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नज़्म
तुम्हारे ज़ख़्मों को भर दे ऐसी दवा नहीं है
मगर हम ऐसे ख़ुदा-परस्तों की दस्तरस में दु'आ-ए-कुन है
अरसलान अब्बास
नज़्म
मैं उन्हीं हुस्न-परस्तों की हूँ तड़पाई हुई
तुझ से कहने को ये राज़ आई हूँ घबराई हुई
शकील बदायूनी
नज़्म
मुल्क में फ़िरक़ा-परस्तों की हुआ चल ही गई
न किसी ने सरज़निश की न उन्हें टोका गया
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
नज़्म
ख़ुद-परस्तों से भी ताआत की ज़ंजीर कहाँ कटती है
रात आती है तो दिल कहता है हम अपने हैं
वहीद अख़्तर
नज़्म
कोई कर सकता नहीं फ़िरक़ा-परस्तों की शनाख़्त
एक दो क्या टोलियों की टोलियाँ देहली में हैं
इज़हार मलीहाबादी
नज़्म
ना-तवानों के हैं रक्षक हक़-परस्तों के हैं दास
ज़ुल्म-ओ-इस्तिब्दाद को जड़ से मिटा देते हैं हम
प्रेम पाल अश्क
नज़्म
मुसीबत की घड़ी का क्या असर हो ज़र-परस्तों पर
कि होती है ज़मीं भी तंग अक्सर तंग-दस्तों पर