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नज़्म
मज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार हो
है वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़र
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मज्लिस-ए-आईन-ओ-इस्लाह-ओ-रिआयात-ओ-हुक़ूक़
तिब्ब-ए-मग़रिब में मज़े मीठे असर ख़्वाब-आवरी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँ
मुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँ
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारें होली की
गुलज़ार खिले हों परियों के और मज्लिस की तय्यारी हो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
बुलंद दा'वा-ए-जम्हूरियत के पर्दे में
फ़रोग़-ए-मजलिस-ओ-ज़िन्दाँ हैं ताज़ियाने हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
समाजी मशग़लों में या तो हैं शादी की तक़रीबें
नहीं तो महफ़िल-ए-मीलाद वो मज्लिस नियाज़ और नज़रें
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
बकरे की क़ुर्बानी पर कुछ बकरे मातम करते
मुर्ग़े भी इस मज्लिस में मुँह लटका कर ग़म करते
असना बद्र
नज़्म
कुछ मुँह से निकल जाएँ न समझी हुई बातें
रहने दो मुझे मजलिस-ए-मय में यूँही मदहोश