हरजाई

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    मशरब रिंदाना, मिज़ाज महरूर, तबीयत आज़ाद, अक़ाइद ला मज़हबी की तरफ़ माइल और पेशा अख़बार नवीसी। जंग यूरोप शुरू हो चुकी थी। मेरा अख़बार बंबई से शाये होता था और इस ज़माने में बहुत मक़बूल था। हुकूमत की टेढ़ी नज़रें मुझ पर पड़ रही थीं। मैं भी छेड़ से बाज़ आता, और कुछ नहीं तो मैदान-ए-जंग की ख़बरों पर सुर्ख़ियाँ ऐसी ही लिखता था जैसे साँप बिच्छुओं के डंक इत्तिहादियों की फ़तह को भी शिकस्त बना देता था और दुश्मन की शिकस्त भी मेरे अख़बार के कालमों में शानदार मुदाफ़िअत के नाम से याद की जाती थी!... फिर क्या ताज्जुब है कि हुकूमत मुझसे हद दर्जा नाख़ुश थी।

    ग़ज़ब ये हुआ कि उसी ज़माने में अफ़्ग़ानिस्तान की तरफ़ से ख़तरात पैदा होने लगे। अफ़्ग़ानों से मेरे तअल्लुक़ात वसी’ थे लिहाज़ा अब तो खु़फ़िया पुलिस की निगरानी मुझ पर इतनी सख़्त हो गई कि अगर घर में बैठ कर रोटी भी खाता तो नवालों की सही तादाद पुलिस के रजिस्टर में दर्ज हो जाती थी!...ये उस ज़माने का वाक़िया है।

    मेरा मामूल ये था कि हर शंबा की शाम को चंद दोस्तों के साथ शहर के बाहर एक लखपती दोस्त के बाग़ की सोहबत-ए-ऐश में शरीक हुआ करता था, यकशंबा का पूरा यौम-ए-तातील वहीं गुज़रता था, दोशंबा की सुब्ह को मैं शहर वापस आता था। ये बाग़ एक नौजवान बोहरे सौदागर का था और इस सोहबत अहबाब में मेरे एक ख़ास हमनफ़स कलकत्ता के एक नौजवान बैरिस्टर थे जो अब एक बड़े ओहदे पर फ़ाइज़ हैं। हर हफ़्ता कम अज़ कम 24 घंटा, इस तरह बसर होते कि कुछ मौसीक़ी का शुग़्ल है कुछ लतीफ़ अग़्ज़िया हैं अगर चाँदनी रात है तो बाग़ के वस्त में मर्मरीं हौज़ का किनारा है, कभी क़व्वाली है, कभी नाच और गाना है, हू हक़ है और उसके तमाम या अक्सर महक़ात!!

    इस तरह शंबा की शाम को एक दफ़ा हम सब वहां गए, यकशंबा को दिन भर शतरंज और ताश का शुग़्ल होता रहा, रात को एक मशहूर मुग़न्निया ने इस महफ़िल को अपनी मौजूदगी से नवाज़ा, दो बजे तक गाना होता रहा जवानों की महफ़िल में अगर शाम से सुब्ह तक तब्ला खड़के तो फिर वो महफ़िल नंग जवानी है! मगर 'बी साहिबा' थकी हुई थीं, दो ही बजे घर चली गईं। कुछ देर तो हम सब लबे हौज़ पड़े हुए ख़ुद ही गाया बजाया किए, उस के बाद जवानी पर नींद ग़ालिब आई, सुब्ह सब को शहर वापस जाना था, इसलिए अपने अपने बिस्तर पर जा पड़े...

    एक छोटा सा पहलू का कमरा था, जिसमें दो बिस्तर लगे हुए थे, एक पर मैं और एक पर मेरे दोस्त बैरिस्टर साहिब, मौसम क़दरे गर्म था इसलिए कमरे का दरवाज़ा खुला छोड़ दिया गया। लैम्प की बत्ती नीची कर के उसको फ़र्श पर रख दिया, हम दोनों सो गए!

