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नज़्म
जो मिस्री और के मुँह में दे फिर वो भी शक्कर खाता है
जो और तईं अब टक्कर दे फिर वो भी टक्कर खाता है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जिस ख़ाल-ओ-ख़द की नज़ाकत की परछाइयाँ थीं
तुझे क्या ख़बर ये किन आँखों की बीनाइयाँ थीं
इशरत आफ़रीं
नज़्म
जिस ख़ाल-ओ-ख़द की नज़ाकत की परछाईयाँ थीं
तुझे क्या ख़बर ये किन आँखों की बीनाइयाँ थीं