aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "slide"
पार्क की पहली धूप से मिलनेउँगली से उँगली को थामेसब को हेलो हेलो करतीवॉकी टॉकी दादी पोतीसहज सहज चलती हैं दादीआगे पीछे फिरती पोतीरुकती चलती चलती रुकतीवॉकी टॉकी दादी पोतीघुस आया शायद कोई कंकरपोती की चप्पल के अंदरदादी झुक के झाड़ रही हैंपोती को फटकार रही हैंकितना कहा था जूता पहनोलेकिन तुम किस की सुनती होसॉरी दादी दादी सॉरीकल से जूता ही पहनूँगीपोती आँखें मटकाती हैदादी को यूँ बहलाती हैपार्क में जा कर बैठ गई हैंधूप से ख़ुद को सेंक रही हैंलेकिन पोती क्यों बैठेगीपार्क में आई है दौड़ेगीझूला सी सौ और स्लाइडलेकिन दादी बनी हैं गाईडये न करो ये क्या करती होहै है जो तुम गिर जाती तोतितली के पर तोड़ रही होतौबा तौबा कितनी बुरी होदामन में फिर भर लिए पत्थरफेंको वर्ना दूँगी थप्पड़दादी ने जो दी इक झिड़कीलाल भभूका हो गई पोतीअब दोनों चुप दोनों रूठीउन की तोलो हो गई कट्टीआया तभी ग़ुबारे वालाटन टन घंटी ख़ूब बजातानीले पीले कितने सारेबादल छूने वाले ग़ुबारेलेकिन कैसे पाएगी पोतीदादी से तो हुई है कट्टीसोच सोच के धीरे धीरेबोली ग़ुबारे वाले सेमुझ को एक ग़ुबारा दे दोपैसे दादी जान से ले लोउन से मेरी हुई है कट्टीलेकिन हैं तो मेरी दादीसुन के हँस दीं बोलीं दादीले जीती तू मैं ही हारीभय्या एक ग़ुबारा दे दोइस आफ़त की परकाला कोफ़ित्ना है शैतान की नानीफिर भी जान से दिल से प्यारीले के ग़ुबारा हँसती हँसतीघर को चलीं वो पकड़े उँगलीरुकती चलती चलती रुकतीवॉकी टॉकी दादी पोती
पत्थर के कमरे में उस नेमिट्टी धात नमक कोएटमऔर इस से भी छोटे ज़र्रों में बाँटाइक ऊँची मेज़ पे लेटे वक़्त को क्लोरोफ़ार्म सूँघा करउस के एक एक उज़्व को काटासदियोंबरसों और महीनोंइक इक पल मेंएक तिकोने चिमटे सेएक स्लाइड पर मेरी कुछ साँसें रक्खींशीशे की नलकी सेमेरी गर्दन को हिलाया
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
दिल ख़ुशामद से हर इक शख़्स का क्या राज़ी हैआदमी जिन परी ओ भूत बला राज़ी हैभाई फ़रज़ंद भी ख़ुश बाप चचा राज़ी हैशाद मसरूर ग़नी शाह ओ गदा राज़ी हैजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैअपना मतलब हो तो मतलब की ख़ुशामद कीजेऔर न हो काम तो उस ढब की ख़ुशामद कीजेऔलिया अंबिया और रब की ख़ुशामद कीजेअपने मक़्दूर ग़रज़ सब की ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है की ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैचार दिन जिस को किया झुक के ख़ुशामद से सलामवो भी ख़ुश हो गया अपना भी हुआ काम में कामबड़े आक़िल बड़े दाना ने निकाला है ये दामख़ूब देखा तो ख़ुशामद ही की आमद है तमामजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैबद बख़ील और सख़ी की भी ख़ुशामद कीजेऔर जो शैतान हो तो उस की भी ख़ुशामद कीजेगर वली हो तो वली की भी ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैप्यार से जोड़ दिए जिस की तरफ़ हाथ जो आहवहीं ख़ुश हो गया करते ही वो हाथों पे निगाहग़ौर से हम ने जो इस बात को देखा वल्लाहकुछ ख़ुशामद ही बड़ी चीज़ है अल्लाह अल्लाहजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ीपीने और पहनने खाने की ख़ुशामद कीजेहीजड़े भाँड ज़नाने की ख़ुशामद कीजेमस्त ओ हुशियार दिवाने की ख़ुशामद कीजेभोले नादान सियाने की ख़ुशामद कीजेजौ ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैऐश करते हैं वही जिन का ख़ुशामद का मिज़ाजजो नहीं करते वो रहते हैं हमेशा मोहताजहाथ आता है ख़ुशामद से मकाँ मुल्क और ताजक्या ही तासीर की इस नुस्ख़े ने पाई है रिवाजजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैगर भला हो तो भले की भी ख़ुशामद कीजेऔर बुरा हो तो बुरे की भी ख़ुशामद कीजेपाक नापाक सिड़े की भी ख़ुशामद कीजेकुत्ते बिल्ली ओ गधे की भी ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैख़ूब देखा तो ख़ुशामद की बड़ी खेती हैग़ैर की अपने ही घर बीच ये सुख देती हैमाँ ख़ुशामद के सबब छाती लगा लेती हैनानी दादी भी ख़ुशामद से दुआ देती हैजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैबी-बी कहती है मियाँ आ तिरे सदक़े जाऊँसास बोले कहीं मत जा तिरे सदक़े जाऊँख़ाला कहती है कि कुछ खा तिरे सदक़े जाऊँसाली कहती है कि भय्या तिरे सदक़े जाऊँजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैआ पड़ा है जो ख़ुशामद से सरोकार उसेढूँडते फिरते हैं उल्फ़त के ख़रीदार उसेआश्ना मिलते हैं और चाहे हैं सब यार उसेअपने बेगाने ग़रज़ करते हैं सब प्यार उसेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैरूखी और रोग़नी आबी को ख़ुशामद कीजेनान-बाई ओ कबाबी की ख़ुशामद कीजेसाक़ी ओ जाम शराबी की ख़ुशामद कीजेपारसा रिंद ख़राबी की ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा अराज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैजो कि करते हैं ख़ुशामद वो बड़े हैं इंसाँजो नहीं करते वो रहते हैं हमेशा हैराँहाथ आते हैं ख़ुशामद से हज़ारों सामाँजिस ने ये बात निकाली है मैं उस के क़ुर्बांजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैकौड़ी पैसे ओ टके ज़र की ख़ुशामद कीजेलाल ओ नीलम दर ओ गौहर की ख़ुशामद कीजेऔर जो पत्थर हो तो पत्थर की ख़ुशामद कीजेनेक ओ बद जितने हैं यक-सर की ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैहम ने हर दिल की ख़ुशामद की मोहब्बत देखीप्यार इख़्लास ओ करम मेहर मुरव्वत देखीदिलबरों में भी ख़ुशामद ही की उल्फ़त देखीआशिक़ों मैं भी ख़ुशामद ही की चाहत देखीजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैपारसा पीर है ज़ाहिद है मना जाती हैजुवारिया चोर दग़ाबाज़ ख़राबाती हैमाह से माही तलक च्यूँटी है या हाथी हैये ख़ुशामद तो मियाँ सब के तईं भाती हैजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैगर न मीठी हो तो कड़वी भी ख़ुशामद कीजेकुछ न हो पास तो ख़ाली भी ख़ुशामद कीजेजानी दुश्मन हो तो उस की ख़ुशामद कीजेसच अगर पूछो तो झूटी भी ख़ुशामद कीजेजो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी हैमर्द ओ ज़न तिफ़्ल ओ जवाँ ख़ुर्द ओ कलाँ पीर ओ फ़क़ीरजितने आलम में हैं मोहताज ओ गदा शाह वज़ीरसब के दिल होते हैं फंदे में ख़ुशामद के असीरतो भी वल्लाह बड़ी बात ये कहता है 'नज़ीर'जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी हैहक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है
हम मोहब्बत के निहाँ-ख़ानों में बसने वालेअपनी पामाली के अफ़्सानों पे हँसने वालेहम समझते हैं निशान-ए-सर-ए-मंज़िल पायाहम मोहब्बत के के ख़राबों के मकींकुंज-ए-माज़ी में हैं बाराँ-ज़दा ताइर की तरह आसूदाऔर कभी फ़ितना-ए-नागाह से डर कर चौंकेंतो रहें सिद्द-ए-निगाह नींद के भारी पर्दे
ऐ फ़ल्सफ़ा-गो,कहाँ वो रूया-ए-आसमानी?कहाँ ये नमरूद की ख़ुदाई!तू जाल बुनता रहा है, जिन के शिकस्ता तारों से अपने मौहूम फ़लसफ़े केहम उस यक़ीं से' हम उस अमल से' हम उस मोहब्बत से'आज मायूस हो चुके हैं!कोई ये किस से कहे कि आख़िरगवाह किस अदल-ए-बे-बहा के थे अह्द-ए-तातार के ख़राबे?अजम, वो मर्ज़-ए-तिलिस्म-ओ-रंग-ओ-ख़्याल-ओ-नग़माअरब, वो इक़लीम-ए-शीर-ओ-शहद-ओ-शराब-ओ-खुर्माफ़क़त नवासंज थे दर-ओ-बाम के ज़ियाँ के,जो उन पे गुज़री थीउस से बद-तर दिनों के हम सैद-ए-नातवाँ हैं!कोई ये किस से कहे:दर-ओ-बाम,आहन ओ चोब ओ संग ओ सीमाँ केहुस्न-ए-पैवंद का फ़ुसूँ थेबिखर गया वो फ़ुसूँ तो क्या ग़म?और ऐसे पैवंद से उमीद-ए-वफ़ा किसे थी!