    सुब्ह को तीन और चार बजे के दरमियान मेरी आँख दफ़्अतन खुली और ये महसूस हुआ कि गोया कोई तीसरा शख़्स कमरे में दाख़िल हुआ है। सुब्ह-ए-काज़िब की रौशनी कमरे में लैम्प की धीमी रौशनी से मिलकर एक अजब क़िस्म का ग़ैर क़ुदरती नूर पैदा कर रही हो... मैंने देखा कि बिल्कुल सफ़ेद... अज़ सर ता पा... लिबास पहने कोई साहब कमरे के अंदर दाख़िल हो रहे हैं, वो आहिस्ता-आहिस्ता मेरे पलंग की तरफ़ बढ़ते आते थे। उनका हुलिया और उनकी वज़ा क़ता ज़हन नशीन कर लीजिए।

    लंबी और घनी दाढ़ी... सफ़ेद बुर्राक़... चेहरा निहायत नूरानी... सुर्ख़ सफ़ेद... चेहरे का अंदाज़ मुग़लई... सफ़ेद लांबा कुरता, कमर से एक सफ़ेद पटका बंधा हुआ... सफ़ैद शलवार, पांव में... मुझे याद नहीं कि किस रंग का... पंजाबी जूता... क़द मियाना बल्कि मियाना से भी कुछ कम... इस वज़ा क़ता का इन्सान... बिल्कुल ख़्वाजा ख़िज्र! और फिर हमारे घर में! हमारे तमाम तख़ैयुलात से किस क़दर दूर और बईद था! मैं ज़रा चौंका और एक लम्हा उनको अपनी तरफ़ बढ़ते देखता रहा, फिर ज़रा घबराया और घबराकर चिल्लाया, "कौन है? कौन है?" इतने ज़ोर से मेरी आवाज़ बुलंद हुई कि कमरा गूंज गया और बराबर पलंग पर नौजवान बैरिस्टर साहब घबरा कर उठ बैठे। "क्या है? ख़ैरियत तो है?" उन्होंने अपनी आँखें मलते हुए मुझसे सवाल किया... इस सवाल-ओ-जवाब में दो मिनट भी बमुशकिल सर्फ़ हुए होंगे लेकिन वो सफेद पोश पीर मर्द जहां खड़े थे वहीं ग़ायब हो गए। मैंने नहीं देखा कि वो कब गए, किधर गए, क्यों कर गए। बहरहाल एक अक्स की तरह वो मेरी नज़रों से ग़ायब हो गए। मैंने जब ये माजरा नौजवान बैरिस्टर साहब से कहा तो वो झुँझला गए।

    "लाहौल वला क़ुवः, नींद ख़राब कर डाली, जब ही तो तुमसे कहता हूँ कि ज़रा कम खाया करो, अनाड़ी की बंदूक़ की तरह पेट भर लेते हो, बदख़्वाबी होती है तो दूसरों को भी बे-आराम करते हो!"

    मैंने जब इसरार किया कि मेरी नज़र ने धोका नहीं खाया तो वो और बिगड़े:

    "कहीं तुम्हारे दादा साहब तो क़ब्र से उठ कर तशरीफ़ लाए हों! पोते के दीदार के लिए तरस रहे होंगे बेचारे! ख़ुदा जाने कहाँ कहाँ ढूंढ कर यहां तक पहुंचे... जाओ देखो बाहर बाग़ में रहे हों!"

    मैंने फिर कुछ कहना चाहा तो उन्होंने ज़ानू का एक तकिया निकाल कर मेरे सर पर मारा, "उल्लू!" और ये कह कर करवट ले ली।

    सुब्ह को हम लोग शहर गए, मैं दस बजे अपने दफ़्तर में आया। ये वक़्त मेरी, तन्हाई मस्रूफ़ियत का वक़्त होता था इसलिए कि 12 बजे अख़बार की आख़िरी कापी प्रैस को जाती थी। लिहाज़ा दफ़्तर के अहलकारों को आम हिदायत थी कि कोई भी मुझसे मिलने आए, मेरे कमरे में भेजा जाये... 11बज चुके थे और अभी मुझे एक ज़रूरी नोट लिखना बाक़ी था कि चपरासी ने अंदर कर इत्तिला दी कि कोई साहब मिलना चाहते हैं। मैंने उसको झिड़का:

    "तुम्हें मालूम नहीं कि मैं इस वक़्त किसी से नहीं मिल सकता?"

