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नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
लो वो चाह-ए-शब से निकला पिछले-पहर पीला महताब
ज़ेहन ने खोली रुकते रुकते माज़ी की पारीना किताब
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
बस इसी कर्ब के पहलू में गुज़ारे हैं पहर
बस यूँही ग़म कभी काफ़ी कभी थोड़े आए
सोहैब मुग़ीरा सिद्दीक़ी
नज़्म
दुरुस्त उस को कराया लफ़्ज़ अगर कोई ग़लत बोला
ग़रज़ करती हैं मेरी तर्बियत आठों पहर अम्मी