aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "selaa"
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
सुनो 'ज़रयून' तुम तो ऐन-ए-अ'यान-ए-हक़ीक़त होनज़र से दूर मंज़र का सर-ओ-सामान-ए-सर्वत होहमारी उम्र का क़िस्सा हिसाब अंदोज़-ए-आनी हैज़मानी ज़द में ज़न की इक गुमान-ए-लाज़िमानी हैगुमाँ ये है कि बाक़ी है बक़ा हर आन फ़ानी हैकहानी सुनने वाले जो भी हैं वो ख़ुद कहानी हैंकहानी कहने वाला इक कहानी की कहानी हैपिया पे ये गदाज़िश ये गुमाँ और ये गिले कैसेसिला-सोज़ी तो मेरा फ़न है फिर इस के सिले कैसे
मेरे माज़ी को अंधेरे में दबा रहने दोमेरा माज़ी मिरी ज़िल्लत के सिवा कुछ भी नहींमेरी उम्मीदों का हासिल मिरी काविश का सिलाएक बे-नाम अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं
आ बताऊँ तुझ को रम्ज़-ए-आया-ए-इन्नल-मुलूकसल्तनत अक़्वाम-ए-ग़ालिब की है इक जादूगरीख़्वाब से बे-दार होता है ज़रा महकूम अगरफिर सुला देती है उस को हुक्मराँ की साहिरीजादू-ए-महमूद की तासीर से चश्म-ए-अयाज़देखती है हलक़ा-ए-गर्दन में साज़-ए-दिल-बरीख़ून-ए-इस्राईल आ जाता है आख़िर जोश मेंतोड़ देता है कोई मूसा तिलिस्म-ए-सामरीसरवरी ज़ेबा फ़क़त उस ज़ात-ए-बे-हम्ता को हैहुक्मराँ है इक वही बाक़ी बुतान-ए-आज़रीअज़ ग़ुलामी फ़ितरत-ए-आज़ाद रा रुस्वा मकुनता-तराशी ख़्वाजा-ए-अज़-बरहमन काफ़िर तिरीहै वही साज़-ए-कुहन मग़रिब का जम्हूरी निज़ामजिस के पर्दों में नहीं ग़ैर-अज़-नवा-ए-क़ैसरीदेव-ए-इस्तिब्दाद जम्हूरी क़बा में पा-ए-कूबतू समझता है ये आज़ादी की है नीलम-परीमज्लिस-ए-आईन-ओ-इस्लाह-ओ-रिआयात-ओ-हुक़ूक़तिब्ब-ए-मग़रिब में मज़े मीठे असर ख़्वाब-आवरीगर्मी-ए-गुफ़्तार आज़ा-ए-मजालिस अल-अमाँये भी इक सरमाया-दारों की है जंग-ए-ज़रगरीइस सराब-ए-रंग-ओ-बू को गुलिस्ताँ समझा है तूआह ऐ नादाँ क़फ़स को आशियाँ समझा है तूसरमाया-ओ-मेहनत
तेरे नग़्मात तिरे हुस्न की ठंडक ले करमेरे तपते हुए माहौल में आ जाएँगेचंद घड़ियों के लिए हूँ कि हमेशा के लिएमिरी जागी हुई रातों को सुला जाएँगे
सेल्फ़ मेड लोगों का अलमियारौशनी मिज़ाजों का क्या अजब मुक़द्दर हैज़िंदगी के रस्ते में बिछने वाले काँटों कोराह से हटाने मेंएक एक तिनके से आशियाँ बनाने मेंख़ुशबुएँ पकड़ने में गुलिस्ताँ सजाने मेंउम्र काट देते हैंउम्र काट देते हैंऔर अपने हिस्से के फूल बाँट देते हैंकैसी कैसी ख़्वाहिश को क़त्ल करते जाते हैंदरगुज़र के गुलशन में अब्र बन के रहते हैंसब्र के समुंदर में कश्तियाँ चलाते हैंये नहीं कि उन को इस रोज़-ओ-शब की काहिश काकुछ सिला नहीं मिलतामरने वाली आसों का ख़ूँ-बहा नहीं मिलताज़िंदगी के दामन में जिस क़दर भी ख़ुशियाँ हैंसब ही हाथ आती हैंसब ही मिल भी जाती हैंवक़्त पर नहीं मिलतीं वक़्त पर नहीं आतींयानी उन को मेहनत का अज्र मिल तो जाता हैलेकिन इस तरह जैसेक़र्ज़ की रक़म कोई क़िस्त क़िस्त हो जाएअस्ल जो इबारत हो पस नविश्त हो जाएफ़स्ल-ए-गुल के आख़िर में फूल उन के खुलते हैंउन के सहन में सूरज देर में निकलते हैं
कोई हादसाकोई सानेहाकोई बहुत ही बुरी ख़बरअभी कहीं से आएगी!ऐसी जान-लेवा फ़िक्रों मेंसारा दिन डूबा रहता हूँरात को सोने से पहलेअपने-आप से कहता हूँभाई मिरेदिन ख़ैर से गुज़राघर में सब आराम से हैंकल की फ़िक्रेंकल के लिए उठा रक्खोमुमकिन हो तोअपने-आप कोमौत की नींद सुला रक्खो!!