जिन्हें ज़ेर कर न सका सितम हुए सैद-ए-सिलसिला-ए-करमतिरी नेकियों ने तिरी क़सम सर-ए-ख़ुद-सरी को झुका दिया
शाहिद-ए-बज़्म-ए-सुख़न नाज़ूरा-ए-मअ'नी-तराज़ऐ ख़ुदा-ए-रेख़्ता पैग़मबर-ए-सोज़-अो-गुदाज़यूसुफ़-ए-मुल्क-ए-मआनी पीर-ए-कनआ'न-ए-सुख़नहै तिरी हर बैत अहल-ए-दर्द को बैत-उल-हुज़नऐ शहीद-ए-जलवा-ए-मानी फ़क़ीर-ए-बे-नियाज़इस तरह किस ने कही है दास्तान-ए-सोज़-अो-साज़है अदब उर्दू का नाज़ाँ जिस पे वो है तेरी ज़ातसर-ज़मीन-ए-शेर पर ऐ चश्मा-ए-आब-ए-हयाततफ़्ता-दिल आशुफ़्ता-सर आतिश-नवा बे-ख़ेशतनआह तेरी सीना-सोज़ और नाला तेरा दिल-शिकनख़त्म तुझ पर हो गया लुत्फ़-ए-बयान-ए-आशिक़ीमर्हबा ऐ वाक़िफ़-ए-राज़-ए-निहान-ए-आशिक़ीसर-ज़मीन-ए-शेर काबा और तू इस का ख़लीलशाख़-ए-तूबा-ए-सुख़न पर हमनवा-ए-जिब्रईलजोश-ए-इस्तिग़्ना तिरा तेरे लिए वजह-ए-नशातशान-ए-ख़ुद्दारी तिरी आईना-दार-ए-एहतियातबज़्म से गुज़रा कमाल-ए-फ़क़्र दिखलाता हुआताज-ए-शाही पा-ए-इस्ति़ग़ना से ठुकराता हुआथा दिमाग़-ओ-दिल में सहबा-ए-क़नाअत का सुरूरथी जवाब-ए-सतवत-ए-शाही तिरी तब-ए-ग़यूरमौजा-ए-बहर-ए-क़नाअत तेरी अबरू की शिकनतख्त-ए-शाही पर हसीर-ए-फ़क़्र तेरा ख़ंदा-ज़नथा ये जौहर तेरी फ़ितरी शाइरी के रूतबा-दाँइज़्ज़त-ए-फ़न थी तिरी नाज़ुक-मिज़ाजी में निहाँमुल्तफ़ित करता तुझे क्या अग़निया का कर्र-ओ-फ़र्रथा तिरी रग रग में दरवेशों की सोहबत का असरदिल तिरा ज़ख़्मों से बज़्म-ए-आशिक़ी में चूर हैजिस सुख़न को देखिए रिसता हुआ नासूर हैबज़्म-गाह-ए-हुस्न में इक परतव-ए-फ़ैज़-ए-जमालसैद-गाह-ए-इश्क़ में है एक सैद-ए-ख़स्ता-हालदेखना हो गर तुझे देखे तिरे अफ़्कार मेंहै तिरी तस्वीर तेरे ख़ूँ-चकाँ अशआ'र मेंसैर के क़ाबिल है दिल सद-पारा उस नख़चीर काजिस के हर टुकड़े में हो पैवस्त पैकाँ तीर काआसमान-ए-शेर पर चमके हैं सय्यारे बहुतअपनी अपनी रौशनी दिखला गए तारे बहुतअहद-ए-गुल है और वही रंगीनी-ए-गुलज़ार हैख़ाक-ए-हिंद अब तक अगर देखो तजल्ली-ज़ार हैऔर भी हैं माअ'रके में शहसवार-ए-यक्का-ताज़और भी हैं मय-कदे में साक़ियान-ए-दिल-नवाज़हैं तो पैमाने वही लेकिन वो मय मिलती नहींनग़्मा-संजों में किसी से तेरी लय मिलती नहींसाहिबान-ए-ज़ौक़ के सीनों में थी जिस की खटकतैरते हैं दिल में वो सर-तेज़ नश्तर आज तककारवान-ए-रफ़्ता को था तेरी यकताई पे नाज़अस्र-ए-मौजूदा ने भी माना है तेरा इम्तियाज़हो गए हैं आज तुझ को एक सौ बाईस सालतो नहीं ज़िंदा है दुनिया में मगर तेरा कमालहक़ है हम पर याद कर के तुझ को रोना चाहिएमातम अपनी ना-शनासी का भी होना चाहिएढूँडते हैं क़ब्र का भी अब निशाँ मिलता नहींऐ ज़मीं तुझ में हमारा आसमाँ मिलता नहीं
