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नज़्म
सर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशम
कि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
टोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्म
क्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
बर्फ़ ने बाँधी है दस्तार-ए-फ़ज़ीलत तेरे सर
ख़ंदा-ज़न है जो कुलाह-ए-मेहर-ए-आलम-ताब पर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुम्हें कल अपने शरीक-ए-सफ़र को चुनना है
वो जिस से तुम को मोहब्बत मिले रिफ़ाक़त भी
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
हाँ कज करो कुलाह कि सब कुछ लुटा के हम
अब बे-नियाज़-ए-गर्दिश-ए-दौराँ हुए तो हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
संग-ओ-फौलाद से ढाले हुए जन्नात-ए-गिराँ
जिन के चंगुल में शब ओ रोज़ हैं फ़रियाद-कुनाँ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
गुलज़ार
नज़्म
ऐ शुआ-ए-अर्ज़-ए-मशरिक़ तेरी इफ़्फ़त का शिआर
कज करेगा मुल्क ओ मिल्लत की कुलाह-ए-इफ़्तिख़ार