    चपरासी ने उज़्र किया कि बावजूद मना कर देने के वो साहब मुलाक़ात पर मुसिर हैं। बहुत ही झल्लाकर मैंने कहा, "अच्छा बुलाओ... दरवाज़े का पर्दा उठा और क्या देखता हूँ कि वही रात वाले ख़्वाजा ख़िज्र मुस्कुराते हुए तशरीफ़ ला रहे हैं... बयक-लम्हा मैं ग़र्क़-ए-हैरत हो कर बदहवास हो गया, फिर घबरा कर खड़ा हो गया। "आइए, आइए, तशरीफ़ लाइए," मैंने बहुत ही ज़ौक़-ओ-शौक़ के साथ उनका ख़ैरमक़दम किया।

    "माफ़ कीजिए, मैं इस वक़्त हर्ज कार करना नहीं चाहता। मुझे मालूम है कि आप बहुत मसरूफ़ हैं, सिर्फ़ ये बता दीजिए कि मकान पर आपसे कब और किस वक़्त मुलाक़ात हो सकेगी, तख़लिया में कुछ गुफ़्तगू करना चाहता हूँ।" उन्होंने बहुत आहिस्ता-आहिस्ता और निहायत संजीदगी और मतानत के साथ ये अलफ़ाज़ अदा किए, मगर मैं तो अब उनसे बातें करने के लिए बेताब था। "नहीं साहब! मुझे फ़ुर्सत है, तशरीफ़ तो रखिए," मैंने कहा। उन्होंने फ़रमाया, "जी नहीं, इस वक़्त तो मैं ठहरूँगा सिर्फ़ मुलाक़ात का वक़्त मुक़र्रर करने आया था।"

    ग़रज़ ये कि तक़रीबन पाँच मिनट तक मेरी तरफ़ से इसरार और उनकी तरफ़ से इनकार होता रहा। बिल-आख़िर तय ये हुआ कि वो बाद मग़रिब मेरे मकान पर तशरीफ़ लाएंगे...

    उस दिन बाद मग़रिब मेरी बेचैनी और बेताबी-ए-इंतिज़ार नाक़ाबिल बयान थी। सात बजे, आठ बजे, नौ बजे, दस बज गए, दरवाज़े पर खटका होता था तो मैं ऊपर की मंज़िल से सड़क तक दौड़ता हुआ आता था। एक दफ़ा, दो दफ़ा, शायद दस दफ़ा इसी तरह ऊपर की मंज़िल से उतरा और चढ़ा! कभी अख़बार उठा कर पढ़ने लगता। कभी कोई किताब उठाई, कभी कमरे में टहलने लगता। आँखें दरीचा के बाहर, कान आवाज़ पर लगे हुए... रात के 12 बज गए मगर वो आए! मायूस हो कर बिस्तर पर लेट गया, फिर भी नौकरों से कह दिया कि दरवाज़े का ख़याल रखें कोई आवाज़ दे तो फ़ौरन खोल दें...

    सारी रात गुज़र गई, वो आए, सुब्ह को मैं दफ़्तर में गया। ये उम्मीद थी कि शायद दफ़्तर में फिर तशरीफ़ लाएंगे। दिन भर इंतिज़ार के पेच-ओ-ताब में दिल लगा कर काम भी कर सका... लेकिन वो आए! फिर शाम को घर पर इंतिज़ार रहा, एक दोस्त के यहां जा कर खाना खाने का वा'दा कर चुका था, मगर माज़रत कहला भेजी, दो-चार बे-फ़िक्रे ही ही हाहा करने के लिए आए, उनको टाल दिया। लेकिन वो हज़रत फिर भी आए! दो-तीन चार इसी तरह दस पंद्रह दिन गुज़र गए। पेशा के कामों और यारों की सोहबत में बड़े मियां का तसव्वुर धुँदला हो चला... दस पाँच दिन में बिल्कुल ही भूल जाता अगर एक अजीब-तर वाक़िया पेश जाता। जिसने इस मुअम्मे को और भी ज़्यादा उलझा दिया...