अल-ग़रज़ इक न इक ग़म-ए-गुल-ओ-ख़ारफ़लसफ़े का ख़ुमार इश्क़ का बारदिल को इक सुब्ह-ओ-शाम का आज़ारहसरत-ए-सुल्ह-ओ-हसरत-ए-पैकारसैद-ए-इबलीस-ओ-कुश्ता-ए-यज़्दाँ
ऐ यार-ए-ग़याब 'मजीद-अमजद'ख़ामोश शिकार-ए-रश्क-ओ-हसदबे-तश्हीरी के सैद-ए-ज़बूँकब झंग में आ कर तुझ से कहूँले वो सच वापस आया हैजो जिस का हक़ हो एक न एक दिन उस ने पूरा पाया है
मैं ज़िंदा थामगर मैं तेरे सुर्ख़ नील-गूँ सफ़ेद बुलबुले में क़ैद थाहवा वसीअ थी मगर हुदूद से रिहा न थीन मेरे पर शिकस्ता थे न मेरी साँस कमथा बुलबुले की काएनात में मिरा ही दम-क़दममगर मिरी उड़ान सुर्ख़ नील-गूँ सफ़ेद मक़बरे केआख़िरी ख़ुतूत से सिवा न थीमैं हाल के अथाह पानियों में ग़र्क़या गुज़शता वक़्त के भँवर के दस्त-ए-आतिशीं में एक सैद-ए-ज़र्द था
ख़ुश हैं ऐसे लोग दुनिया में जो ख़ुश-ख़ूराक हैंऔर उन लोगों के दस्तर-ख़्वान हैबतनाक हैंउन के दस्तर-ख़्वान पे ख़ुशबू मिसाली चाय कीचार अंडे छे स्लाइस दस पियाली चाय कीहो गए जब चाय की लज़्ज़त से दिल-बर्दाश्ताखा लिए आधा किलो अंगूर ब'अद-अज़-नाश्ताजब कहीं मौक़ा मिला थोड़ा सा बिस्कुट खा लियानोश-ए-जाँ फ़रमा लिया फिर पान सिगरेट छालियादोपहर में छे चपाती चार अंडे आॉमलेटचार-छे शामी कबाब और इक नहारी के प्लेटकोफ़ते हस्ब-ए-लियाक़त एक लस्सी का गिलासखा गए और पी गए मौसूफ़ बे-ख़ौफ़-ओ-हिरासदावतों के जाल फैलाए हुए हैं हर तरफ़कह दिया खाने से पहले ही तकल्लुफ़-बर-तरफ़रात को थोड़ी सी जेली कुछ मुरब्बा आम काकुछ पपीता ले लिया फिर हाज़मे के नाम कादो पराठे ले लिए कुछ देर सुस्ताने के ब'अद''इक तिरे आने से पहले इक तिरे जाने के ब'अद''
हाँ ऐ मसाफ़-ए-हस्ती! मत पूछ मुझ से क्या हूँइक अर्सा-ए-बला हूँ इक लुक़मा-ए-फ़ना हूँमजबूरियों ने डाला गर्दन में मेरी फंदाख़ुद-कर्दा-ए-वफ़ा हूँ जाँ-दादा-ए-रज़ा हूँसय्याद हादसे का करता है मेरा पीछामुर्ग़-ए-बुरीदा-पर हूँ सैद-ए-शिकस्ता-पा हूँहै ज़ात मेरी मजमा' सारी बुराइयों काकहने को मैं बड़ा हूँ लेकिन बहुत बुरा हूँआज़ादियों की मुझ पर तोहमत ही है सरासरमैं क़ैदी-ए-हवस हूँ मैं बंदा-ए-हवा हूँइक बात हो बताऊँ इक दर्द हो सुनाऊँरोऊँ भला कहाँ तक कब तक पड़ा कराहूँकम-बख़्त दिल कुछ ऐसा मैं