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नज़्म
मेरे संगी मेरे साथी तेरे कारन छूट गए हैं
तेरे कारन जग से मेरे कितने नाते टूट गए हैं
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मकतब में रह कर लड्डन-ख़ाँ ग़ज़लें कहना सीख चुके थे
अफ़्ग़ानी होने के नाते लोगों से डरते भी नहीं थे
मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
नज़्म
ना'त-ए-नबी पे इस्मत-ए-आवारा नुक्ता-चीं
ख़ौफ़-ए-ख़ुदा था ज़ोहरा-वशों में घिरा हुआ