अधूरा लम्स

सीमीं दुर्रानी

अधूरा लम्स

सीमीं दुर्रानी

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    ग़ज़ाली आँखें, सुतवाँ नाक, ख़ूबसूरत होंट, किताबी चेहरा, लंबी गर्दन जिस पर तिल की मौजूदगी इस बात की ‘अलामत थी कि शायद ख़ुदा ने नज़र-ए-बद के डर से टीका लगा डाला। नाज़ुक-अंदाम और सर्व-क़द। ये किसी शा’इर का ख़्वाब नहीं बल्कि जीती-जागती सौम्या थी। इंतिहाई ज़हीन और ज़िंदगी से भरपूर। ख़ुद पर ग़ुरूर, हुस्न का नहीं बल्कि ‘औरत होने का। उसको आईने की परवाह ही थी कि क्या बोलता है। उसके लिए आईने का काम वो तमाम नज़रें करती थीं जो कि उसके हुस्न-ए-अंदाम को ख़िराज-ए-तहसीन पेश करते थकतीं।

    इन सब बातों से बे-परवाह वो अपना ‘औरत होने के ग़ुरूर में ज़िंदगी बिताए जा रही थी। जिसके नज़दीक मर्द का वजूद एक पत्थर से कम था, जिसको वो जब चाहे ठोकर मार कर अपने रास्ते से हटा सकती थी, कि उसने सुन और पढ़ रखा था कि मर्द मजाज़ी ख़ुदा है और उसका मानना था कि ख़ुदा पत्थर से बना है पसंद आए तो तोड़ दो। मूर्ती बना कर पूजोगी भी तो उसपे क्या असर होना है। पत्थर चाहे मूर्ती हो या रास्ते में पड़ा एक कंकर, कोई फ़र्क़ नहीं। ये थे विचार उस मग़रूर और हसीन लड़की के। माँ लाख पीछे पड़ती कि शादी कर ले मगर वो रोज़ एक नई शर्त ले आती। अम्माँ शक्ल और क़द देख लेना। कभी कहती आ’ला अफ़्सर हो। कभी ये कभी वो। माँ लाचार और बेबस बेटी के तेवर ही मिलते थे। आख़िर थक कर माँ बोली जिससे तू राज़ी उससे मैं राज़ी। बोल। सौम्या बोली कोई मेरे क़ाबिल हो तो बताऊँ ना। एम.बी.ए. किया और एक बड़ी कंपनी में मैनेजर हो गई। अब तो क्या ही कहने बेगम सौम्या के। ख़ुद आगाही के बा’द ख़ुद-शनासी का मौक़ा’ मिला तो वो सातवें आसमान से जा लगी। मुहब्बत पर उसका यक़ीन ये था कि ये उसके नज़दीक एक बे-वक़ूफ़ी का खेल था इसलिए हर एक ‘आशिक़ का मज़ाक़ उड़ाना और उसका दिल तोड़ना उसका महबूब मशग़ला था।

    जब भी लड़कों की चौकड़ी बैठती ये ज़िक्र ज़रूर होता कि वो किस के हत्थे चढ़ेगी। कोई कहता होगा कोई गुलफ़ाम, कोई कहता किसी अमीर को फांसेगी ये कम-बख़्त। हमारे तो हाथ आई। जब कि बहुत से तो उसके साथ रात गुज़ारने की शर्त भी जीत चुके थे और उसे मा’लूम ही था कि वो कितनों की दाश्ता मशहूर है। ये होता है हसीन होने का जुर्म और मर्द की ज़हनियत।

    एक दिन वो यूँही वक़्त-गुज़ारी को इंटरनैट पर बैठी थी कि उसको एक मैसेज आया। उसने बात शुरू’ कर दी। बंदा अनदेखा था मगर ज़हानत सौम्या की कमज़ोरी थी, दूसरा वो शख़्स उसके हुस्न से बे-आश्ना। बात शुरू’ भी हुई थी कि सौम्या ख़त्म हो गई। कुछ दिन तो यूँही सिलसिला चलता रहा और वक़्त गुज़ारी होती रही। फिर सौम्या को नदीम की ‘आदत सी होने लगी। एक रात वो सो रही थी कि घबरा कर उठ बैठी, उसको लगा कि वो किसी ‘इफ़रीत की जकड़ में है। पानी पिया और मुकम्मल जाग गई। वो जकड़ी जा चुकी थी मुकम्मल तौर पर। कहते हैं मुहब्बत का मज़ाक़ मत उड़ाओ, ये तुमको मज़ाक़ बना देती है। ये इतनी हसीन देवी है कि जान का नज़राना भी वार दो तो कभी-कभी तुम्हारे बर्बाद नहीं होती।