साथ ले के आयाइक लम्हा जिस के हाथों दुनिया में सुख न पायाजो जोश इस में उट्ठा हालात ने दबायाजो शो'ला इस में भड़का तक़दीर ने बुझायाउम्मीद का ये ग़ुंचा खिलते कभी न देखाये आरज़ू का पौदा फलता नज़र न आयागो इस में मौजज़न थी क़ौम ओ वतन की उल्फ़तलेकिन ग़रज़ ने इस को कुछ और ही सिखायाहोती नहीं रसाई उम्मीद के उफ़ुक़ तकतूल-ए-अमल ने इस को इक जाल में फँसायाकी रहबरी ख़िरद ने हर-चंद रहनुमाईइस जुहद पर भी लेकिन खुलती नहीं सच्चाईपाया न मैं ने अब तक मक़्सद का अपने साहिलकी बहर-ए-मा'रफ़त में दिन रात आश्नाईइस जुस्तुजू में मैं ने की सैर-ए-तूर-ओ-ऐमनपर्बत को घर बनाया जंगल से लौ लगाईमंदिर को जा के देखा गिरजा में जा के ढूँडामस्जिद को छान मारा उस की न दीद पाईजोगी का रूप धारा बन में किया गुज़ारातन पर भभूत मल कर धूनी बहुत रमाईजप तप में उम्र अपनी मैं ने बसर की अक्सरबन बन के पीर-ए-राहिब जा ख़ानक़ाह बसाईसूफ़ी भी बन के देखा और रिंद-ए-बे-रिया भीकर नारा-ए-अना-अल-हक़ इक खलबली मचाईफिरती हैं मारी मारी मुश्ताक़-ए-जल्वा आँखेंपर इक झलक से बढ़ कर देता नहीं दिखाईउठ जा नज़र से मेरी हाँ ऐ हिजाब-ए-हस्तीहुस्न-ए-अज़ल निहाँ है ज़ेर-ए-नक़ाब-ए-हस्तीये ज़िंदगी-ए-इंसाँ इक ख़्वाब है परेशाँबेदारी-ए-अदम है ता'बीर-ए-ख़्वाब-ए-हस्तीदेखें अगर तो क्यूँ-कर हम जलवा-ए-मआरिफ़तू ज़ुल्मत-ए-नज़र है ऐ आफ़्ताब-ए-हस्तीतस्कीं को ज़हर-ए-क़ातिल आब-ओ-हवा-ए-आलमराहत का दुश्मन-ए-जाँ हर इंक़लाब-ए-हस्तीऐ तिश्ना-ए-हक़ीक़त धोके में तू न आनाइक दाम-ए-पुर-ख़तर है मौज-ए-सराब-ए-हस्तीचाहे अगर रिहाई पेश-अज़-फ़ना फ़ना होपादाश-ए-जुर्म-ए-हस्ती है ये अज़ाब-ए-हस्ती
तुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वालेये कार-गाह-ए-हस्ती बाज़ार-ए-औज-ओ-पस्तीले देख हो रही है बेचैनियों की बस्तीतुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले2फूलों के चाक दामाँ ग़ुंचों में सोज़-ए-पिन्हाँगुलशन बहार में भी बे-कैफ़-ओ-दर्द-सामाँसोज़-ए-दरूँ नहीं है जोश-ए-जुनूँ नहीं हैदिल ही से आशिक़ी थी दिल ही में ख़ूँ नहीं हैपैमाने उठ गए हैं मयख़ाने उठ गए हैंवीरानियाँ सलामत दीवाने उठ गए हैंतुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले3मामूर-ए-ग़म है दुनिया दार-ए-अलम है दुनियादाम-ए-तवंगरी में सैद-ए-सितम है दुनियाआरे से चल रहे हैं नक़्शे बदल रहे हैंइंसाँ का ख़ून पी कर इंसान पल रहे हैंमफ़क़ूद