गोरकन

MORE BYमसूद मुफ़्ती

    “या मौला! किसी को बे-मौत ही मारडाल”।

    अल्लाह बख़्श ने मुँह आसमान की तरफ़ उठा कर कहा। और लंबी सीधी सड़क को मायूसी से देखने लगा। जिस पर कोई आदमी नज़र आता। दूर बस स्टॉप पर दो-चार आदमी खड़े थे। खम्बे के नीचे पान सिगरेट वाला उकड़ूं बैठा था। लेकिन उससे पिछले मोड़ से कोई साईकिल सवार आता था। जो उसके दिल की उम्मीद बंधाता। आ’म तौर पर जब भी कोई साईकिल सवार तेज़ी से मोड़ काटता अल्लाह बख़्श की आँखें उसी पर जम जातीं। टाहली के पिछले चार दरख़्तों तक उसके पैडल ज़ोर से चलते और अगर पाँचवीं कीकर पर आकर क़दम रुक जाते और साईकिल शहद की धार की तरह नर्मी से फिसलने लगती तो अल्लाह बख़्श की आँखों की पुतलियां फैल जातीं और हुक्क़े की नय पर उसके होंट खुले रह जाते। फिर दो सौ गज़ आगे आकर जब साईकिल सड़क से फिसल कर पगडंडी पर उतरता तो अल्लाह बख़्श बे-इख़्तियार पुकार उठता।

    “मौला तेरा शुक्र है।”

    और चंद लम्हों में आने वाला साईकिल को क़ब्रिस्तान की कच्ची दीवार से टिका कर उसे किसी की मौत की ख़बर सुनाता। वो मुस्कुराहट दबाते हुए क़ब्र का साइज़ पूछता तो आने वाला या तो उसे फुट का हिसाब बताता या जेब से मरोड़े हुए काग़ज़ पर लिपटा हुआ धागा निकाल कर अल्लाह बख़श के हवाले करता। उसका दिल धागा खोलते-खोलते उछलता रहता। कि नामा’लूम किस साइज़ की क़ब्र तैयार करना पड़े। और उसके कितने पैसे मिलें। धागे का एक सिरा हाथ में पकड़ कर वो बाज़ू सीधा खड़ा करता और लटके हुए धागे के निचले सिरे को देखता हुआ बड़े कारोबारी अंदाज़ में पूछता,

    “और कब लाओगे जी मय्यत?”

    आने वाला मय्यत का लफ़्ज़ सुनकर काँप सा जाता लेकिन अल्लाह बख़्श ख़्याल किए बग़ैर जवाब लेकर कुदाल सँभालने लगता।

    ये अ’जीब इत्तिफ़ाक़ था कि पिछले एक हफ़्ते से कोई मुर्दा नहीं आया था। और अल्लाह बख़्श की आमदनी का भरपूर वसीला बंद था। फिर बारिश भी होती रही थी। कोई अल्लाह वाला फ़ातिहा को भी नहीं आता था। दो एक आए भी लेकिन उसे कुछ दिए बग़ैर चले गए। वो सोचता था, पच्चीस हज़ार की आबादी और एक भी मौत नहीं हुई। कहीं ऐसा तो नहीं कि कमेटी ने कोई और क़ब्रिस्तान बनवा दिया हो। उसने सेक्रेटरी को ख़ुश तो बड़ा रखा हुआ था। इसी वजह से दूसरे क़ब्रिस्तान की स्कीम हर दफ़ा कमेटी से नामंज़ूर हो जाती थी। लेकिन जहन्नुम में जाएं सब डाक्टर जो सत्तर-अस्सी साल के खूसट लोगों को भी बार-बार मौत से बचा लेते हैं और अपनी आमदनी के लालच में दूसरों की रोज़ी मारते हैं। उसने गर्दन हिला कर नफ़रत से ज़मीन पर थूका। पोटली उठाई। उसमें से तंबाकू की पत्ती निकाल कर हाथों में मसली। छोटी सी चिलम ज़मीन पर मार कर राख झाड़ी। उसमें पत्ती जमाई। ऊपर हुक़्क़े की नय से पानी के दो क़तरे टपकाए और मुँह नलकी से लगा कर माचिस चिलम पर लगाई। तीली का शोला ऐसे चिलिम पर चिपका जैसे बच्चा कुत्ते से डर कर माँ की छाती में छुपता है। अल्लाह बख़्श नय ‘खोल’ करके बहुत सा धुआँ मुँह से उगल दिया। और पुकार उठा,

