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नज़्म
मुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब ने
तलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हक़ीक़त की सहर आख़िर न होगी पर्दा-दर कब तक
मुझे मग़्लूब कर के ख़ुश है तू ज़ालिम मगर कब तक
अख़्तर शीरानी
नज़्म
हो तसव्वुर इश्क़ का और हो स्याही रात की
उम्र नाज़ुक मोम सी हो याद हो इस बात की
ओम भुतकर मग़्लूब
नज़्म
ये भयानक ख़्वाब क्यों मग़्लूब करते हैं मुझे
दूधिया रातें सहर के झुटपुटे में खो गईं
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
बहुत से नित-नए और पुर-मसर्रत ख़्वाब बोता था
उसे ख़ुद भी ज़रा धीमा सा और मग़्लूब सा इक इश्क़ होता था
हारिस ख़लीक़
नज़्म
इफ़्तेख़ार जालिब
नज़्म
वो भी राम की जिस ने रावन को जीता है
दरिया अपनी ही मौजों से हो जाता है मग़्लूब अक्सर