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नज़्म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
अल-अमाँ ऐ तेरे मसनूई तबस्सुम का फ़रेब
थरथरा उठती है जिस के ज़ोर से नब्ज़-ए-शकेब
माहिर-उल क़ादरी
नज़्म
क़दम दो चार ले कर तुम जो इक-दम लड़खड़ाई थीं
मिरी साँसें मिरे सीने के अंदर थरथराई थीं
अफ़ीफ़ सिराज
नज़्म
फ़ज़ा में मौत के तारीक साए थरथराते हैं
हवा के सर्द झोंके क़ल्ब पर ख़ंजर चलाते हैं