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नज़्म
जिस का निशाना जाए ख़ता वो ग़ुलैल हूँ
मैं ख़ाक में मिला हुआ मिट्टी का तेल हूँ
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
दश्त-ए-तन्हाई में दूरी के ख़स ओ ख़ाक तले
खिल रहे हैं तिरे पहलू के समन और गुलाब
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें
जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें