aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "message"
न जाने कितने दिन गुज़रेन कोई कॉल न मैसेजन कोई राब्ता रखातुम्हें मैं याद तो हूँ नाया मुझ को भूल बैठे हो
खिलखिलाते आईकोन के साथ उस का मैसेज नुमूदार हुआअरे लड़की तुम में ज़रा हिस्स-ए-मिज़ाह नहीं हैमज़ाक़ को भी तुम कोढ़ मग़्ज़ नहीं समझतीये सब अज़-राए तफ़न्नुन कहा है
उसे मैसेज तो भेजा हैकि कॉफ़ी पर मिलो मुझ सेवो आ जाएगी तो अच्छामैं पहले सिर्फ़ दो कॉफ़ी मँगाऊँगामैं कैपेचीनो पीता हूँवो कैसी कॉफ़ी पीती हैइस का अंदाज़ा तो उस के आने पर होगाहमारे पास तो बातें भी कम हैंसो कॉफ़ी जल्द पी लेंगेजो उस के कप में थोड़ा झाग कॉफ़ी का बचा होगामैं उस की शेप को पढ़ कर उसे फ़्युचर बताउँगाबताऊँगा उसे मैंकैसे वो मुझ जैसे इक लड़के की दुनिया को बदल देगीउसे मालूम होगा क्या कि कॉफ़ी कप की रीडिंग का तरीक़ा ये नहीं होता?मैं कैफ़े आ चुका हूँवो भी रस्ते में कहीं होगीबहुत से लोग कैफ़े आ के पढ़ते लिखते रहते हैंमोहम्मद अल्वी की नज़्में तो मैं भी साथ लाया हूँये होगा तो नहीं फिर भी वो आई ही नहीं तो फिरइन्हीं लोगों के जैसे मैं भी पढ़ कर वक़्त काटूँगाउसे आने में देरी हो रही हैमैं इक कॉफ़ी तो तन्हा पी चुका हूँज़रा सा झाग कप में है जिसे देखो तो लगता हैकि इक लड़का अकेला बैठ कर कुछ पढ़ रहा हैतसल्ली दे रहा हूँ अब मैं ख़ुद कोये मेरी शाम का फ़्युचर नहीं हैकि कॉफ़ी कप की रीडिंग का तरीक़ा ये नहीं होता
तुम्हारा एक मैसेज वाट्सएप पर मुद्दतों के बा'द आया थाये लिक्खा था किबिज़ी था मैं सो रिप्लाई न कर पायाज़रा उस वक़्त कुछ साँसों की तुग़्यानी सी बरपा थीमुझे कुछ धड़कनों को भी ज़रा तरतीब देना थामोबाइल स्क्रीन उस वक़्त धुँदली हो गई थी कुछबिज़ी था मैं सो रिप्लाई न कर पायासो सॉरी ऐ मिरी सोहनीसुनो तुम ने ये लिक्खा था किमैं बिल्कुल ठीक हूँ सोहनीतुम्हारी याद ही आती नहीं मुझ कोसो बिल्कुल ठीक रहता हूँमगर हाँ जब ज़रा मैं साँस लेता हूँज़रा जब दिल धड़कता हैतो फिर तुम याद आती होमगर इस के अलावा ठीक रहता हूँज़रा सर में तनाव की सी कैफ़िय्यत तो रहती हैरगों में भी खिंचाओ सा ज़रा रहता है अब अक्सरमगर बाक़ी सभी कुछ ठीक है सोहनीज़रा जब साँस लेता हूँ तो अंदर कुछ चुभन सी होने लगती हैकहीं कुछ ज़ख़्म सा होगामगर बाक़ी सभी कुछ ठीक है सोहनीज़रा बस दिल धड़कता है तो सीने में किसी की सिसकियाँ मुझ को सुनाई देने लगती हैंमगर बाक़ी सभी कुछ ठीक है सोहनीअरे हाँ कल मैं आईने के आगे जब ज़रा आयावहाँ इक अजनबी चेहरा नज़र आयाबहुत ही ज़र्द सा चेहराऔर उस की आँख के हल्क़े में गड्ढे से नज़र आएअजब वहशत टपकती थीवहाँ से भाग आया मैंमगर बाक़ी सभी कुछ ठीक है सोहनीसुनो फिर भी मैं कल इक डॉक्टर से एहतियातन मिल भी आया हूँवो कहते हैं कि घबराने की कोई बात बिल्कुल भी नहीं इस मेंज़रा बस साँस थम जाएज़रा धड़कन भी जम जाएतो फिर सब कुछ हमेशा के लिए ही ठीक हो जाए
बदन को चीरती तन्हाई पर फैलाएजब हर एक सू होगीतो उस लम्हे'फ़राज़'-ओ-'फ़ैज़' की ग़ज़लों पे किस से गुफ़्तुगू होगीकिसे 'जगजीत' के सिसकी भरे गीतों में ढूँडोगेकिसे 'परवीन' के ख़ुशबू में डूबे शेर तुम मैसेज में भेजोगेकिसे 'गुलज़ार' की उलझी हुई नज़्में सुनाओगेकहो फिर शब गए'मंटो' के अफ़्सानों पे किस से गुफ़्तुगू होगी
मुझे पता हैमेरा दुखी होनातुम को भी दुख देता हैमेरी बेबसी कोतुम महसूस करते होमेरी भर्राई आवाज़तुम को भी रुलाती हैमैं जानता हूँये सब तुम कहते नहींबस मेरा फ़ोन काट देते होये कह कर किघर से फ़ोन आ रहा हैबा'द में बात करते हैंफिर मुझे मैसेज करते होकि नेटवर्क नहीं काम कर रहाकल बात करते हैंपर मुझे पता हैमेरे आँसू तुम्हें तकलीफ़ देते हैंऔर तुम बातों कारुख़ मोड़ देते होमुझे वहीं पर छोड़ देते हो
कभी कभी कोई यादकोई बहुत पुरानी याददिल को बुरी तरह झकझोरती हैदिल के दरवाज़े परबुरी तरह दस्तक देती हैजैसे शाम को कोई तारा निकला होजैसे सुब्ह कोई फूल खिला होजैसे चाँदनी अपनी किरनें बिखेर रही होजैसे कोई चराग़ जला है अभीजैसे रौशनी फैली हो हर तरफ़जैसे रोते रोते कोई हँस पड़ा होजैसे मेरी ओर कोई हाथ बढ़ाए खड़ा होकभी कभी किसी के बोलने का भरम होता हो जैसेजैसे वाल पर किसी का मैसेज पड़ा होजैसे कोई मेरे दरमियाँ खड़ा होकभी कभी कोई यादझकझोरती है दिल को
हमें तन्हाई खाती हैहमें कोई नहीं सुनताहमें भी बात आती हैकई मैसेज हमारे नोट पेडों मेंपड़े बोसीदगी की शाख़ पर झूलेंमगर कब तक
मैसेज करे वो मुझ से मुलाक़ात के लिएऔर मैं जवाब में लिखूँ फ़ुर्सत नहीं मुझे
तुम्हारा आख़री मैसेज मिरे इन-बॉक्स में रख्खा हैउस में तुम ने लिक्खा हैमुझे अब भूल जाना तुमजुदाई फाँस भी हो तोसब्र से झूल जाना तुममुझे अपनी क़सम दी हैमिरी तो जान ले ली हैमगर मैं जान दे कर भी आख़िर तक निभाऊँगामैं तुझ को भूल जाऊँगामगर तुम से फ़क़त मेरी ज़रा सी ये गुज़ारिश हैमिरी आँखों में मत रहनामिरे दिल से उतर जानाभुलाने भूल जाने में तुझे मैं याद कर लूँ तोमुझे तुम याद न आनाकभी भी याद न आना
अरे पगलीतुझे मुझ से मोहब्बत थीतो फिर मुझ से कहा होताये क्या कि रात भर जगनायूँही बेचैन सी रहनामगर सब कुछ छुपा लेनाकभी जाना जो सखियों मेंमुनाफ़िक़ बन के हँस लेनाकिसी से यूँ भी कह देनाकि 'दानिश' मुझ पे 'आशिक़ हैबहुत ही चाहता है वोमगर मैं क्या करूँ हमदमकि मैं मजबूर सी लड़कीज़माने के रिवाजों से बंधी महबूस बैठी हूँमैं कुछ भी कर नहीं सकतीअगर वो मुझ को चाहे है तो फिर उस पर ये लाज़िम थाकि मुझ को जीत लेता आ के मैदाँ में मुक़ाबिल सेवो मुझ को खींच लेता शौक़ से पहलू-ए-आ'दा सेज़माने के रिवाजों से कभी मुझ को चुरा लेताया मेरे ज़िम्मा-दारों से वो मुझ को माँग ही लेतामगर वो कुछ नहीं कहताख़फ़ा सा मुझ से रहता हैतुम्हारी ये कहानी कल बयाँ की एक लड़की नेतो मेरे दिल में भी इक शौक़ की आतिश हुई पैदामैं इस से क़ब्ल तुम को जानता तक भी न था जानाँमगर इक शौक़ था कि कौन है जो यूँ भी चाहे हैकि 'आशिक़ ख़ुद है लेकिन मुझ को वो 'आशिक़ बताए हैसो कुछ लम्हों की ख़ातिर मैं गली में तेरी दर आयातुझे देखा तुझे जाना तो मैं ने तुझ को पहचानाये अच्छी बात है कि शर्म से तू कुछ न कह पाईमगर जानाँ ज़रा सा इक इशारा कर दिया होताभरम मैं तेरा रख लेतामगर ये क्या कि तू ने मुझ को मजनूँ नाम कर डालामुझे महबूब कर के हाए क्यों बदनाम कर डालाज़माना मुझ से पूछे है कि क्यों उस से ख़फ़ा हो तुमबता मैं क्या बताऊँ दोस्तों को मसअला क्या हैमुझे भी तो मोहब्बत का भरम रखना है ना पगलीमैं कैसे कह दूँ लोगों से कि तू ही मुझ पे 'आशिक़ हैमगर सुन जब तू अपना ज़ब्त खो बैठे कभी रो करतो मोबाइल उठा कर एक मैसेज मुझ को कर देनामैं तुझ को थाम भी लूँगातुझे लुटने नहीं दूँगाकि तू मेरे लिए इक मोहतरम महबूब हस्ती हैमगर ये 'इश्क़ का सौदा और ऐसे 'इश्क़ का सौदामैं हरगिज़ कर नहीं सकतामुझे जब तक तिरी चाहत का कुछ एहसास हो ही नातो मैं कैसे भला तुझ से कोई रिश्ता रखूँ पगलीग़ुरूर-ए-हुस्न को तज देतो फिर 'दानिश' भी तेरा हैये लफ़्ज़-ओ-लौह तेरे हैंज़माना भी मोहब्बत भी
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
