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नज़्म
टिकियाँ ये आलूओं की इस पर मज़े के छोले
लज़्ज़त जो उन की पाए गूँगा ज़बान खोले
अब्दुल मतीन नियाज़
नज़्म
गए ठिकानों पे उल्लुओं के उदास मस्कन
कबूतरों के वो आलने हैं कि जिन में सन्नाटे बोलते हैं
सआदत सईद
नज़्म
ख़ुदा भी अपनी रहमत से तुम्हारी झोली भर देगा
तुम अपनी अपनी रोटी का निवाला बाँटते रहना
सरदार पंछी
नज़्म
आहूओं की सुर्मगीं पलकें फ़ज़ा पर हुक्मराँ
छाई हैं अर्ज़ ओ समा पर आहनीं सी जालियाँ