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नज़्म
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे
गुलज़ार
नज़्म
इस बख़्शिश के इस अज़्मत के हैं बाबा नानक शाह गुरु
सब सीस नवा अरदास करो और हर दम बोलो वाह गुरु
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तमाशा है अहा हा-हा ग़नीमत है ये आलम भी
उठाना हाथ प्यारे वाह-वा टुक देख लें हम भी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
साथ इक दोस्त के इक दिन जो मैं गुलशन में गया
वाँ के सर्व-ओ-सुमन-ओ-लाला-ओ-गुल को देखा
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ये कोई जादू है या सच-मुच है इक रंगीं कमाँ
वाह वा कैसा भला लगता है ये प्यारा समाँ
हफ़ीज़ जालंधरी
नज़्म
आज का दिन कैसा बा-रौनक़ है बच्चो वाह वाह
मर्द बूढे हों कि बच्चे जा रहे हैं ईद-गाह