    “तौबा मेरी। इतना मंदा कभी देखा था। पता नहीं मल्क-उल-मौत भी कहीं मर गया है।”

    अल्लाह बख़्श बेज़ार था क्यों कि पिछले दस दिन से उसने घर में कोई पैसे दिये थे। एक दो दफ़ा’ वो घर गया लेकिन ख़ाली हाथ। उसके दस साला बच्चे शरफ़ु ने पतंग के लिए पैसे मांगे तो वो दे सका। हालाँकि पतंग के लिए उसने कभी इनकार किया था। सारी उ’म्र उसने ख़ुद ख़ूब पतंग बाज़ी की थी। हर वक़्त क़ब्रिस्तान में रहने वाला क़ब्रों से तो बात कर सकता था। उसका बाप उसे वहीं छोड़कर ख़ुद इधर-उधर चला जाता। और अगर उसे पता चलता कि बाद में अल्लाह बख़्श गैरहाज़िर रहा है। तो वो उसे शहतूत की सेंटी से मारता।

    “अबे माँ के ख़सम! जनाज़े का भी कोई ए’तबार है। तू क्या समझता है कि मौत के भी दफ़्तरी टेम(TIME) हैं।”

    इसलिए अल्लाह बख़्श क़ब्रिस्तान में ही उचक-उचक कर पतंग उड़ाता रहता। अब तो पच्चास बरस की उ’म्र में वो ये शुग़ल छोड़ चुका था। लेकिन अपने लड़के शरफ़ु को पतंग उड़ाते देखकर उसका दिल भी उछलने लगता। इसलिए वो उसे कभी ना रोकता। बल्कि पेच लड़ाने के ढंग बताया करता।

    लेकिन अल्लाह बख़्श को सबसे ज़्यादा दुख यही था कि उसे तंग-दस्ती की वजह से बच्चे को पैसों से इनकार करना पड़ा। इसलिए वो दो तीन रोज़ से घर भी गया था। और क़ब्रिस्तान की कोठड़ी में ही रहता था। अलबत्ता बीवी और दस साला लड़के शरफ़ु को शहर में रखा था। जहां बिन्दु चाचा उनकी देख-भाल किया करता था। दूसरे चौथे रोज़ अल्लाह बख़्श घड़ी-भर को चला जाता। बीवी को धोती की डब से रुपये खोल कर देता। शरफ़ु के पतंग को दो-चार तिनके मारता। चाचे बिन्दु की दुकान पर चिलम के चार कश लेता। बाज़ार में अड़ोस पड़ोस की बात करता और फिर वापस क़ब्रिस्तान आजाता जहां कीकर और धरीक के दरख़्तों के झुण्ड में इस की कोठड़ी थी। और हुक़्क़ा था। किसी के मरने की ख़बर आती तो वो क़ब्र खोदने, जनाज़े का इंतिज़ार करने, वुज़ू के लिए कूज़े इकट्ठे करने और क़ब्र पर उंडेलने के लिए पानी के घड़े भरने में मसरूफ़ रहता। कोई लोग अ’ज़ीज़ों की क़ब्र पर फ़ातिहा-ख़्वानी के लिए आते तो वो भी वहां जा पहुंचता। और इस प्रीत से क़ब्र पर से ख़ुश्क पत्ते हटाता। और मिट्टी के ढेले इर्द-गिर्द जमाता जैसे क़ब्रिस्तान में वो सबसे ज़्यादा उसी क़ब्र का ख़्याल रखता है। फ़ातिहा वाले उसे कुछ दे देते तो क़ब्र की सब दिलचस्पी भूल कर उन्हें वहीं छोड़ते हुए कोठड़ी में आकर हुक़्क़ा पीने लगता।