मैं रूठा हूँ मेरा कांधा छुओफिर मुस्कुराओ और खाने पर बुला लोमुझे डर लग रहा है आजमुझ को अपने बिस्तर पर सुला लोमैं इस मेले में चल कर थक गया हूँअपने काँधे पर बिठा लोक़दम फिर लड़खड़ाते हैंमुझे उँगली दो गिरता हूँ सँभालोमुझे सर-दर्द है सर छू केअपने लम्स की उम्दा दवाई दो
देश सेवा ही का बहता है लहू नस नस मेंअब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की क़स्मेंसरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्मेंभाई ख़ंजर से गले मिलते हैं सब आपस में
दानिश-वर कहलाने वालोतुम क्या समझोमुबहम चीज़ें क्या होती हैंथल के रेगिस्तान में रहने वाले लोगोतुम क्या जानोसावन क्या हैअपने बदन कोरात में अंधी तारीकी सेदिन में ख़ुद अपने हाथों सेढाँपने वालोउर्यां लोगोतुम क्या जानोचोली क्या है दामन क्या हैशहर-बदर हो जाने वालोफ़ुटपाथों पर सोने वालोतुम क्या समझोछत क्या है दीवारें क्या हैंआँगन क्या हैइक लड़की का ख़िज़ाँ-रसीदा बाज़ू थामेनब्ज़ के ऊपर हाथ जमाएएक सदा पर कान लगाएधड़कन साँसें गिनने वालोतुम क्या जानोमुबहम चीज़ें क्या होती हैंधड़कन क्या है जीवन क्या हैसत्तरह-नंबर के बिस्तर परअपनी क़ैद का लम्हा लम्हा गिनने वालीये लड़की जोबरसों की बीमार नज़र आती है तुम कोसोला साल की इक बेवा हैहँसते हँसते रो पड़ती हैअंदर तक से भीग चुकी हैजान चुकी हैसावन क्या हैइस से पूछोकाँच का बर्तन क्या होता हैइस से पूछोमुबहम चीज़ें क्या होती हैंसूना आँगन तन्हा जीवन क्या होता है
अजब घड़ी थीकिताब कीचड़ में गिर पड़ी थीचमकते लफ़्ज़ों की मैली आँखों में उलझे आँसू बुला रहे थेमगर मुझे होश ही कहाँ थानज़र में इक और ही जहाँ थानए नए मंज़रों की ख़्वाहिश में अपने मंज़र से कट गया हूँनए नए दाएरों की गर्दिश में अपने मेहवर से हट गया हूँसिला जज़ा ख़ौफ़ ना-उमीदीउमीद इम्कान बे-यक़ीनीहज़ार ख़ानों में बट गया हूँअब इस से पहले कि रात अपनी कमंद डाले ये चाहता हूँ कि लौट जाऊँअजब नहीं वो किताब अब भी वहीं पड़ी होअजब नहीं आज भी मिरी राह देखती होचमकते लफ़्ज़ों की मैली आँखों में उलझे आँसूअजब नहीं मिरे लफ़्ज़ मुझ को मुआ'फ़ कर देंहवा-ओ-हिर्स-ओ-हवस की सब गर्द साफ़ कर देंअजब घड़ी थीकिताब कीचड़ में गिर पड़ी थी
आह जब दिल से निकलती है असर रखती हैगुलशन-ए-ज़ीस्त जलाने को शरर रखती हैतोप तलवार न ये तेग़-ओ-तबर रखती हैबिंत-ए-हव्वा की तरह तीर-ए-नज़र रखती हैइतना पुर-सोज़ हुआ नाला-ए-सफ़्फ़ाक मिराकर गया दिल पे असर शिकवा-ए-बेबाक मिराये कहा सुन के ससुर ने कि कहीं है कोईसास चुपके से ये बोलीं कि यहीं है कोईसालियाँ कहने लगीं क़ुर्ब-ओ-क़रीं है कोईसाले ये बोले कि मरदूद-ओ-लईं