बस यूँही जीते रहोकुछ न कहोसुब्ह जब सो के उठोघर के अफ़राद की गिनती कर लोटाँग पर टाँग रखे रोज़ का अख़बार पढ़ोउस जगह क़हत गिराजंग वहाँ पर बरसीकितने महफ़ूज़ हो तुम शुक्र करोरेडियो खोल के फिल्मों के नए गीत सुनोघर से जब निकलो तोशाम तक के लिए होंटों में तबस्सुम सी लोदोनों हाथों में मुसाफ़े भर लोमुँह में कुछ खोखले बे-मअ'नी से जुमले रख लोमुख़्तलिफ़ हाथों में सिक्कों की तरह घिसते रहोकुछ न कहोउजली पोशाकसमाजी इज़्ज़तऔर क्या चाहिए जीने के लिएरोज़ मिल जाती है पीने के लिएबस यूँही जीते रहोकुछ न कहो
सुनोतुम क्यूँ नहीं कहतेमिरे आँसू तुम्हें तकलीफ़ देते हैंमिरे दुख सुन के तुम भी बेबसी महसूस करते होमेरी आवाज़ की लर्ज़िश तुम्हें भी ख़ूँ रुलाती हैमेरे लहजे की नमनाकी तुम्हें बेचैन रखती हैमुझे मा'लूम है लेकिन ये सब तुम कह नहीं सकतेउसी लम्हे तुम्हें याद आने लगते हैंकई बेहद ज़रूरी काम और फिर तुमअचानक मुंक़ता' करते हो टेलीफ़ोन की लाइनफिर एक मैसेज में लिखते होमुझे अफ़्सोस है पैकेज अचानक ख़त्म होने परतो फिर कल बात करते हैंमगर मैं जानती हूँ इस बहाने कोमुझे मा'लूम है जानाँमिरे आँसू तुम्हें तकलीफ़ देते हैं
वो मुझ से सख़्त नालाँ थीसो इस ने मुझ को लिख भेजातअ'ल्लुक़ ख़त्म है नासिरमुझे अब काल मत करनाकोई मैसेज अगर आया तो तुम को ब्लाक कर दूँगीअगर मिलने की सोचोगेतो फिर तुम सोच लेना अब
बताऊँ खाया है क्या मैं ने आज दो थप्पड़दुरुस्त कर के गए हैं मिज़ाज दो थप्पड़हकीम नब्ज़ मिरी देख कर ये कहने लगातिरे मरज़ का है असली इलाज दो थप्पड़ये गाल गोरे थे जो आज लाल लाल हुएकि इन पे कर गए हल्का मसाज दो थप्पड़वो मेरा भाई है उस पर भी ध्यान दो अम्मीमैं खाऊँ चार तो खाए सिराज दो थप्पड़न नाश्ता करे खाए न लंच और डिनरबजाए खाने के खाई है ताज दो थप्पड़तमाम दिन नहीं कुछ काम पीटने के सिवाहमारी अम्मी का है काम काज दो थप्पड़हमारी अस्ल ख़ताएँ तो वो बता न सकींपर आपा दे के गईं हम को ब्याज दो थप्पड़बहुत ही हम तो हैं बे-शर्म हाँ मगर अक्सरहमारे चेहरे पे लाए हैं लाज दो थप्पड़ये डर है मैं जो बड़ा हो के भी रहा जाहिलन मार दे मेरे मुँह पर समाज दो थप्पड़
हाँ ऐ मसाफ़-ए-हस्ती! मत पूछ मुझ से क्या हूँइक अर्सा-ए-बला हूँ इक लुक़मा-ए-फ़ना हूँमजबूरियों ने डाला गर्दन में मेरी फंदाख़ुद-कर्दा-ए-वफ़ा हूँ जाँ-दादा-ए-रज़ा हूँसय्याद हादसे का करता है मेरा पीछामुर्ग़-ए-बुरीदा-पर हूँ सैद-ए-शिकस्ता-पा हूँहै ज़ात मेरी मजमा' सारी बुराइयों काकहने को मैं बड़ा हूँ लेकिन बहुत बुरा हूँआज़ादियों की मुझ पर तोहमत ही है सरासरमैं क़ैदी-ए-हवस हूँ मैं बंदा-ए-हवा हूँइक बात हो बताऊँ इक दर्द हो सुनाऊँरोऊँ भला कहाँ तक कब तक पड़ा कराहूँकम-बख़्त दिल कुछ ऐसा