    मुहब्बत होती तो आज मंसूर भी होता। उसको भी तो मुहब्बत ने सूली पर चढ़ाया था ना। क्या ख़ुद ख़त्म हुई? आज भी वही शान है इसकी। किसी ने मुहब्बत पर उँगली उठाई कभी, बदनाम हुआ बर्बाद हुआ बेकार हुआ तो सिर्फ़ इंसान। मुहब्बत की शान में तो सिर्फ़ क़सीदे लिखे गए। क्यों हो ख़ुदाई-सिफ़त है जो इंसानों में फूँक मारने वाले रहमान का वस्फ़ है। जब इंसान में रूह फूँकी जाती है तो उसमें बारी-त’आला की इतनी मुहब्बत होती है कि चाहते हुए भी वो ज़ालिम से ज़ालिम इंसान में सरायत कर जाती है। और फिर ‘औरत का तो मुक़ाम ही अलग है। वो तो ख़ालिक़ की तख़्लीक़ात में से वो वाहिद मख़्लूक़ है जो ख़ल्क़ करती है। ये ख़ल्क़ करने का ‘अमल ‘औरत के लिए विसाल से लेकर जनम देने तक कितना तकलीफ़-देह है कोई नहीं जानता लेकिन ये ‘औरत ही है जो दुबारा अपना ख़ूँ पिलाने पर आमादा हो कर दुबारा जनम देने को तैयार रहती है। अगर कोख सूखी हो तो क्या ‘औरत की ममता मर जाती है??? तो बस उसके अंदर का ख़ूँ जो कि तख़्लीक़ के काम आता है मज़ीद जोश मारता है और उसकी रूह को हर वक़्त इक लावे की तरह पिघलाता रहता है।

    उसकी मामता उसके अंदर काँटे चुभोती है कि मुझे बचा दे, मैं कहाँ जाऊँ। अगर तू बाँझ है तो मेरा क्या क़ुसूर। मुझे तो तेरे वजूद के साथ ही फूँका गया था। सौम्या मुहब्बत में गिरफ़्तार हो चुकी थी सर से पाँव तक। वो घबरा गई क्योंकि अब वो क़ैद थी नदीम की मुहब्बत के पिंजरे में। ये वो शख़्स था जिसको उसने देखा सुना, वो सिर्फ़ था और वो भी चुभती हुई। वो कोई कामयाब इंसान था। बी.ए. के बा’द एक दूकान पर सेल्ज़-मैन का काम करता था। सारा हफ़्ता पैसा जमा’ करता कि किसी तरह सौम्या से फ़ोन पर बात कर सके। और वो भी उसके फ़ोन के इंतिज़ार में रहती। लंबी बातें होतीं, शराबी भी था और ‘औरत का मज़ा भी ख़ूब चख चुका था, हर मौज़ू’ पर बात करते दोनों और वो दूसरी ‘औरतों और उनसे उसकी क़ुर्बत के क़िस्से सुनकर जलती-भुनती मगर ज़ाहिर होने देती। वो तो बस इस इंतिज़ार में रहती कि नदीम कहीं से कोई बोतल चढ़ाए और फ़ोन करे क्योंकि नशे में वो जो बोलता उसका सुरूर सौम्या को कई दिनों बहकाए रखता और वो ख़ुद को बादलों में उड़ता महसूस करती।

    अगर किसी को भी ‘इल्म होता कि सौम्या एक निकम्मे सेल्ज़-मैन की मुहब्बत में गिरफ़्तार है तो कोई यक़ीन ही करता। ‘ऐन-मुमकिन था कि एक-दो नाकाम ‘आशिक़ जो आस लगाए बैठे थे फंदा ही डाल लेते।