    दस पंद्रह दिन बाद, एक रोज़ शाम को मैं अपने दो हम पेशा दोस्तों से मिलने गया। एक उनमें से बंबई के बहुत मशहूर और मुक़द्दस हज़रत मौलाना और पीर-ओ-मुर्शिद थे और दूसरे एक जदीद क़िस्म के एडिटर। मैं जब इन हज़रत मौलाना के मकान पर पहुंचा तो वो दूसरे दोस्त भी वहां मौजूद थे...

    उधर-उधर की बातें होती रहीं, होते होते कुछ रूहानियत का तज़किरा छिड़ गया, बातों बातों में मुझे वो बाग़ वाला वाक़िया याद गया, मैंने कहा, "आप दोनों साहिबों को एक अजीब वाक़िया सुनाता हूँ, एक अजीब वारदात है मगर मुझ पर हंसिएगा नहीं, वाक़िया बिल्कुल सच्चा है, दिमाग़ मेरा बिल्कुल सही है..." इस तमहीद के साथ मैंने वो वाक़िया बयान करना शुरू कर दिया। जब मैंने सुब्ह के क़रीब पीर मर्द का कमरे में आना बयान किया तो ऐडीटर साहब ने क़ता कलाम कर के मुझसे सवाल किया,

    "बताइए, किस दिन और किस वक़्त, ठीक ठीक बताइए।"

    मैंने उनको दिन और वक़्त बताया और फिर अपना क़िस्सा शुरू किया, पीर मर्द का ग़ायब हो जाना, सुब्ह को दफ़्तर में आना फिर शाम को आने का वा'दा करके जाना और फिर कभी आना। जब मैं ये क़िस्सा बयान कर रहा था तो देख रहा था कि वो दोनों साहब हैरान हो हो कर एक दूसरे की सूरत देखते जाते हैं और उन दोनों के दरमियान आँखों ही आँखों में कुछ इशारे भी होते जाते हैं।

    "किस वक़्त वो दफ़्तर में आए थे और क्या गुफ़्तगू की थी उन्होंने? ज़रा मुफ़स्सिल फ़रमाइए।" हज़रत मौलाना ने सवाल किया। मैंने वक़्त भी बता दिया और लफ़्ज़ लफ़्ज़ गुफ़्तगू भी दोहरा दी।

    "ज़रा उन का हुलिया तो फिर बयान कीजिए।" एडिटर साहब ने फ़र्माइश की।

    मैंने हुलिया भी मुफ़स्सिल दोहराया।

    "क्या समझे आप।" मौलाना ने एडिटर साहब से मुख़ातिब हो कर कहा।

    "आप क्या समझे?" एडिटर साहब ने मौलाना से मुख़ातिब हो कर कहा।

    "अजीब!" मौलाना ने फ़रमाया।

    "अजीब?" एडिटर साहब ने फ़रमाया।

    मैं हैरान हो कर दोनों का मुँह तक रहा था, और सोच रहा था कि अगर मुझे शब में बदहज़मी की वजह से ख़लल-ए-दिमाग़ का दौरा होता है तो इन दोनों को दिन में भी ये शिकायत लाहक़ हो जाती है!

    मैंने कहा, "कुछ तो फ़रमाइए, ये इशारे कनाए कैसे?"

    "कह दो"! मौलाना ने एडिटर साहब से कहा।

    "कह दूं?" एडिटर साहिब ने मौलाना को जवाब दिया।

    एडिटर साहिब सँभल बैठे, उन्होंने कहा, "सुनिए जनाब ये अजीब-ओ-ग़रीब वाक़िया है। जो वाक़िया आपने सुनाया बिल्कुल यही वाक़िया मुझ पर गुज़र चुका है, मगर सबसे ज़्यादा हैरत अंगेज़ बात ये है कि मेरे पास भी वो पीर मर्द ठीक उसी शब में उसी वक़्त आए थे जिस वक़्त वो आपके पास आए थे, और फिर इसी तरह कमरे के अंदर दाख़िल होते ही होते ग़ायब भी हो गए थे... मगर अजीबतर जो बात है वो ये है कि सुब्ह को भी वो मेरे दफ़्तर में ठीक उसी वक़्त और इसी तरह आपके दफ़्तर में, वही बातें जो उन्होंने मुझसे कीं जो आपसे कीं, इसी तरह मुझसे वक़्त मुक़र्रर करा के गए जिस तरह आपसे... और ये तवारुद तो देखिए कि मैंने भी उसी दिन वही वक़्त मुक़र्रर किया जो आपने मुक़र्रर किया था... मगर वो फिर आज तक लौट के आए जिस तरह आप मुंतज़िर हैं मैं भी सरापा इंतिज़ार हूँ!" इतना कह कर एडिटर साहब ने रूमाल से चेहरे का पसीना ख़ुश्क किया फिर फ़रमाने लगे:

