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नज़्म
क़यामत इस के ग़म्ज़े जान-लेवा हैं सितम इस के
हमेशा सीन-ए-मुफ़्लिस पे पड़ते हैं क़दम इस के
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
दरिंदों की जहाँ चाँदी हो ज़ालिम दनदनाते हों
झपट पड़ते हों शाहीं जिस जगह कमज़ोर चिड़ियों पर
राजेन्द्र नाथ रहबर
नज़्म
उन्हें इस से ग़रज़ क्या पेँच पड़ते वक़्त किन हाथों में लर्ज़ा आ गया था
और किस की खेंच अच्छी थी?
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
सर-ब-कफ़ हिन्द के जाँ-बाज़-ए-वतन लड़ते हैं
तेग़-ए-नौ ले सफ़-ए-दुश्मन में घुसे पड़ते हैं