    आख़िर उसने और नदीम ने मिलने का फ़ैसला किया। सौम्या ने कार ली और लाइब्रेरी जा पहुँची। कोई और होती तो नदीम को देखकर पलट जाती मगर... सौम्या ने मुहब्बत की थी... उसकी पहली और यक़ीनन आख़िरी मुहब्बत। एक ‘औरत की मुहब्बत। जो ख़ालिक़ भी हैं और मुवह्हिद भी... नदीम एक इंतिहाई साँवला, मोटा और बे-डौल इंसान था। ये हरगिज़ नहीं कहा जा सकता कि नदीम की लाटरी निकल आई थी। मुहब्बत में लाटरी नहीं होती। मुहब्बत ख़ुदा का तोहफ़ा है। उसकी ‘अता-कर्दा वो ने’मत है जो कायनात को चलाए जा रही है। नदीम शश्दर रह गया। उसकी तवक़्क़ो’ और तख़य्युल से बढ़कर एक हसीन मुजस्समा उसके सामने खड़ा था। दोनों में मुलाक़ातों का सिलसिला शुरू’ हो गया। पहले हर हफ़्ते फिर हर-रोज़ फिर सारा-सारा दिन दोनों घूमते, झगड़ते और बातें करते फिरते। वो उसको दूसरी ‘औरतों के क़िस्से मज़े ले-ले के सुनाता और वो आग-बगूला होती रहती मगर मुँह से कुछ बोलती। देखने वाले इस बे-हंगम जोड़े पर हैरान रहते कि अल्लाह ने इस मर्द को किस ने’मत से नवाज़ा है। मगर सौम्या को इसकी क्या परवाह थी। उसके दिन रात सिर्फ़ नदीम के लिए थे। ऑफ़िस पहुँच कर वो मीटिंग का बहाना करती, गाड़ी उठाती और सारा दिन नदीम के साथ बिताती।

    वक़्त गुज़रता गया, जुनूँ बढ़ता गया... मगर दिलचस्प बात ये कि नदीम जो ‘औरत का रसिया रह चुका था, उसने कभी सौम्या को छुआ तक नहीं। अगर कभी वो क़रीब आता तो वो उसे पीछे धकेल देती और वो ख़ामोश हो जाता।

    मुहब्बत में जिस्म अमर है मगर उसके बग़ैर मुहब्बत की तकमील उसको ख़ुदाई दर्जा देती है। बंदे और उसके रब का रिश्ता पाकी इसीलिए रखता है कि उसमें क़ल्ब-ओ-रूह का ‘अमल है। सौम्या जो नाक पर मक्खी बैठने देती थी, जिसकी उड़ान देखकर उसकी माँ परेशान रहती थी। उसने एक दिन नदीम से शादी का तक़ाज़ा कर डाला। नदीम शश्दर रह गया। वो नाकारा ना-काम इंसान इस बात से ब-ख़ूबी वाक़िफ़ था कि वो कभी भी सौम्या को वो माद्दी ख़ुशियाँ नहीं दे पाएगा जिसकी वो उसे हक़-दार समझता है। नदीम ने उसे बताया कि उसके वालिदैन काफ़ी सख़्त और पुराने ख़यालात के लोग हैं और उसकी भाभियाँ भी एक जहन्नुम ही झेल रही हैं। सौम्या तो मुहब्बत में अंधी थी, तैयार हो गई। मगर फिर एक ‘अजीब सोच ने उसके ज़हन में जनम लिया और वो ख़ामोश होगी। हमेशा उसके साथ रहने के लिए सौम्या ने उसे कभी पाने का फ़ैसला कर लिया। जिस्म का इस्ति’माल दूसरी रूह को तो जनम देता है मगर उसके बा’द आपकी रूह किस हद तक टूट-फूट का शिकार होगी उसकी कोई गारंटी नहीं।

    नदीम लाख कोशिश के बावुजूद घर में बात कर पाया। इसी दौरान नदीम के माँ-बाप ने उसकी बात पक्की कर दी। सौम्या को ‘इल्म हुआ तो उसने सिर्फ़ एक बात कही। जब भी जहाँ भी शादी करो मुझे उस लम्हे उस वक़्त और उस दिन की ख़बर हो। वो अक्सर उससे इसकी मंगेतर का पूछती। ‘अजीब मुहब्बत थी नदीम की। किसी और के साथ निस्बत ने उसकी मुहब्बत के पैमाने को ख़राब किया। जुनूँ क़ायम रहा।

    एक रोज़ वो यूँही किसी झील के किनारे खड़ी थी कि वो उसके क़रीब आई और उसके गले से लग गई। नदीम पे हैरत का पहाड़ टूट पड़ा, वो लड़की जो उसके हाथ चूमने पर इतना वावैला करती थी उसके गले लगी खड़ी थी। पास ही से किसी बच्चे की आवाज़ सुनकर वो एक दम पीछे हट गई और बोली, “मुझे वापिस जाना है।”

    वो उनकी आख़िरी मुलाक़ात थी, वो अधूरा लम्स आज भी सौम्या की नस-नस में साँस ले रहा है। उस हल्के से अधूरे लम्स ने सारी ‘उम्र के लिए उसको हामिला कर दिया। उसकी रूह को एक ला-ज़वाल और अटूट मुहब्बत का हमल हो गया जो उसके अंदर साँस लेते बल खाते ज़िंदा है और मरते दम तक उसकी मुहब्बत के वजूद को अपनी रूह की कोख में लिए ज़िंदा रहेगा।

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