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नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मुझ से मत पूछ ''मिरे हुस्न में क्या रक्खा है''
आँख से पर्दा-ए-ज़ुल्मात उठा रक्खा है
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ख़ल्वत-ओ-जल्वत में तुम मुझ से मिली हो बार-हा
तुम ने क्या देखा नहीं मैं मुस्कुरा सकता नहीं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
बहुत क़रीब हो तुम फिर भी मुझ से कितनी दूर
कि दिल कहीं है नज़र है कहीं कहीं तुम हो