    "ये वाक़िया दूसरे ही दिन मैंने मौलाना से बयान कर दिया था...पूछिए मौलाना से... मेरे आपके दरमियान एक ख़फ़ीफ़ जुज़्व का भी कोई इख़्तिलाफ़ नहीं!... अजीब, अजीब!"

    हम तीनों बहुत देर तक ख़ामोश बैठे रहे...

    मैंने कहा, "तसव्वुर और तवह्हुम के तवारुद की ये एक अजीब मिसाल है।"

    "तसव्वुर और तवहहुम? मौलाना ने तअज्जुब के लहजा में फ़रमाया।

    "तसव्वुर और तवह्हुम! आप इस वाक़िया को तसव्वुर और तवह्हुम समझ रहे हैं। नहीं साहब! नहीं! ये तसव्वुर है और तवह्हुम तवारुद! रूहानियत की एक मावरा-ए-अक़्ल-ओ-फ़हम कारफ़रमाई है! आप तो माद्दा परस्त हैं रूह के इन मो’जिज़ात और तसर्रुफ़ात को क्या ख़ाक समझेंगे, लेकिन आपको क़ाइल हो जाना चाहिए... अब तो क़ाइल हो जाना ही चाहिए कि इस आलम-ए-ज़ाहिर के इलावा कोई बातिन भी है जहां ऐसी बातें बिल्कुल नामुमकिन हैं..."

    मैंने कहा, "मौलाना! दिमाग़ के अंदरूनी दुनिया में ऐसे अजाइबात का ज़ुहूर नामुमकिन नहीं। इस इल्म के माहिरीन, इस क़िस्म के वाक़ियात पर बहुत कुछ लिख चुके हैं..."

    "ख़ुदा के लिए हज़रत! मौलाना ने बिगड़ कर फ़रमाया... माहिरीन और मुबस्सिरीन का ज़िक्र छोड़िए। इन कमबख़्तों ने ज़िंदगी तल्ख़ कर दी है, रोज़ कुल्लियात क़ायम करते हैं, रोज़ उनको तोड़ते हैं, दीवारें बनाते हैं और गिराते हैं। अक़्ल के चक्कर ने उनको घनचक्कर बना दिया है। रूहानियत की लतीफ़ दुनिया में जो कुछ हुआ करता है और हो सकता है उसको ये अहमक़ क्या जानें..."

    मैंने कहा, "ख़ाक डालिए इस बहस पर, मगर ये तो बताइए कि वो ख़्वाजा ख़िज्र जिन्होंने मुझे भी सोने से जगाया और एडिटर साहब को भी बयक वक़्त... हालाँ कि मैं और एडिटर साहब उस वक़्त एक दूसरे से कम अज़ कम 15 मील के फ़ासिले पर सो रहे थे... और फिर वो दिन में भी बयक वक़्त दोनों के पास आए थे, कोई उनका मक़सूद भी था या महज़ दिल लगी थी?"

    "कोई पयाम लाए होंगे, कोई बात कहना चाहते होंगे, या महज़ अपनी सूरत दिखा कर तुम्हें मुतनब्बे करना चाहते होंगे... या कोई और मंशा होगा... क्या मालूम किसी को!" मौलाना ने मेरे एतिराज़ का... अपने ख़याल में बहुत ही मुख़्ततम जवाब दिया!

    बहस कुछ और बढ़ती लेकिन पास की मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आई और मौलाना नमाज़ के लिए उठ खड़े हुए...

    मैं और एडिटर साहिब रास्ते भर यही ज़िक्र करते हुए आए... वो भी हैरान, मैं भी हैरान! कुछ भी हो मैंने कहा वो पीर मर्द हैं बहुत हरजाई!

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