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नज़्म
ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं
गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
दिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्दद
ब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
'अक़्ल की नादिरा-कारी ने बहुत रुख़ बदले
सर्द होती ही नहीं आतिश-ए-गुलज़ार-ए-ख़लील
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
मिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि है
उस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लील
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
एक तस्वीर के दो रुख़ हैं जलाल और जमाल
वही गुलज़ार-ए-ख़लील और वही नार-ए-नमरूद
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
ब-ज़ेर-ए-शाख़-ए-गुल-ए-शगुफ़्ता मैं सूरत-ए-शम्अ' चुप खड़ी हूँ
फ़ज़ा में कोयल की इक सदा है
बिलक़ीस जमाल बरेलवी
नज़्म
वो तुम्हारी शाख़-ए-ज़ैतून वो शाख़-ए-अम्न कहाँ गई
बोली मैं ने तो ला कर तुम्हारे हाथ में दे दी थी
मोहम्मद हनीफ़ रामे
नज़्म
हमेशा सब्ज़ रहेगी वो शाख़-ए-मेहर-अो-वफ़ा
कि जिस के साथ बंधी है दिलों की फ़तह ओ शिकस्त