ख़ुर्रमी है हर बज़्म मातमी हैइस ग़म-कदे की हर शय गोया जहन्नमी हैतुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले4ऐ कार-साज़-ए-आलम ऐ बे-नियाज़-ए-आलममा'मूर-ए-सोज़-ए-ग़म है कब से ये साज़-ए-आलममायूस हो चुके हैं हिम्मत ही खो चुके हैंइंसाँ भलाइयों की क़िस्मत को रो चुके हैंबर्बाद हो रहे हैं नाशाद हो रहे हैंबंदे तिरे सरापा फ़रियाद हो रहे हैंतुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले5हैवान भी नहीं हैं इंसान भी नहीं हैंइंसाँ-नुमा दरिंदे शैतान भी नहीं हैंये ज़ोहद की दुकानें ये मासियत की कानेंये वाइ'ज़ों के मुँह में चलती हुई ज़बानेंफ़िरऔन हो रहे हैं मलऊन हो रहे हैंमज़हब-फ़रोश मुल्ला क़ारून हो रहे हैंतुझ को भी कुछ ख़बर है दुनिया बनाने वाले6ऐ बे-नियाज़-ए-हस्ती ऐ कार-साज़-ए-हस्तीकब तक रहेगा यूँही पोशीदा राज़-ए-हस्तीकोई नहीं हमारा कोई नहीं सहाराकिस सम्त बह रही है ये ज़िंदगी की धाराफ़िक्र-ए-दवा नहीं है ज़िक्र-ए-दुआ नहीं हैदिल कह रहा है अब तो कोई ख़ुदा नहीं हैतुझ को भी कुछ ख़बर है तुझ को भी कुछ ख़बर है
थमी हुई है देर से बारिशदेर से इक काग़ज़ की कश्तीतैर रही है पानी मेंकश्ती जिस काग़ज़ से बनी हैउस पर कोई फूल बना हैफूल जो इस दुनिया का नहीं हैदो चींटे कश्ती के मुसाफ़िर बने हुए हैंडग-मग डग-मगडग-मग डग-मगकाग़ज़ अब गलने भी लगा हैकश्ती साइड स्टैंड वाली इक साइकल जैसेएक तरफ़ को झुकी हुई हैएक भी झोंकाउस कश्ती पर एक क़यामत ला सकता है
लब-ए-जू-ए-मय ख़ामुशीऔर सैद-ए-फ़ुग़ाँ कोई हर्फ़-ए-तकल्लुमकहीं रहगुज़र पर मिरे चश्म-ओ-लबऔर आवाज़ से रौशनी की कशाकशबहुत फ़ासला है मिरे और मेरे तसव्वुर के साहिल मेंउस से परे इक जहान-ए-दिगर है
अंधेरा हर तरफ़ छाया हुआ हैअंधेरा ही अज़ल है और अंधेरा ही अबद की जोत है शायदइसी तारीक चादर की तहों मेंअदम के ख़्वाब से तारीख़ जागीइसी तारीक चादर में तमद्दुन मुस्कुराया खिलखिलाया जगमगायायही तारीक चादर ख़ावर-ए-तहज़ीब का मशरिक़ बनी आख़िरयही तारीक चादर ओढ़ कर हैवानियत ने रूप धारण कर लिए लाखोंइसी तारीक चादर में सिमट कर गुम हुई हस्तीयही मशरिक़ यही मग़रिबअंधेरा ही अज़ल है और अंधेरा ही अबद की जोत है शायदअंधेरे की इसी दीवार-ए-चीं कोकभी 'सुक़रात' की हिकमत ने ढायाकभी ईसा के ख़ून-ए-गर्म-ओ-ताज़ा ने किया रंगींकभी गौतम की मौसीक़ी के सायों ने इसे घेराकभी ज़र्ब-ए-मोहम्मद ने किया टुकड़ेहुसैन इब्न-ए-अली के