है कोईकुछ जो समझा है तो हम-ज़ुल्फ़ के बेहतर समझामुझ को बेगम का सताया हुआ शौहर समझाअपने हालात पे तुम ग़ौर ज़रा कर लो अगरजल्द खुल जाएगी फिर सारी हक़ीक़त तुम परमैं ने उगने न दिया ज़ेहन में नफ़रत का शजरतुम पे डाली है सदा मैं ने मोहब्बत की नज़रकह के सरताज तुम्हें सर पे बिठाया मैं नेतुम तो बेटे थे फ़क़त बाप बनाया मैं नेमैं ने ससुराल में हर शख़्स की इज़्ज़त की हैसास ससुरे नहीं ननदों की भी ख़िदमत की हैजेठ देवर से जेठानी से मोहब्बत की हैमैं ने दिन रात मशक़्क़त ही मशक़्क़त की हैफिर भी होंटों पे कोई शिकवा गिला कुछ भी नहींमेरे दिन रात की मेहनत का सिला कुछ भी नहींसुब्ह-दम बच्चों को तय्यार कराती हूँ मैंनाश्ता सब के लिए रोज़ बनाती हूँ मैंबासी तुम खाते नहीं ताज़ा पकाती हूँ मैंछोड़ने बच्चों को स्कूल भी जाती हूँ मैंमैं कि इंसान हूँ इंसान नहीं जिन कोईमेरी तक़दीर में छुट्टी का नहीं दिन कोईवो भी दिन थे कि दुल्हन बन के मैं जब आई थीसाथ में जीने की मरने की क़सम खाई थीप्यार आँखों में था आवाज़ में शहनाई थीकभी महबूब तुम्हारी यही हरजाई थीअपने घर के लिए ये हस्ती मिटा दी मैं नेज़िंदगी राह-ए-मोहब्बत में लुटा दी मैं नेकिस क़दर तुम पे गिराँ एक फ़क़त नारी हैदाल रोटी जिसे देना भी तुम्हें भारी हैमुझ से कब प्यार है औलाद तुम्हें प्यारी हैतुम ही कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैघर तो बीवी से है बीवी जो नहीं घर भी नहींये डबल बेड ये तकिया नहीं चादर भी नहींमैं ने माना कि वो पहली सी जवानी न रहीहर शब-ए-वस्ल नई कोई कहानी न रहीक़ुल्ज़ुम-ए-हुस्न में पहली सी रवानी न रहीअब मैं पहले की तरह रात की रानी न रहीअपनी औलाद की ख़ातिर मैं जवाँ हूँ अब भीजिस के क़दमों में है जन्नत वही माँ हूँ अब भीथे जो अज्दाद तुम्हारे न था उन का ये शिआरतुम हो बीवी से परेशान वो बीवी पे निसारतुम क्या करते हो हर वक़्त ये जो तुम बेज़ारतुम हो गुफ़्तार के ग़ाज़ी वो सरापा किरदारअपने अज्दाद का तुम को तो कोई पास नहींहम तो बेहिस हैं मगर तुम भी तो हस्सास नहींनहीं जिन मर्दों को परवा-ए-नशेमन तुम होअच्छी लगती है जिसे रोज़ ही उलझन तुम होबन गए अपनी गृहस्ती के जो दुश्मन तुम होहो के ग़ैरों पे फ़िदा बीवी से बद-ज़न तुम होफिर से आबाद नई कोई भी वादी कर लोकिसी कलबिस्नी से अब दूसरी शादी कर लो
लड़कपन की रफ़ीक़ ऐ हम-नवा-ए-नग़मा-ए-तिफ़लीहमारी ग्यारह साला ज़िंदगी की दिल-नशीं वादीहमारे ज़ेहन की तख़्ईल की एहसास की साथीहमारे ज़ौक़ की रहबर हमारी अक़्ल की हादी
