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नज़्म
यही दस बीस अगर हैं कुश्तागान-ए-ख़ंजर-अंदाज़ी
तो मुझ को सुस्ती-ए-बाज़ू-ए-क़ातिल की शिकायत है
शिबली नोमानी
नज़्म
कभी सूरज नहीं निकला तो सुस्ती की सज़ा देंगे
उठक-बैठक कराएँगे उसे मुर्ग़ा बना देंगे