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नज़्म
मुंजमिद लावे में अकड़े हुए इंसानों के गुच्छे थे वहाँ
आग और लावे से घबरा के जो लिपटे हों गे
गुलज़ार
नज़्म
चौक चौक पर गली गली में सुर्ख़ फरेरे लहराते हैं
मज़लूमों के बाग़ी लश्कर सैल-सिफ़त उमडे आते हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
ज़मीं से उखड़े जाते हैं दरख़्तों के क़दम पैहम
चटानें रूप बदले ज़ेर-ए-लब कुछ पढ़ती जाती हैं