    अल्लाह बख़श ने इसी कोठड़ी में पच्चास साल पहले जन्म लिया था। जब यहां थोड़ी सी क़ब्रें थीं। इन्ही क़ब्रों की ढेरियों के सहारे उसने चलना सीखा था। माँ से रूठ कर या बाप से डर कर वो पक्की क़ब्रों के बड़े कतबों के पीछे छुप जाया करता था। क़ब्रिस्तान के रिवायती डर का उसे कभी एहसास भी हुआ था। ख़्वाह तारों भरी ठंडी रात हो या बिजलियां बरसाते तूफ़ानी अंधेरे लिए जब उसने शऊ’र सँभाला तो हर तरफ़ क़ब्रें देखीं जिनमें कभी-कभार जनाज़े आया करते थे। दस पंद्रह ख़ामोश से आदमी और चार पाँच शोर करती औरतें। बड़ के पेड़ के नीचे जनाज़ा रखा जाता। लाईन बनाई जाती। जिसमें से मौलवी-साहब ज़रूर एक को आगे पीछे करते। फिर मौलवी-साहब थोड़ी थोड़ी देर बाद लंबी आवाज़ में चिल्लाते तो पीछे खड़े लोग अपनी आवारा नज़रें समेट कर सामने वालों की एड़ीयां देखने लगते। उसका बाप अच्छी भली तैयार शुदा क़ब्रों से ख़्वाह-मख़ाह मिट्टी इधर उधर करता रहता। और वो बाप के इशारे का मुंतज़िर दरख़्त की ओट में छुपा रहता। जैसे ही मुर्दा लहद में उतारा जाता अल्लाह बख़्श लपक कर चारपाई से नए लट्ठे की सफ़ेद चादर उठा कर सीधा माँ को दे आता। जो पहले ही इंतिज़ार में होती। महीने डेढ़ बाद उसका बाप सारी चादरें लेकर हाजी करीम अल्लाह कपड़े वाले की दुकान पर जाता और रुपये डब में डाल कर दहकते हुए चेहरे से वापस आता।

    ख़ुदाबख़्श को एहसास ही था कि मौत क्या होती है? ये उसके लिए कारोबार था दूसरे की मौत में उसकी ज़िंदगी थी। और उनकी ज़िंदगी से उसके अपने मरने का डर था इसलिए वो हमेशा चाहता था कि दूसरे ऐसे ही मरते रहें। जैसे कि तीस साल पहले हैजे़ मैं मरते थे। क्या दिन थे वो भी!!! एक के बाद दूसरा। दूसरे के लिए उसे अलैहदा मज़दूर लगाने पड़े। उन दिनों तो वो ख़ासा अफ़्सर बन गया था। दस मज़दूर उसने रख लिए थे। और ख़ुद हाथ में डंडा लिए उनकी निगरानी करता रहता। उन्हें कुदालें भी अपने पास से ख़रीद कर दीं। अब तक वही उसके काम रही थीं। इतनी आमदनी हुई थी उन दिनों कि उसने ठाठ से अपनी शादी रचाई। वर्ना तो इतने नक चढ़े गोरकन की बेटी का रिश्ता उसे कौन देता था। और जब बीवी पहली मर्तबा आई तो सब क़ब्रों पर दीये रोशन किए थे। क्या बहार थी वो भी। और अब तो नई नई दवाओं की वजह से कोई वबा आती ही थी। इसीलिए वो गुज़िश्ता बरस से बाएं आँख के मोतीए का ऑप्रेशन भी कर सका था।

    वैसे अपने कारोबार में अल्लाह बख़्श काफ़ी होशयार था। क़ब्रिस्तान के बाहर बोर्ड लगा था कि छोटी मय्यत की क़ब्र की खुदाई पाँच रुपये और बड़ी क़ब्र की खुदाई दस रुपये है। लेकिन बोर्ड के हुरूफ़ उसने बड़ी चाबुकदस्ती से बीच बीच में से मिटा दिए थे। और आ’म तौर पर पंद्रह रुपये फ़ीस लिया करता था। अगर कोई ए’तराज़ करता तो कहता:

    “बादशा हो! उधर बोर्ड लगा है ख़ुद देख लो।”