ख़ून-ए-नाहक़ के थपेड़ों से कभी काँपी कभी लर्ज़ीफ़ज़ा में एक चिंगारी सी तड़पीऔर उस के बाद उस के बादछाई फिर वही मनहूस तारीकी वही मनहूस तारीकीअंधेरा ही अज़ल है और अंधेरा ही अबद की जोत है शायदअंधेरे की जबीन-ए-आहनी सेये कैसी जोत फूटी मुस्कुराई जगमगाईये किस की मुस्कुराहट से बनी इंसानियत गुलशनये किस ने हिन्द की तारीक दुनिया को किया रौशनदुखी दुनिया सितारों से बनी दुल्हनज़मीर-ए-ज़िंदगी में करवटें लेने लगी इक मुस्तक़िल धड़कनवरक़ तारीख़ ने तेज़ी से उल्टेतग़य्युर ले के साज़-ओ-बर्ग-ए-ता'मीर-ए-जहाँ आयाबनी आदम की दुनिया को सजानेदिल-ए-सुक़रात-ओ-ईसा झूम उट्ठेजबीन-ए-बुध से निकली इक नई जोतअंधेरे ही से फूटा इक नया सौतअंधेरा अपनी हस्ती खो रहा हैअंधेरा नूर में हल हो रहा हैनए दीपक की जोती मुस्कुराईजहाँ को कर दिया रौशनजहाँ को मानवता को ज़िंदगी को क़ल्ब-ओ-जाँ को कर दिया रौशनसियह-ख़ाने में अपना जाल ले आए नए ख़ाकेनई दुनिया बनाने की तमन्ना के नए ख़ाकेकि फिर ज़ालिम अंधेरा जंग-जू हासिद अंधेरालिए तारीकियों के जाल आयानिगार-ए-अम्न के दीपक पे टूटाकभी किरनों कभी दीपक को लूटाज़मीं से आसमाँ तक मौज-ए-ख़ूँ हैअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बूँ हैअंधेरा ही अज़ल है और अंधेरा ही अबद की जोत है शायदअगर सुक़रात का दीपक है रौशनसिराज-ए-इब्न-ए-मरियम गर अबद तक बुझ नहीं सकताकोई झोंका अगर शम्अ-ए-शहीद-ए-कर्बला को छू नहीं सकतातो ऐ तारीक दुनिया तो ऐ मायूस इंसाँबुझा सकती नहीं है कोई आँधीयुंही रौशन रहेगी शम्अ'-ए-गाँधी
धूप की सरगोशी सेज़मीन की भुर्भुरी मिट्टी मुर्तइश हुईसफ़ेदी सुर्ख़ी में ढलीया फिर ज़रख़ेज़ी बंजर हुईहैरत तज़ब्ज़ुब का शिकार हैथकन ज़िंदगी से बढ़ रही हैउखड़ती साँसों कीअलविदाई महक सेकमरा उदास हैसाइड टेबल पे धरे पेनऔर डायरीमुंतज़िर हैंशायदकि आख़िरी शाम उन पे दर्ज की जाएपलकों के पीछेछुपी आँखों के ख़्वाब नीले हो चुके हैंइंतिज़ार की आख़िरी करवट से संजीदा सी हँसी की आमेज़िशलहू रंगआँसूओं में घुल कर सो गई हैधूप का ज़ाइक़ा हिफ़्ज़ करना आसान नहीं होता
पामाल-ए-फ़क़्र-ओ-ज़िल्लत हैं इज़्ज़-ओ-शान वालेसैद-ए-ग़म-ओ-अलम हैं तीर-ओ-कमान वालेबेनाम-ओ-बे-निशाँ हैं नाम-ओ-निशान वालेबे-ताब-ओ-बे-तवान हैं ताब-ओ-तवान वालेअब उन पे रहम फ़रमा ओ आसमान वालेहैं सख़्त मुश्किलों में हिन्दोस्तान वाले
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