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नज़्म
ज़िक्र-ए-अरब के सोज़ में, फ़िक्र-ए-अजम के साज़ में
ने अरबी मुशाहिदात, ने अजमी तख़य्युलात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
फिर पूछा उस ने कहिए ये है दिल का तूर क्या
इस के मुशाहिदे में है खुलता ज़ुहूर क्या
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जो सजाई जाती है रात को वो हमारी बज़्म-ए-ख़याल है
जो सड़क पे होता है रात दिन वो मुशाएरा कोई और है
दिलावर फ़िगार
नज़्म
क्या जाने उस ज़रीफ़ के क्या दिल में आई थी
कर्फ़्यू में जिस ने महफ़िल-ए-शेरी सजाई थी
खालिद इरफ़ान
नज़्म
मुझे रंगून से जब दावत-ए-शेर-ओ-सुख़न आई
तबीअत फ़ासले और वक़्त के चक्कर से घबराई