    देखने वाला अगर चला भी जाता तो कुछ नज़र आता। ज़ंग आलूद सतह को उंगलियों से साफ़ करने पर अगर किसी हर्फ़ का बचा खुचा कोना नज़र जाता और वो कोशिश से पढ़ भी लेता तो अल्लाह बख़्श कहता,

    “जोनाब! देखते नहीं अ’र्से से बारिश नहीं हुई। पत्थर की तरह ज़मीन सख़्त है। दो आदमी साथ लगाऐंगे तब ही क़ब्र तैयार होगी। उनको भी तो मज़दूरी देना है।”

    और अगर कभी बारिश हुई होती तो कहता,”जोनाब, आपको क्या पता कितना मुश्किल काम है,मिट्टी इतनी नरम है कि बार-बार किनारे अंदर गिर जाते हैं। दो आदमी साथ लगाना पड़ेंगे।”

    लाश क़ब्र में उतारने के बाद जब सब लोग एक मुट्ठी मिट्टी की फेंक देते तो वो बड़ी तनदही से कुदाल चलाकर ढेरी बनाता। दोनों हाथों से सतह हमवार करता। दो टिन पानी के छिड़कता,और मुर्दे के वारिस से दस पंद्रह क़दम दूर चला जाता।

    “जोनाब अगर हुक्म हो तो ढेरी जमाने के लिए दो-चार दिन माशकी से पानी डलवा दूं।” वो फ़ासिले का फ़ायदा उठाते हुए पुकार कर कहता।

    दो एक बुज़ुर्ग फ़ौरन ‘हाँ’ पुकार उठते और वारिस की जेब का बोझ और हल्का हो जाता।

    “और जोनाब अगर हुक्म हो तो पहली तीन जुमेरातों को पंज-तन पाक का दीया भी जलाऊँ?”

    मुतवफ़्फ़ी के ख़ानदान से ता’ल्लुक़ात का दा’वा करने वाले चंद लोग हाँ हाँ पुकार उठते और वारिस की पेशानी सिकुड़ जाती।

    अल्लाह बख़्श पहले दस पंद्रह दिन हर नई क़ब्र का ख़ास ख़्याल रखता क्योंकि रिश्तेदार आते रहते थे। बादअज़ां हर जुमेरात को और फिर तेहवारों को क़ब्र दुरुस्त किया करता। ज़िंदों का मुर्दों से वास्ता ही इतना होता था। उसके बाद अल्लाह बख़्श बैल या गधे को क़ब्र के ऊपर से गुज़ार देता,जिससे किनारे टूट जाते,चोटी दब जाती और एक-आध गड्ढा पड़ जाता। अगली दफ़ा’ आने वाला रिश्तेदार ख़फ़ा होता। और ख़फ़गी के बाद आइन्दा एहतियात के आर्डर की क़ीमत भी अदा कर जाता। नये मरने वालों के घरों से जुमे’रात और तेहवारों का खाना अ’लैहदा था।

    उसके मांगने के भी क़वाइद थे। मरने वाले बच्चों की माँ से माँगो। जवानों के बाप से माँगो। सास से कभी माँगो। बूढ़ों के सबसे बड़े बेटे से माँगो। रोने वालों की बारी होती है। एक शख़्स शिद्दत से रोता है और बाक़ी उसे चुप कराते हैं। उसके चुप होने पर दूसरा उसकी जगह ले लेता है। जो शख़्स बार-बार रोये,उससे कुछ माँगो,क्योंकि वो सबसे ज़्यादा होशयार है और कुछ देगा। ऐसे वक़्त में माँगो जब देने वाला दो-चार आदमियों में खड़ा हो। चालीसवें पर जितना ले सकते हो लो क्योंकि बा’द अज़ां बहुत कम लोग क़ब्र की ख़बर लेते हैं।

