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नज़्म
क़ल्ब-कदे में चीख़ पड़ा है
रात के काले तवे पर वहशत की रोटी पकने को तय्यार पड़ी है
हम्माद नियाज़ी
नज़्म
एक हाथ में माँ की उँगली पकड़े हँसते-खेलते गुज़रते हैं
मय-कदों में रिंद जाम पर जाम लुंढाते हैं
इफ़्तिख़ार आज़मी
नज़्म
इन को अपनाने की ख़्वाहिश उन्हें पाने की तलब
शौक़-ए-बेकार सही सई-ए-ग़म-ए-अंजाम नहीं