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नज़्म
कोई क्यों हम-जिंस के ज़ुल्म-ओ-तशद्दुद पर कुढ़े
वर्ना रूदाद-ए-क़फ़स हम को सिरे से याद है
मंझू बेगम लखनवी
नज़्म
ख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू है
यक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना
इक नार पे जान को हार गया मशहूर है उस का अफ़साना
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
ख़ुदा-ए-इज़्ज़-ओ-जल की नेमतों का मो'तरिफ़ हूँ मैं
मुझे इक़रार है उस ने ज़मीं को ऐसे फैलाया
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
जग के चारों कूट में घूमा सैलानी हैराँ हो कर
इस बस्ती के इस कूचे के इस आँगन में ऐसा चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
वो रोज़ काग़ज़ पे अपना चेहरा लिखता और गंदा होता
उस की औरत जो ख़ामोशी काढ़े बैठी थी
सारा शगुफ़्ता
नज़्म
जो इस हवा में यारो दौलत में कुछ बढ़े हैं
है उन के सर पे छतरी हाथी पे वो चढ़े हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आप हैं फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा-ए-पाक से कुर्सी-नशीं
इंतिज़ाम-ए-सल्तनत है आप के ज़ेर-ए-नगीं
जोश मलीहाबादी
नज़्म
ख़ुदा-ए-ख़ैर-ओ-शर भी ला नहीं सका था जिस की ताब
अभी तो गोद में हैं देवताओं की वो माह-ओ-साल