    वो अपनी तफ़रीह का सामान भी मौत से किया करता था। फ़ुलां आदमी रोता कैसे था। जैसे आटे की चक्की ठोठो कर रही हो। आज फिर मौलवी शेर अ’ली जनाज़े के साथ आया था। अ’जब तरीक़े से दुआ’ पढ़ता है ये भी। जैसे राटे तोता बोल रहा हो। ये बूढ़ा भी ख़ूब आदमी था। रोना तो आता था। ख़्वाह-मख़ाह दूसरों को मुतास्सिर करने के लिए मुँह बिसोड़ रहा था। जैसे पेट में दर्द हो। कितनी मज़हकाख़ेज़ शक्ल बन जाती थी उसकी। और वो कोठड़ी में पड़ा हुक़्क़े पर मुँह जमाए पहरों हँसा करता। अगर किसी सास या सुसर की दो बहूएं अपने ख़ानदानों समेत जातीं तो उसे बड़ा लुत्फ़ आता। दोनों बहूएं एक दूसरे से बढ़ चढ़ कर रोने की कोशिश करतीं और इतना शोर करतीं कि वो हुक़्क़े पर होंट जमाकर मुस्कुराहट छुपाने लगता। उस दिन उसे आमदनी भी हो जाती। जब मोटी औरतें क़ब्रों से लिपट कर रोतीं तो वो पीछे खड़ा उनकी हिलती हुई पुश्त की थर्राहट पर दिल ही दिल में हँसता जाता,जैसे आग पर पड़ी हुई केतली का ढक्कन उछलता रहता है।

    जवानी के दिनों में अल्लाह बख़्श हमेशा इस मौक़े की ताड़ में रहता। जब बिरादरी की बहुत सी औरतें इकट्ठी फ़ातिहा-ख़्वानी के लिए आतीं। उनके सोग का अंदाज़ ख़ानदानी सियासत के तनासुब से

    मुतअ’य्यन होता था। बा’ज़ तो ऐसी अदाकारी करतीं कि पीटते-पीटते बेहाल हो जातीं,बुर्क़ा ग़ायब। दुपट्टा पहले बाज़ूओं में उलझता,फिर उड़ कर सामने वाले कीकर पर जा गिरता। गरीबां खुल जाते और अल्लाह बख़श.....देखता ही जाता। बा’ज़-औक़ात उनमें से एक-आध ग़श खा कर गिर पड़ती और बाक़ीयों की चीख़ें उसे मदद को बुलातीं। वो दौड़ कर चारपाई उठा लाता। और बा’ज़ दफ़ा’ उसे ख़ुद ही उसे उठाकर चारपाई पर डालना पड़ता। तब वो कोठड़ी मैं हुक़्क़ा पीते हुए घंटों उस मौक़े’ का ज़ेह्नी तौर पर मज़ा लेता रहता। एक औरत से तो उसका मआ’शक़ा भी चल निकला था। वो दो एक दफ़ा’ क़ब्र पर आकर बेहोश हुई। और अल्लाह बख़्श ने उसे सँभाला। और बा’दअज़ां काफ़ी अ’र्सा उसे बग़ैर बेहोश हुए सँभालता रहा।

    अल्लाह बख़्श के लिए मौत तो हादिसा थी और अलमिया। ग़म-ज़दा चेहरे। उबलते हुए आँसू। दबी हुई सिसकियाँ। फ़ातिहा के लिए उठे हुए पुरख़ुलूस हाथ और फटी फटी आँखें उसके दिल में कोई तास्सुर पैदा करती थीं। जब मुर्दे को लहद में उतारने से पहले कफ़न खोल कर चेहरा दिखाया जाता तो एक कुहराम मच जाता। लेकिन अल्लाह बख़्श उस वक़्त भी क़ब्र में से पाव-पाव मिट्टी निकालता रहता। और लोगों को किनारे से परे हटाता रहता। बूढ़े वालिदैन अपनी जवांमर्ग औलादों की क़ब्रों पर आएं। या मासूम बच्चे अपनी माँ की तुर्बत से लिपट कर ‘अम्मी अम्मी’ पुकारें, या किसी लतीफ़