मैं साथ ले के आयाइक लम्हा जिस के हाथों दुनिया में सुख न पायाजो जोश इस में उट्ठा हालात ने दबायाजो शो'ला इस में भड़का तक़दीर ने बुझायाउम्मीद का ये ग़ुंचा खिलते कभी न देखाये आरज़ू का पौदा फलता नज़र न आयागो इस में मौजज़न थी क़ौम ओ वतन की उल्फ़तलेकिन ग़रज़ ने इस को कुछ और ही सिखायाहोती नहीं रसाई उम्मीद के उफ़ुक़ तकतूल-ए-अमल ने इस को इक जाल में फँसायाकी रहबरी ख़िरद ने हर-चंद रहनुमाईइस जुहद पर भी लेकिन खुलती नहीं सच्चाईपाया न मैं ने अब तक मक़्सद का अपने साहिलकी बहर-ए-मा'रफ़त में दिन रात आश्नाईइस जुस्तुजू में मैं ने की सैर-ए-तूर-ओ-ऐमनपर्बत को घर बनाया जंगल से लौ लगाईमंदिर को जा के देखा गिरजा में जा के ढूँडामस्जिद को छान मारा उस की न दीद पाईजोगी का रूप धारा बन में किया गुज़ारातन पर भभूत मल कर धूनी बहुत रमाईजप तप में उम्र अपनी मैं ने बसर की अक्सरबन बन के पीर-ए-राहिब जा ख़ानक़ाह बसाईसूफ़ी भी बन के देखा और रिंद-ए-बे-रिया भीकर नारा-ए-अना-अल-हक़ इक खलबली मचाईफिरती हैं मारी मारी मुश्ताक़-ए-जल्वा आँखेंपर इक झलक से बढ़ कर देता नहीं दिखाईउठ जा नज़र से मेरी हाँ ऐ हिजाब-ए-हस्तीहुस्न-ए-अज़ल निहाँ है ज़ेर-ए-नक़ाब-ए-हस्तीये ज़िंदगी-ए-इंसाँ इक ख़्वाब है परेशाँबेदारी-ए-अदम है ता'बीर-ए-ख़्वाब-ए-हस्तीदेखें अगर तो क्यूँ-कर हम जलवा-ए-मआरिफ़तू ज़ुल्मत-ए-नज़र है ऐ आफ़्ताब-ए-हस्तीतस्कीं को ज़हर-ए-क़ातिल आब-ओ-हवा-ए-आलमराहत का दुश्मन-ए-जाँ हर इंक़लाब-ए-हस्तीऐ तिश्ना-ए-हक़ीक़त धोके में तू न आनाइक दाम-ए-पुर-ख़तर है मौज-ए-सराब-ए-हस्तीचाहे अगर रिहाई पेश-अज़-फ़ना फ़ना होपादाश-ए-जुर्म-ए-हस्ती है ये अज़ाब-ए-हस्ती
तेल दवाएँ और मसालहे इन से मिलते हैंरंग बिरंगे फूल चमन में इन पर खिलते हैंहम अपनी धरती को फूलों से महकाएँगेहम पेड़ लगाएँगे माहौल बनाएँगे
मैं ने उस को मैसेज भेजाजिस में मैं नेप्यार मोहब्बत के कुछ जुमले दर्ज किए औरनीचे अपना नाम भी लिखावो भी उजलत में थी शायदउस ने टू का इज़ाफ़ा कर केमैसेज मुझ को वापस भेजाजल्दी में वो अपना नाम ही भूल गई थीउस ने अपना नाम न लिखानीचे मेरा नाम लिखा था
तमाम दिन तुम्हारे मैसेजेज़ मेरे दिल की मुंडेरों पर कबूतरों की तरह उतरते हैंसफ़ेद दूधिया सियाह चश्म शरबती और सुरमई माइल जंगली कबूतर जिन के सीने के बालकई रंगों में दमकते हैंसब्ज़-गूँ नीलगूँ और ताबदार तपते हुए ताँबे के जैसे
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