ना-गहाँ आज मिरे तार-ए-नज़र से कट करटुकड़े टुकड़े हुए आफ़ाक़ पे ख़ुर्शीद ओ क़मरअब किसी सम्त अंधेरा न उजाला होगाबुझ गई दिल की तरह राह-ए-वफ़ा मेरे बाददोस्तो क़ाफ़िला-ए-दर्द का अब क्या होगाअब कोई और करे परवरिश-ए-गुलशन-ए-ग़मदोस्तो ख़त्म हुई दीदा-ए-तर की शबनमथम गया शोर-ए-जुनूँ ख़त्म हुई बारिश-ए-संगख़ाक-ए-रह आज लिए है लब-ए-दिलदार का रंगकू-ए-जानाँ में खुला मेरे लहू का परचमदेखिए देते हैं किस किस को सदा मेरे बाद'कौन होता है हरीफ़-ए-मय-ए-मर्द-अफ़गन-ए-इश्क़''है मुकर्रर लब-ए-साक़ी पे सला मेरे बाद'
(1)ना-गहाँ शोर हुआलो शब-ए-तार-ए-ग़ुलामी की सहर आ पहुँचीउँगलियाँ जाग उठींबरबत ओ ताऊस ने अंगड़ाई लीऔर मुतरिब की हथेली से शुआएँ फूटींखिल गए साज़ में नग़्मों के महकते हुए फूललोग चिल्लाए कि फ़रियाद के दिन बीत गएराहज़न हार गएराह-रौ जीत गएक़ाफ़िले दूर थे मंज़िल से बहुत दूर मगरख़ुद-फ़रेबी की घनी छाँव में दम लेने लगेचुन लिया राह के रेज़ों को ख़ज़फ़-रेज़ों कोऔर समझ बैठे कि बस लाल-ओ-जवाहर हैं यहीराहज़न हँसने लगे छुप के कमीं-गाहों मेंहम-नशीं ये था फ़रंगी की फ़िरासत का तिलिस्मरहबर-ए-क़ौम की नाकारा क़यादत का फ़रेबहम ने आज़ुर्दगी-ए-शौक़ को मंज़िल जानाअपनी ही गर्द-ए-सर-ए-राह को महमिल जानागर्दिश-ए-हल्का-ए-गर्दाब को साहिल जानाअब जिधर देखो उधर मौत ही मंडलाती हैदर-ओ-दीवार से रोने की सदा आती हैख़्वाब ज़ख़्मी हैं उमंगों के कलेजे छलनीमेरे दामन में हैं ज़ख़्मों के दहकते हुए फूलख़ून में लुथड़े हुए फूलमैं जिन्हें कूचा-ओ-बाज़ार से चुन लाया हूँक़ौम के राहबरो राहज़नोअपने ऐवान-ए-हुकूमत में सजा लो इन कोअपने गुल्दान-ए-सियासत में लगा लो इन कोअपनी सद-साला तमन्नाओं का हासिल है यहीमौज-ए-पायाब का साहिल है यहीतुम ने फ़िरदौस के बदले में जहन्नम ले करकह दिया हम से गुलिस्ताँ में बहार आई हैचंद सिक्कों के एवज़ चंद मिलों की ख़ातिरतुम ने नामूस-ए-शहीदान-ए-वतन बेच दियाबाग़बाँ बन के उठे और चमन बीच दिया(2)कौन आज़ाद हुआ?किस के माथे से सियाही छूटीमेरे सीने में अभी दर्द है महकूमी कामदर-ए-हिन्द के चेहरे पे उदासी है वही
मैं ने सोचा था कि इस बार तुम्हारा पैकरमेरे बे-ख़्वाब दरीचों को सुला जाएगामेरे कमरे को सलीक़े से सजा जाएगा
वो सोला-सिंगार किए अपनी ही सोच में खोई हुई हैसाँसों में वो गहरा पन है जैसे बे-सुध सोई हुई हैदिल में सौ अरमान हैं लेकिन मेरी सम्त निगाह नहीं हैयूँ बैठी है जैसे उस के दिल में किसी की चाह नहीं है