    रिश्ते वाली हस्ती दुनिया की नज़रों से छुप कर किसी ढेरी पर चुप-चाप आँसू बहाती रहे, वो उन सबकी दिली हालत से बे परवाह पैसे बटोरने की फ़िक्र में रहता। क़ब्र खोदने में भी वो कभी मलूल हुआ था। बल्कि कुदाल चलाते हुए माहिया के बोल अलापता रहता। और अगर कभी ज़्यादा पैसों के मिलने का यक़ीन होता तो हर दो-चार हाथ चलाने के बाद कुदाल सर पर उठा कर क़ब्र में ही नाचने लगता। और जब लहद तैयार हो जाती तो अंदर नर्म-नर्म मिट्टी पर बैठ कर हुक़्क़ा पीता रहता। एक दिन बिन्दु चचा उसे पूछते पूछते क़ब्र के किनारे तक आगया।

    “ओ बख़्शा। तू ज़िन्दगी में ही क़ब्र में घुस पड़ा। बाहर बैठ कर हुक़्क़ा नहीं पी सकता क्या?”

    अल्लाह बख़्श ने नथुने फुला कर धुआँ बाहर फेंका और खांस कर बोला, “हमारी तो ज़िन्दगी ही क़ब्रों में है चाचा। गडढ़ा खोदते रहें तो अपने पेट का गडढ़ा भरता है।”

    “तुझे डर भी नहीं आता इस में बैठे-बैठे?”

    डर काहे का पगले। ताँगे का कोचबान भी तो रात घर आकर घोड़े से दो लाड कर लेता है। हम क्यों ना दम-भर को लाड करें इस से।”

    इसी तरह अल्लाह बख़्श की सारी उ’म्र क़ब्रों से लाड करते गुज़री थी। लेकिन पिछले हफ़्ता भर से क़ब्र खोदना मिली ही थी। वो प्यार किस से करता। सारा-सारा दिन ऊँघते गुज़र जाता। चिलम पी-पी कर उसकी छाती पकने लगी थी। सड़क की तरफ़ देखते देखते आँखें पथरा गई थीं।

    “या मौला किसी को बे-मौत ही मार डाल।” क़ब्ल दोपहर का तेज़ सूरज उसकी पेशानी पर चमक रहा था।

    सह पहर के क़रीब अल्लाह बख़्श हुक़्क़ा सीने से चमोड़े धीरे-धीरे कश ले रहा था। उसकी नज़रें सड़क की तरफ़ लगी थीं। और उँगलियों में घास के तिनके मरोड़ रहा था। मअन एक साईकिल सवार तेज़ी से मोड़ मुड़ा। अल्लाह बख़्श के होंट कश लगाने से पहले खुले रह गए। साईकिल आगे रही थी। और वो टकटकी बाँधे देख रहा था। पांचवें कीकर के पास आकर सवार ने पैडल रोक लिए। अल्लाह बख़्श का सांस रुक गया..... साईकिल फिसलती आई और...... और...... सड़क से हट कर पटड़ी पर उतर आई।

    “शुक्र है मौला तेरा।” अल्लाह बख़्श उछल पड़ा, “सुन ली तूने मुझ ग़रीब की।”

    साईकिल सवार क़रीब आया लेकिन उतरा नहीं। वो पंद्रह सोलह बरस का लड़का था। दरवाज़े के पास आकर उसने तेज़ी से पैडल उल्टे घुमाये और मोड़ मुड़ते हुए हाथ हिला कर बोला,

    “जल्दी से चार फुट की क़ब्र तैयार कर दो।”

    और ये जा वो जा।

    अल्लाह बख़्श के हाथ से हुक़्क़ा लुढ़क गया। थोड़ा उठते हुए वो पुकारा,

    “अरे सुन तो।”

    लेकिन लड़के ने मुड़ कर हाथ हिलाया और पुकारा:

    “जल्दी करो।”

    फिर तेज़ी से आटा गूँधने की तरह पैडल मारता निकल गया।

    लम्हा भर को अल्लाह बख़्श को ग़ुस्सा आया। मगर फिर एक दम उस पर ख़ुशी ग़ालिब गई। सारी रगों में एक दम फुर्ती जाग पड़ी। और वो कुदाल उठा कर क़ब्रिस्तान के सिरे की तरफ़ लपका। ज़मीन पर कुदाल जमा कर दोनों सिरों पर निशान लगाया।

