों से दोस्ती कर लोऔर इतनी दोस्ती कर लोकि घर का घर ही जल जाएतुम्हें किस ने कहा थाएक अनजाने सफ़र मेंअजनबी रहरव के हमरा दूर तक जाओऔर इतनी दूर तक जाओकि वो रस्ता बदल जाए
'इंशा' जी दुनिया वालों में बे-साथी बे-दोस्त रहेजैसे तारों की झुरमुट में तन्हा चाँद अकेला चाँद
ऐ दोस्तो मिलें तो बस इक पयाम कहनाउस्ताद-ए-मोहतरम को मेरा सलाम कहना
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