छोड़ दे मुतरिब बस अब लिल्लाह पीछा छोड़ देकाम का ये वक़्त है कुछ काम करने दे मुझेतेरी तानों में है ज़ालिम किस क़यामत का असरबिजलियाँ सी गिर रही हैं ख़िर्मन-ए-इदराक परये ख़याल आता है रह रह कर दिल-ए-बेताब मेंबह न जाऊँ फिर तिरे नग़्मात के सैलाब मेंछोड़ कर आया हूँ किस मुश्किल से मैं जाम-ओ-सुबू!आह किस दिल से किया है मैं ने ख़ून-ए-आरज़ूफिर शबिस्तान-ए-तरब की राह दिखलाता है तूमुझ को करना चाहता है फिर ख़राब-ए-रंग-ओ-बूमैं ने माना वज्द में दुनिया को ला सकता है तूमैं ने ये माना ग़म-ए-हस्ती मिटा सकता है तूमैं ने ये माना ग़म-ए-हस्ती मिटा सकता है तूमैं ने माना तेरी मौसीक़ी है इतनी पुर-असरझूम उठते हैं फ़रिश्ते तक तिरे नग़्मात परहाँ ये सच है ज़मज़मे तेरे मचाते हैं वो धूमझूम जाते हैं मनाज़िर, रक़्स करते हैं नुजूमतेरे ही नग़्मे से वाबस्ता नशात-ए-ज़िंदगीतेरे ही नग़्मे से कैफ़-ओ-इम्बिसात-ए-ज़िंदगीतेरी सौत-ए-सरमदी बाग़-ए-तसव्वुफ़ की बहारतेरे ही नग़्मों से बे-ख़ुद आबिद-ए-शब-ज़िंदा-दारबुलबुलें नग़्मा-सरा हैं तेरी ही तक़लीद मेंतेरे ही नग़्मों से धूमें महफ़िल-ए-नाहीद मेंमुझ को तेरे सेहर-ए-मौसीक़ी से कब इंकार हैमुझ को तेरे लहन-ए-दाऊदी से कब इंकार हैबज़्म-ए-हस्ती का मगर क्या रंग है ये भी तो देखहर ज़बाँ पर अब सला-ए-जंग है ये भी तो देखफ़र्श-ए-गीती से सकूँ अब माइल-ए-परवाज़ हैअब्र के पर्दों में साज़-ए-जंग की आवाज़ हैफेंक दे ऐ दोस्त अब भी फेंक दे अपना रुबाबउठने ही वाला है कोई दम में शोर-ए-इंक़लाबआ रहे हैं जंग के बादल वो मंडलाते हुएआग दामन में छुपाए ख़ून बरसाते हुएकोह-ओ-सहरा में ज़मीं से ख़ून उबलेगा अभीरंग के बदले गुलों से ख़ून टपकेगा अभीबढ़ रहे हैं देख वो मज़दूर दर्राते हुएइक जुनूँ-अंगेज़ लय में जाने क्या गाते हुएसर-कशी की तुंद आँधी दम-ब-दम चढ़ती हुईहर तरफ़ यलग़ार करती हर तरफ़ बढ़ती हुईभूक के मारे हुए इंसाँ की फ़रियादों के साथफ़ाक़ा-मस्तों के जिलौ में ख़ाना-बर्बादों के साथख़त्म हो जाएगा ये सरमाया-दारी का निज़ामरंग लाने को है मज़दूरों का जोश-ए-इंतिक़ामगिर पड़ेंगे ख़ौफ़ से ऐवान-ए-इशरत के सुतूँख़ून बन जाएगी शीशों में शराब-ए-लाला-गूँख़ून की बू ले के जंगल से हवाएँ आएँगीख़ूँ ही ख़ूँ होगा निगाहें जिस तरफ़ भी जाएँगीझोंपड़ों में ख़ूँ, महल में ख़ूँ, शबिस्तानों में ख़ूँदश्त में ख़ूँ, वादियों में ख़ूँ, बयाबानों में ख़ूँपुर-सुकूँ सहरा में ख़ूँ, बेताब दरियाओं में ख़ूँदैर में ख़ूँ, मस्जिद में ख़ूँ, कलीसाओं में ख़ूँख़ून के दरिया नज़र आएँगे हर मैदान मेंडूब जाएँगी चटानें ख़ून के तूफ़ान मेंख़ून की रंगीनियों में डूब जाएगी बहाररेग-ए-सहरा पर नज़र आएँगे लाखों लाला-ज़ारख़ून से रंगीं फ़ज़ा-ए-बोस्ताँ हो जाएगीनर्गिस-ए-मख़मूर चश्म-ए-ख़ूँ-फ़िशाँ हो जाएगीकोहसारों की तरफ़ से ''सुर्ख़-आंधी'' आएगीजा-ब-जा आबादियों में आग सी लग जाएगीतोड़ कर बेड़ी निकल आएँगे ज़िंदाँ से असीरभूल जाएँगे इबादत ख़ानक़ाहों में फ़क़ीरहश्र-दर-आग़ोश हो जाएगी दुनिया की फ़ज़ादौड़ता होगा हर इक जानिब फ़रिश्ता मौत कासुर्ख़ होंगे ख़ून के छींटों से बाम-ओ-दर तमामग़र्क़ होंगे आतिशीं मल्बूस में मंज़र तमामइस तरह लेगा ज़माना जंग का ख़ूनीं सबक़आसमाँ पर ख़ाक होगी, फ़र्क़ पर रंग-ए-शफ़क़और इस रंग-ए-शफ़क़ में बा-हज़ाराँ आब-ओ-ताब!