    “ये तीन फुट हुए!” वो बोला।

    फिर कुदाल का अगला फल टिका कर दूसरा निशान लगाया।

    “ये पूरे चार और....... ये हुई एक बालिशत।” निशान लगा कर उसने हाथों में थूका और जब कुदाल उठाने लगा तो मलूल सा हो गया।

    “मौला जी सात रोज़ बाद भेजा भी तो एक दाना ही।”

    दाना से मुराद बच्चे की लाश थी। और ये चीज़ मायूस कुन थी क्योंकि अल्लाह बख़्श का ज़िंदगी-भर दस्तूर रहा था कि बच्चे की मय्यत की क़ब्र की खुदाई के इ’लावा और कोई बख्शिश लिया करता था।

    “जिस घर का बूटा ही टूट गया जी। उसको और क्या तोड़ें।”

    वो अपने वाक़िफ़ लोगों से कहा करता। इसलिए आज वो ज़्यादा से ज़्यादा पंद्रह रुपये ले सकता था। जो बहुत कम थे। अपनी बीवी को खर्चे के इ’लावा शरफ़ु को पतंग के लिए तो कुछ देना था।

    अल्लाह बख़्श के हाथ झपा झप चलते गए। कुदाल सर पर उठा कर दोनों बाज़ू पूरे ज़ोर से ज़मीन पर मारता और रुका हुआ सांस ब-आवाज़-ए-बुलंद छोड़ता। एक घंटे में उसने क़ब्र तैयार कर ली। पहले कुदाल पर जमा जमा कर मिट्टी बाहर फेंकी और फिर हाथों से समेट समेट कर बाहर डालने लगा। अब काम की तेज़ रफ़्तारी गुज़र जाने के बाद उसको थोड़ा थोड़ा ग़ुस्सा आने लगा कि सिर्फ बच्चा क्यों मरा जब कि उसे पैसों की ज़रूरत थी। थोड़ी देर तक वो दिल ही दिल में झुंझलाता रहा कि अल्लाह के कारख़ाने में क्या बूढ़ों की कमी थी। जो इ’ज़राईल को बच्चा ही मिला। और फिर उसने फ़ैसला किया कि बला से दाना ही हो। लेकिन आज तो मैं कभी बख्शीश ना छोड़ूँगा। जब मौला हम पर रहम नहीं करता। तो हम दूसरों पर क्यों करें। ये फ़ैसला कर के उसने धम से कुदाल को ज़मीन में धँसा दिया। और बड़े ए’तिमाद से हुक़्क़े में चिलम भरने लगा।

    इतने में बिन्दु चाचा आता दिखाई दिया।

    “इधर ही जाओ चाचा। चिलम भी तैयार है”। उसने हाथ हिला कर पुकारा। चाचा चलता चलता वहीं पहुंच गया। अल्लाह बख़्श कश लगा रहा था। इसलिए बोला नहीं। बिन्दु ने क़ब्र का जायज़ा लिया और बोला:

    “क़ब्र बन गई है?”

    अल्लाह बख़्श ने इस ग़ैर ज़रूरी सवाल का जवाब देना मुनासिब समझा। और हुक़्क़े की नलकी बिन्दु की तरफ़ मोड़ता हुआ खों-खों करने लगा।

    “आओ बख़्शा ज़रा शहर चलें।”

    “वाह शहर कैसे चलें अभी तो जनाज़ा आने वाला है”।

    “हाँ वो जनाज़ा ही तो लाना है।”

    “क्या मतलब?”

    “अब क्या कहूं बख़्शा। अल्लाह की रज़ा है। शरफ़ु पतंग उड़ाते उड़ाते कोठे से गिर कर मर गया है। मैंने लड़के से कहा था कि अल्लाह बख़्श को बताना मैं ख़ुद ही आकर बताऊँगा।”

    अल्लाह बख़्श एक दम सन्न सा हो गया। उसे पहली दफ़ा’ पता चला मौत क्या होती है। वो एक दम चीख़ मार कर उठा और कुदाल उठा कर धमाधम मिट्टी क़ब्र में गिराने लगा।

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