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नज़्म
उमीद-ओ-बीम के झगड़े मिटा देता ज़माने से
ख़ुदी का देवता बन कर ख़ुदा का तर्जुमाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
रक़्स में पैमाना है ख़ाली नहीं हैं जाम अभी
दिल है सरमस्त-ए-ख़ुमार-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम अभी
अली मीनाई
नज़्म
गुल पशेमाँ क़ल्ब-ए-बुलबुल रश्क से दो-नीम है
तेरी बातों में ख़ुमार-ए-कौसर-ओ-तसनीम हैं