जगमगाएगा वतन की हुर्रियत का आफ़्ताब
बेज़ार फ़ज़ा दरपा-ए-आज़ार सबा हैयूँ है कि हर इक हमदम-ए-देरीना ख़फ़ा हैहाँ बादा-कशो आया है अब रंग पे मौसमअब सैर के क़ाबिल रविश-ए-आब-ओ-हवा हैउमडी है हर इक सम्त से इल्ज़ाम की बरसातछाई हुई हर दाँग मलामत की घटा हैवो चीज़ भरी है कि सुलगती है सुराहीहर कासा-ए-मय ज़हर-ए-हलाहल से सिवा हैहाँ जाम उठाओ कि ब-याद-ए-लब-ए-शीरींये ज़हर तो यारों ने कई बार पिया हैइस जज़्बा-ए-दिल की न सज़ा है न जज़ा हैमक़्सूद-ए-रह-ए-शौक़ वफ़ा है न जफ़ा हैएहसास-ए-ग़म-ए-दिल जो ग़म-ए-दिल का सिला हैउस हुस्न का एहसास है जो तेरी अता हैहर सुब्ह-ए-गुलिस्ताँ है तिरा रू-ए-बहारींहर फूल तिरी याद का नक़्श-ए-कफ़-ए-पा हैहर भीगी हुई रात तिरी ज़ुल्फ़ की शबनमढलता हुआ सूरज तिरे होंटों की फ़ज़ा हैहर राह पहुँचती है तिरी चाह के दर तकहर हर्फ़-ए-तमन्ना तिरे क़दमों की सदा हैताज़ीर-ए-सियासत है न ग़ैरों की ख़ता हैवो ज़ुल्म जो हम ने दिल-ए-वहशी पे किया हैजिंदान-ए-रह-ए-यार में पाबंद हुए हमज़ंजीर-ब-कफ़ है न कोई बंद-ए-बपा है''मजबूरी ओ दावा-ए-गिरफ़्तारी-ए-उलफ़तदस्त-ए-तह-ए-संग-आमदा पैमान-ए-वफ़ा है''
नतीजा सुन के कई लोग बद-हवास हुएख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुएसिला मिला है हमें साल भर की मेहनत काचमक रहा है सितारा हमारी क़िस्मत कायही तो वक़्त मिला है हमें मसर्रत काजो फ़ेल हो गए वो किस क़दर उदास हुएख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुएवो इम्तिहान में रातों को जाग कर पढ़नावो नींद आँखों में छाई हुई मगर पढ़नावो आधी रात से बिस्तर पे ता-सहर पढ़नाज़हे-नसीब वो लम्हात हम को रास हुएख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुएजो खेल-कूद में दिन-रात चूर रहते थेहर एक खेल में शामिल ज़रूर रहते थेजो सुब्ह-ओ-शाम किताबों से दूर रहते थेजहाँ में आज वही मुब्तला-ए-यास हुएख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुएजिन्हें था अपनी लियाक़त पे ए'तिबार बहुतजिन्हें ख़ुद अपने क़लम पर था इख़्तियार बहुतजो अपने आप को समझे थे होशियार बहुतउन्हीं के होश उड़े और गुम हवास हुएख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
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