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नज़्म
कहाँ नाज़ुक ये पहुँचे और कहाँ ये रंग मिलते हैं
चमन में शाख़ पर कब इस तरह के फूल खिलते हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
अब इस महीने में पहुँची है याँ तलक ये चाल
फ़लक का जामा पहन सुर्ख़ी-ए-शफ़क़ से लाल
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
थी यूँ तो हर इक खेल से उन को रग़बत
मगर सब से बढ़ कर थी गुड़ियों की चाहत
मोहम्मद शफ़ीउद्दीन नय्यर
नज़्म
मेरी नानी अच्छी नानी मुझ पर वारी जाती थी
हाथ पकड़ कर पियाँ-पियाँ चलना मुझे सिखाती थी
अताउर्रहमान तारिक़
नज़्म
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात