रुमूज़-ए-ख़ामोशी

मिर्ज़ा अज़ीम बेग़ चुग़ताई

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मिर्ज़ा अज़ीम बेग़ चुग़ताई

MORE BY मिर्ज़ा अज़ीम बेग़ चुग़ताई

    मैं चार बजे की गाड़ी से घर वापिस रहा था। दस बजे की गाड़ी से एक जगह गया था और चूँकि उसी रोज़ वापिस आना था लिहाज़ा मेरे पास अस्बाब वग़ैरा कुछ ना था। सिर्फ एक स्टेशन रह गया था। गाड़ी रुकी तो मैंने देखा कि एक साहिब सैकिण्ड क्लास के डिब्बे से उतरे। उनका क़द्द-ए-बला मुबालग़ा छः फुट था। बड़ी बड़ी मूँछें रोबदार चेहरे पर हुआ से हल रही थीं। नैकर और क़मीज़ पहने हुए पूरे पहलवान मालूम होते थे। ये किसी का इंतिज़ार कर रहे थे।दूर से उन्होंने एक आदमी को।।। जो कि ग़ालिबन उनका नौकर था देखा। चशम ज़ोन में उनका चेहरा ग़ज़बनाक हो गया। मैं बराबर वाले डीवढ़े दर्जे में बैठा था। एक साहिब ने इन ख़ौफ़नाक जवान को देखा और आप ही कहा। "ये ख़ूनी मालूम होता है।" मैंने उनकी तरफ़ देखा और फिर इन ख़ौफ़नाक हज़रत के ग़ज़बनाक चेहरे को देखा और दिल ही दिल में उनकी राय से इत्तिफ़ाक़ किया। आप यक़ीन करें कि उनकी आँखें शोला की मानिंद थीं और नौकर के आते ही इस ज़ोर से उन्होंने इस को एक क़दम आगे बढ़ा कर डिपटा कि वो डर कर एक दम से पीछे हटा और गार्ड साहिब से जो उस के बिलकुल ही क़रीब थे लड़ते लड़ते बच्चा। गार्ड साहिब सीटी बजाना मुल्तवी कर के एक तरफ़ को हो गए। उन्होंने एक निगाह इलतिफ़ात मुलाज़िम पर डाली और फिर इन हज़रत की तरफ़ देखा। दोनों मुस्कुराए गाड़ी चल दी।

    (१)

    गाड़ी स्टेशन पर रुकी और मैं उतरा। ये हज़रत भी उतरे। आप यक़ीन मानें कि मैं समझा कि मुझे कोई बिला लिपट गई जब उन्होंने एक दम से मुझे "बाओ" कर के चपटा लिया। आसल उन्होंने कहा था। "तुम कहाँ।" अगर उनकी तोंद कुछ नरम ना होती तो शाहिद मेरी एक आधी पिसली ज़रूर शिकस्त हो जाती। छूटते ही हाथ पकड़ लिया और हंसकर कहा: "अब तुम्हें नहीं छोड़ेंगे।"

    यहां अर्ज़ करना चाहता हूँ कि मुझको फज़ूलगो से जितनी नफ़रत थी।।। (अब नहीं है )।।। उतनी किसी चीज़ से ना थी। देखता था कि लोग बातें कर रहे हैं। ख़्वाह-मख़ाह एक दूसरे की बात काट रहा है और हर शख़्स की ये कोशिश है कि दम-ब-ख़ुद हो कर मेरी ही बात पर सब कान धरें। बसा-औक़ात मेरी ग़ैरमामूली ख़ामोशी पर एतराज़ होता। मुझसे शिकायत की जाती कि मैं बातों में दिलचस्पी नहीं ले रहा। मैं कोई जवाब ना देता और दिल में चचा सादी के अशआर पढ़ने लगता

    चोर कार बेफ़ज़ूल मिंबर आयेद

    मिरा रू-ए-सुख़न गुफ़्तन ना शायद

    दिगर बीनम कि नाबीना-ओ-चाह अस्त

    अगर ख़ामोश बशीनम गुनाह अस्त

    ऐसी सूरत में कि मेरे शआर ये हूँ जब उन्होंने मुझ पकड़ कर कहा " अब तुम्हें नहीं छोड़ेंगे।" तो मुम्किन था मैं ख़ामोशी से काम लेता। लेकिन यहां तो बग़ैर बोले काम ना चल सकता था। मगर क़बल उस के कि मैं कहूं कि हज़रत आप कौन साहिब हैं और मुझको क्यों पकड़ा है और आख़िर मुझको क्यों ना छोड़ेंगे और कैसे ना छोड़ेंगे। उहूं ने बग़ैर मेरा जवाब या मेरी बात सुनने हुए सिलसिला कलाम जारी रखा।

    "तुम बहुत दिनों बाद मिले हो।।। कहाँ थे।।। कैसे हो।।। वालिद साहिब तो बख़ैरीयत हैं।।।। और लोग कहाँ हैं।।। ?" अबे नालायक़।।। नामाक़ूल।।। ये देख।।। ये देख! आँखें खोल।।। अरे आँखें खोल कर।"

    मुलाज़िम पर खड़े दाँत पीस रहे थे। मेरा शुबा कि मुझे तो नहीं कह रहे हैं ज़ाइल हो चुका था। दरअसल ना उन्हें मेरे जवाबात की ज़रूरत थी और ना मुझमें हिम्मत बाअज़ वाक़ई हाज़िर-जवाब होते हैं, काश में भी ऐसा ही होता तो शायद उनको सवालात के जवाब देकर मज़े से बैठा हुआ घर की तरफ़ जा रहा होता। मैं अब ज़रा अपने आपको सँभाल कर उनकी ग़लतफ़हमी को रफ़ा करने के लिए अलफ़ाज़ ढूंढ रहा था और इस में मुझे कामयाबी होती भी मालूम होती थी, क्योंकि " माफ़ कीजिएगा मैंने पहचाना नहीं।" तो निहायत मुनासिब अलफ़ाज़ थे जो मुझको मिल गए थे और मैंने कहना शुरू किया।:

    "माफ़ कीजिएगा।।। "

    मगर उन्होंने बात काट कर फ़ौरन कहा। " जी नहीं।। ये नामुमकिन है।" और फिर उसी सिलसिले में कहा "अस्बाब नहीं है ?" और बग़ैर जवाब का इंतिज़ार किए हुए फिर ख़ुद ही उन्होंने कहा" "शायद दिन-भर के लिए आए हो गए। ख़ैर कोई हर्ज नहीं, अब दो तीन दिन तुम्हें ना छोड़ूँगा।" एक क़हक़हा लगाया और बड़े ज़ोर से कहा। "मैं नहीं छोड़ूँगा। नहीं छोड़ सकता।"

    मैंने दिल में सोचा कि भागों।।। हाथ छुड़ा कर। मगर अव्वल तो मेरी पतली कलाई गोया पंजा आहनी में थी और फिर स्टेशन की भीड़। ये ख़याल-ए-ख़ाम था।

    (२)

    मेरा हाथ पकड़े मुझको ले जा कर उन्होंने अपने साथ गाड़ी पर बिठाया। गाड़ी पर बैठते वक़्त में ज़रा रुका कि कहूं "जनाब आप मुझको क्यों और कहाँ ले जाते हैं?" मैंने ज़रा गला साफ़ कर के कहना चाहा कि उन्होंने गोया जबरन हाथ पकड़ कर गाड़ी में बिठा दिया और ख़ुद भी बैठ गए और बैठते बैठते कहा।

    " मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा।। वालिद साहिब तो बख़ैरीयत हैं?"

    मैंने कहा: "बख़ैरीयत हैं और।।। "

    वो बात काट कर बोल उठे। "और सब?" और फिर कहा। "सब अच्छी तरह हैं?" अरे मियां ये क्या वाहीयात है, सुना है कि तुम्हारे वालिद ने एक और शादी कर ली। ये ख़बर कहाँ तक सही है ?"

    "अलहाई ख़ैर।" मैंने दिल में कहा क्योंकि मेरी वालिदा साहिबा अरसा हुआ मर चुकी थीं, लेकिन फिर भी ब-हम्द-ओ-लिल्लाह " दो वालिदाएं मौजूद थीं। क्या ये मुम्किन है कि वालिद साहिब क़िबला की आबादी पसंद तबीयत ने।। या फिर मुझी हाल-ए-ज़ार पर रहम करते हुए दो माएं नुज़ूल शफ़क़त मादराना के लिए नाकाफ़ी समझते हुए एक का और इज़ाफ़ा फ़रमाया हो!!

    हज़रत को शाहिद मैंने पहचाना नहीं और उनकी तमाम जारिहाना कार्रवाई हक़बजानिब तो नहीं? आख़िर क्यों ना माज़रत कर के दरयाफ़त करूँ और आइन्दा के लिए तआरुफ़ कर लूं? मगर मेरी कम गोई।।। (अब तो बातूनी हूँ)।।। और सवालात करने से बचने की आदत।।। ( ब-हम्द-ओ-लिल्लाह अब तो फोरा सवाल करता हूँ)।।। का ख़ुदा भला करे कि ये मुझमें कमज़ोरी थी। मैंने फ़ौरन महसूस किया कि ये तो अजीब बात है। दस्त तास्सुफ़ मिलता था और कुछ कहना चाहता था मगर या तो बोला ही ना जाता और अगर हिम्मत कर के बोलने को होता तो फ़ौरन ही वो सवाल कर देते।

    मैं यही कहता रहा कि अब उनसे मुआमला साफ़ करूँ और अब पूछूँ कि गाड़ी एक कोठी में दाख़िल हो गई। मुझे बहाना मिला और सोचा कि अब इतमीनान से उनसे माज़रत करूँगा कि हज़रत मैंने आपको नहीं पहचाना। गाड़ी बाग़ में दाख़िल हुई और ये हज़रत बोले।,पिछली मर्तबा जो तुम आए थे तो तुमने वो अंगूर की बेल ना देखी होगी।। इस की जड़ में तीन बंदरों के सरगड़वाए हैं।"

    मैं भला उस का क्या जवाब देता। क्योंकि उम्र में पहली मर्तबा यहां आया और वो भी पकड़ा हुआ मगर ज़बान से लफ़्ज़" बंदर" निकल गया।

    उन्होंने कुछ फ़ख़्रिया लहजे में शायद इसी नीयत से कहा कि मैं उनसे ताज्जुब से पूछूँ कि साहिब बंदरों ने किया ख़ता की जो उनके सर के साथ ये चंगेज़ी कार्रवाई की गई।।।।और जब वो कुछ मुनासिब वजूह पेश करें तो उनकी मालूमात पर दंग रह जाऊं। शायद उन्होंने इसी ख़्याल से कहा।

    "जी हाँ बंदर !।।।।बंदरों के सर। "मगर मेरी ख़ामोशी से उनकी उम्मीद मुनक़ते हो गई। तो वो ख़ुद ही बोले। " आपको नहीं मालूम।।। मैं दरअसल फ़न बाग़बानी पर एक किताब लिख रहा हूँ। बात ये है कि बंदर के सर की खाद अंगूर के लिए लाजवाब है।"

    मैं भला क्या कहता। दिल में सोच रहा था कि आइन्दा अंगूर अगर मिलें तो खाऊं या ना खाऊं। बाग़बानी का तज़किरा छोड़कर उन्होंने कहा।

    "वो देखो वो पुर्सी की क़ब्र है।" उंगली उठा कर उन्होंने एक चोखोनटे चबूतरे की तरफ़ मुझे दिखा दिया।

    अंग्रेज़ों की क़ब्रें में पहले भी देख चुका था। कोई नई बात ना थी। पर सी हाँ इस नाम से भी वाक़िफ़ था। जो भी अख़बार पढ़ते रहे हैं वो सर पुर्सी का किस, हाई कमिशनर इराक़ के नाम और उनके तदब्बुर और पालिसी से वाफ़ हैं। मगर यहां उनकी क़ब्र कैसी ? उनके कोई अज़ीज़ होंगे। मैंने बजाय सवाल करने के हसब-ए-आदत दिल में ये कह कर इतमीनान कर लिया। हम बरामदे के पास पहुंच रहे थे। गाड़ी बिलकुल आहिस्ता-आहिस्ता चल रही थी, वो इसी तरह बोले।

    " मुझे पुर्सी के मरने का बहुत अफ़सोस हुआ और एक रोज़ मैंने खाना नहीं खाया।"

    मुझे क़तई यक़ीन हो गया कि उनकी मिस्टर पुर्सी से दोस्ती होगी। इतने में, मैंने देखा कि एक छोटा सा कुत्ता दौड़ता हुआ गाड़ी के पास पहुंचा। बंगला अभी बहुत दूर था मगर ये मालिक के इस्तिक़बाल को आया था। मैं ग़ौर से देख रहा था कि ये किट खन्ना कहाँ तक हो सकता है कि वो बोले :

    ये देखिए ये ग़रीब रह गया और पुर्सी मर गई। बड़ी ला-जवाब कुतिया थी।

    उधर में मुतअज्जिब था और इधर वो तारीफ़ के लहजा में कहने लगे। "आप ये ख़्याल कीजिए कि इतनी सी कुतिया थी मगर अकेली बिल्ली कार मार डालती थी और फिर तारीफ़ एक और भी थी, वो ये कि अगर कहीं कोई अजनबी बुनगे के अहाता में नज़र पड़ जाये तो बस उस की ख़बर ही तो ले डालती थी।"

    मैं चौकन्ना हुआ। दिल में, मैंने कहा कि अच्छा हो इक्का पुर्सी मर गई और आज ना हुई। फिर ग़ौर किया कि ये कुत्ता भी तो इसी के साथ है ! मैं जनाब कुत्तों से बहुत डरता हूँ और बिलख़सूस इन नालायक़ कुत्तों से जो हालाँकि कट खने ना हूँ मगर दौड़ पड़ते हैं और तमाम होश-ओ-हवास ज़ाइल कर के अक्सर गिरा देते हैं। मैंने पुर्सी की क़ब्र की तरफ़ इतमीनान से नज़र डाली और फिर उस कुत्ते को यानी पुर्सी मरहूमा के शौहर को देखा। इतने में गाड़ी बरामदे से आकर लगी और मैंने देखा कि एक ख़ौफ़नाक बिल डाग अंगड़ाई लेकर उठा। इतने में हम दोनों उतर पड़े।छोटा कुत्ता तो दम हिला कर मालिक के क़दमों में लौट रहा था, मगर ये संजीदा बुज़ुर्ग यानी बिल डाग साहिब मेरी रूह क़बज़ करने में मशग़ूल हो गए। यानी बरामदा से उतर कर उन्होंने मुझे सूँघा। मेरी सांसरिक गई और चेहरे पर ऐसी हवाईयां उड़ने लगीं कि उन्होंने महसूस किया और मुस्कुरा कर कहा। "अजी ये तो वही पुराना नामी है। बस सूरत ही डरावनी है। काटता तो कमबख़्त जानता ही नहीं। बहुत किया उसने और बड़ी बहादुर दिखाई तो बस लिपट जाता है।।। "उन्होंने मेरी सरासीमगी पर एक क़हक़हा लगाया। क्योंकि मैं फाँद कर गाड़ी में पहुंच चुका था। "लाहौल वलाक़ोऩ। तुम्हारा कुत्तों से डरना ना गया। ये तो वही पुराना नामी है।" ये कहते हुए उन्होंने मुझे हाथ पकड़ कर गाड़ी से उतारा और मुझे तेज़ी से बे-तकल्लुफ़ कमरे में दाख़िल होना पड़ा। ख़ुशक़िसमती से कुत्तों ने एक गिलहरी को पाया जिसके पीछे वो ऐसे दौड़ कि नज़रों से ओझल हो गए। मैं इतमीनान का सांस लिया।

    (३)

    पहुंचते ही उन्होंने आवाज़ दी। "खाना लाओ।" ख़ुदा ख़ैर करे।मैंने दिल में कहा कि ये खाने का कौन सा वक़्त है। बहुत जल्द हाथ धोए गए, इनकार वो का है को मानते, मैंने भी कहा

    इन हम अंदर आशिक़ी बालाए ग़म हाय दिगर

    खाने की मेज़ पर गर्म किया हुआ पुलाव, शामी कबाब, अंडों का क़वुर्मा और दूसरे खाने थे। मैं रकाबी के एक तरफ़ के चावल उठा कर दूसरी तरफ़ रखकर टीला सा बनाने में मशग़ूल हुआ और उन्होंने तेज़ी से चावल खाना।।। नहीं मैंने ग़लत कहा बल्कि पीना शुरू किए। शायद वो चबाना ना जानते थे या चावलों को चबाने की चीज़ ना ख़्याल करते थे। "आरिफ़ मियां कहाँ हैं?" चला कर मुलाज़िम से उन्होंने कहा कि"उनको जल्दी बुलाओ।" और मेरी तरफ़ मुस्किर कर कहा। "तुम्हारा भतीजा तो आया नहीं। नहा रहा होगा। वर्ना वो ज़रूर मेरे साथ खाना खाता है।"

    आप यक़ीन मानें कि मैंने इधर उधर भागने की नीयत से देखा। भतीजा! ये लफ़्ज़ भतीजा मेरे लिए लफ़्ज़ शेर से कम ना था। जिसके एक ना दो बल्कि सगे सौतेले मिला कर साढे़ चौदह भतीजे हूँ, इस से पूछिए कि ऐसी दुनिया अच्छी या दोज़ख़? ओ- अल्लाह आलम गुनह-गारों की इज़ार सानी के लिए वहां भतीजे भी होंगे या नहीं। अगर मेरे भतीजे जन्नत में गए तो दोज़ख़ की ज़िंदगी को बदर जहॉ पुर सुकून और जाएपनाह तसव्वुर करूँगा। मैं ये कहने में मुबालग़े से काम नहीं लेता क्योंकि चौदह पंद्रह भतीजे और सब एक जगह रहते हूँ तो ग़रीब चचा का जो हाल होगा उस का अंदाज़ा ख़ुद लगा लीजिए। वैसे ही किया कम मेरी जान घर के पंद्रह भतीजों ने मुसीबत में डाल रखी थी जो ये एक और निकला!!! कोई ख़ुदकुशी करता तो मैं मालूम करने की कोशिश की कोशिश करता कि इस के कितने भतीजे हैं। एक हो तो हो वर्ना दो होने की सूरत में मुझको ख़ुदकुशी करने की वजह मालूम करने में देर नहीं लगती थी। लफ़्ज़ भतीजा के कुछ भी मअनी हूँ मगर मेरी दानिस्त में मलिक-उल-मौत या जहन्नुम के सैक्रेटरी का नाम भी भतीजा होना चाहिए। मैं इस फ़लसफ़े पर ग़ौर कर रहा था कि वो बोले। "तुम्हारे कितने बच्चे हैं।"

    मैं इस का क्या जवाब देता क्योंकि मेरी शादी ही नहीं हुई है लेकिन शायद उनको जवाब की ज़रूरत ही ना थी, क्योंकि फ़ौरन ही उन्होंने बग़ैर मेरे जवाब का इंतिज़ार किए हुए कहा :

    "तुम्हारी बीवी कहाँ हैं? तुम्हारे कितने बच्चे हैं? " उन्होंने बहुत ज़ोर देकर पूछा।

    "तुम्हारे बच्चे हैं?"

    मजबूरन मुझे वाक़िया बयान करना पड़ा " एक भी नहीं।"

    चावल का बड़ा सा लुक़मा जो उन्होंने मुँह में रखा ही था।"अरे " के साथ निगल कर बोले। "अरे।।। दोनों।।।।दोनों बिचारे।।। ये आख़िर कब ?।।।। भई बात तो ये है कि ख़ुदा अगर बच्चे दे तो ज़िंदा रहें, वर्ना उनका होना और फिर मर जाना तो।।।।ख़ुदा की पनाह।।। "

    वो शायद मुझसे हमदर्दी कर रहे थे और उन्होंने कहा।।"तुम्हारी बीवी का ना मालूम क्या हाल होगा।"

    आप ख़ुद ख़्याल कीजिए कि मुझे भला क्या मालूम कि वो लड़की किस हाल में होगी जो आइन्दा चल कर मेरी बीवी होगी और मैं ख़ुद मजबूर था तो भला उनको क्या बताता कि इस का क्या हाल होगा कि इसी दौरान वो गया! कौन! अजी वही मलिक-उल-मौत या जहन्नुम का सैक्रेटरी यानी मेरा मुँह बोला भतीजा आरिफ़। मैं घबराया क्योंकि तीर की तरह "पापा! पापा!!" का नारा मारता चला रहा था। मैं सँभल कर बैठा और मुदाफ़अत की सूरतों और इमकानात पर ग़ौर करने लगा कि इस का रुख बदल गया। वो अपने पापा पर गिरा और तेज़ी से वो भी पुलाव पीने में मशग़ूल हो गया।।। "

    वालिद बुजु़र्गवार ने फ़र्ज़ंद अर्जुमंद से कहा : "तुमने चचा को ना तो सलाम किया और ना टाटा किया" टाटा।।। टाटा" कई मर्तबा फिर तक़ाज़ा किया।।" सलाम करो, टाटा करो।।। सलाम करो" बा अलफ़ाज़ दीगर मुझसे तक़ाज़ा हो रहा था कि मगर हज़रत मुझसे ये रिया कारी होना ना-मुम्किन थी।एक तो वैसे ही ख़ामोश आदमी थी ( अब नहीं)।।। और हत्ता अलामकान बग़ैर बातचीत किए काम निकालना चाहता था और फिर वैसे भी भतीजों को दुआ देने के ख़िलाफ़, ये ना ख़्याल कीजिएगा कि मैं ख़ुदा-न-ख़्वास्ता चाहता था कि वो मर जाएं, अजी हज़ार बरस ज़िंदा रहें मगर मेरी दुआ से बेनयाज़ रहें तो बेहतर। बारहा के तक़ाज़े से तंग आकर आख़िर भतीजे साहिब ने मेरी छाती पर मूंग दाल ही डाली। यानी अपना सीधा हाथ जो पुलाव के घी में तर-ब-तर था मेरे घुटने पर रखकर अपना बाया हाथ टाटा के लिए बढ़ा दिया। मैं दम-ब-ख़ुद रह गया। अपने साफ़ पतलून पर चिकनाई का धब्बा देखकर मेरी आँखों में ख़ून उतर आया। क्योंकि मेरे पास यही एक अच्छा पतलून था जो भतीजों की दसतबरद से अब तक ना मालूम किस तरह महफ़ूज़ था। उधर तो मैंने चावल घुटने पर से साफ़ किए और इधर उन्होंने कहा। " हाएं उल्टे हाथ से।" काश कि वो हज़रत भतीजे साहिब पेशतर ही टाटा(मुसाफ़ा )के लिए दाहिना हाथ बढ़ाते और बायां शौक़ से मेरे घुटने किया गले पर रख लेते। मैंने जबरन-ओ-क़हरन हाथ मिलाया और दिल में कहा।"ज़ालिम, तू ने मुझे बे-मौत मारा। मेरे पास एक ही पतलून था जिसको तू ने यूं ख़राब किया।"

    (४)

    मैं इतमीनान का सांस लिया। जब ये अज़ीज़ अज़ जान भतीजा ये कह कर खाना छोड़कर एक दम से भागा।"बला बला। " या तो वो तेज़ दौड़ता ही होगा, या फिर ये रिवायत बिलकुल सही है कि लाहौल पढ़ने शैतान बुरी तरह भागता है। मैं लाहौल पढ़ रहा था और इस के असर का दिल ही दिल में क़ाइल हो रहा था।

    "आपने हड्डी की तिजारत आख़िर क्यों छोड़ दी?" उन्होंने एक हड्डी का गूदा निकालने की कोशिश करते हुए कहा।

    क़ारईन ज़रा ग़ौर करें कि हड्डी की तिजारत को मैं छोड़ता तो तब जब कि अगर मैंने कभी ये तिजारत शुरू की होती। कहने को हुआ के कहूं कि " हज़रत मुझको भुला हड्डी की ताल्लुक़ से किया ताल्लुक़? " मगर तौबा कीजिए वो अपने तमाम सवालात का जवाब शुरू ही से ख़ुद दे रहे थे, या फिर जवाब का बग़ैर इंतिज़ार किए हुए दूसरा सवाल कर देते थे। मुझे भला कोई ज़रीं मौक़ा क्यों देते जो मैं ख़लासी पाता। क़बल उस के कि मैं निवाला ख़त्म कर के कहूं। उन्होंने कहा :

    " तिजारत वाला तो तिजारत ही करता है। हड्डी की ना सही पिसली की सही।"

    ये कह कर उन्होंने ज़ोर से क़हक़हा लगाया में उनके हक़ की गहराई पर ग़ौर कर रहा था कि वो मुल्क-उल-मौत पहुंचा।।। वो मूज़ी बला हाथ में लिए हुए चिंघाड़ता हुआ और खाना शुरू करने के बजाय बल्ले की तलवार बना कर पैंतरे बदल बदल कर रक़्स करने लगा। वो गोया बनोट के हाथ निकाल रहा था! मेरे मेज़बान या यू काए कि सय्याद वो चावल पीने की बजाय अगर कहीं खाने के आदी होते तो हंसी की वजह से ज़रूर उनके गले में फंदा पड़ जाता, क्योंकि उनकी दानिस्त में खाना खाने में हंसी मुख़िल नहीं हो सकती थी। वो ख़ूब हंस रहे थे। कहने लगे कि "बख़ुदा इस शरीर को देखिए।" मैं इस का क्या जवाब देता क्योंकि दीक ही रहा था और जानता था कि जो दम गुज़र रहा है वो ग़नीमत है। बनोट का क़ायदा है कि सारा खेल बस नज़र का होता है। ग़नीम से जब तक आँख मिली रहे या ग़नीम के हरकात पर जब तक नज़र जमी रहे उस वक़्त तक ख़ैर है वर्ना इधर आँख झुपकी और इधर पिटाई। ये सुनता ही था मगर आज साबित हो गया। दो मर्तबा उस का बल्ला मेरे सर पर से हो कर निकल गया और अगर मैं सर ना बचाऊं तो सर क़लम था। उन्होंने सिर्फ "हाएं" कहा। मैं टिकटिकी बाँधे उस गर्दनी ज़दनी भतीजे की तरफ़ देख ही रहा था कि मेरे मजी मेज़बान ने मेरी कमख़ोरी का गला कर के कहा।"ये लीजिए कबाब नहीं खाए। " उधर मेरी नज़र चौकी और इधर इस ज़ोर से मेरे मुँह पर बुला परा कि मेरी नाक पची हो गई, बल्कि मुझको ऐसा मालूम हुआ कि शायद मेरी नाक ऐनक के साथ अड़ी चली गई। फ़ौरन पहले तो मैंने अपनी नाक को देखा और इस को मौजूद पा कर लपक कर मैंने ऐनक उठाई। भतीजे साहिब भी गिर पड़े थे। ऐनक का एक ताल टूट गया था। या अली कह कर उन्होंने पट बाज़ को सँभाला और मैंने अपनी ऐनक को। "तुम बड़े नालायक़ हो। " डाँट कर उन्होंने लड़के से कहा। मुझसे माज़रत की और फिर इस से कहा कि माफ़ी माँगो। हालाँकि मैं ख़ुद उनसे माफ़ी और पनाह मांग रहा था। वो चुप हुआ तो कहा। "अच्छा अब जाओ" और एक तरफ़ ग़ौर से देखकर बोले और फिर कहा।।।।"अरे आती कियु नहीं। बड़ी अहमक़ हो। " ये कहते हुए उठे।

    अब मेरे लिए भागने का बेहतरीन मौक़ा था क्योंकि वो दूसरे कमरे में गए। मैं चाहता ही था कि इस ज़रीं मौक़ा से फ़ायदा उठाऊं क्या देखता हूँ कि वही ख़ौफ़नाक कुत्ता टॉमी मा छोटे कुत्ते के डाग गाड़ी की रफ़्तार से, इसी तरफ़ चला आरहा था। या अल्लाह अब में क्या करूँ ! एक तरफ़ से कुत्ते गए थे और दूसरी तरफ़ से बेगम साहिबा से मिलकर ग़लतफ़हमी रफ़ा होने वाली थी। अगर कुत्तों ने मुझको घेर ना लिया होता तो मैं भाग गया होता।मेरा दिल धड़क रहा था और उन्होंने आधी आँख से झांक कर मुझे देखा। मैं दम-ब-ख़ुद था। गोया मेरी रूह परवाज़ कर गई, क्योंकि मैं दौड़ने के इमकान पर ग़ौर कर रहा था और उनके हमले से बचना। ऐसे कि कुत्तों से भी बचत हो। सिर्फ एक बड़ा गुमला फाँद कर मुम्किन था। मैंने गमले की ऊंचाई पर नज़र डाली। मियां बीवी में तेज़ी से कुछ बातें हुईं और वो कुछ संजीदा सूरत बनाए हुए निकले।मैं भागने के लिए आमादा हो कर खड़ा हुआ मगर मेरे पैर गोया ज़मीन ने पकड़ लिए। वो मेरे क़रीन पहुंचे।।। मैंने कुत्तों की तरफ़ देखा और फिर गमले की तरफ़।।। दिल में सोचा कि फाँद जाऊँगा और बाएं तरफ़ से घूम कर अहाता की दीवार से निकल जाना मुम्किन है।।।। वो गए।।। मैं जानता था कि अगर उन्होंने घूँसा मारा तो मैं कलाई से रोकूँगा। कलाई ही टूट ही जाएगी मगर मुँह बच जाएगा। उन्होंने अपने जूते की चमक को देखा। मैंने कमरे की तरफ़ देखा कि बेगम साहिबा झांक रही हैं। "माफ़ कीजिएगा।" मेरे मेज़बान ने निहायत ही नरमी से कहा। "शाहिद ग़लतफ़हमी।।। मुझको ग़लतफ़हमी हुई।, मैंने सर झुका कर कहा।।। "मुझको ख़ुद अफ़सोस है।" वो बोले।" जनाब का इस्म गर्मी।" मैंने अपना नाम और पता वग़ैरा बताया। वो एक दम से बोले। " आपके वालिद साहिब।।।। अफवा!।।। आप आप के वालिद साहिब से तो देरीना मरासिम हैं। आपसे मिलकर बहुत ख़ुशी हुई। " उन्होंने हाथ मिला कर कहा। " किस क़दर आप मेरे दोस्त हामिद के हमशबीया हैं! बिलकुल वही।।। हू-ब-हू वही! आँखें ज़रा आपकी छोटी हैं और ज़रा पेशानी कम कुशादा है। वर्ना आप बिलकुल वही हैं और हाँ वो ऐनक नहीं लगाते और ज़रा होंट उनके पुतले हैं वर्ना बिलकुल आपकी सूरत शक्ल हैं। बस सिर्फ कुछ आपकी नाक उनसे ज़्यादा बड़ी है और चौड़ी चुकी है और।।। तो वो ऐनक की वजह से।।। आपकी ऐनक क्या हुई ?" मैंने बताया कि चूँकि उस का एक ताल टूट गया है मैंने जेब में रख ली है। उन्होंने ऐनक के टूटने पर इज़हार तास्सुफ़ किया, फिर उन्होंने बड़े अख़लाक़ से कहा।" कोई हर्ज नहीं, ना सही पहले मुलाक़ात मगर अब तो हम आपके बेहतरीन दोस्त हैं।" ये कह कर उन्होंने फिर गर्म-जोशी से हाथ मिलाया।

    मैंने इजाज़त चाही तो उन्होंने इसरार किया, मगर में ना माना तो कहने लगे कि गाड़ी तैयार किराए देता हूँ, मगर मेरी कमबख़्ती में ना माना। उन्होंने बहुत कुछ कहा मगर में ना माना। थोड़ी दूर तक बाग़ के पहले मोड़ तक वो मुझको रुख़स्त करने आए, और दुबारा आने का पुख़्ता वाअदा किया। वो तो वापिस हुए और मैं तेज़ी से फाटक की तरफ़ चला, मगर हज़रत वो कुत्ते अपने साथ ना ले गए और वो दुम हिलाते और कान फड़फड़ाते मेरे पीछे पीछे चले आरहे थे। मेरा दिल उल्टने लगा और मैंने अपनी रफ़्तार कुछ तेज़ की। कुत्ते भी कमबख़्त तेज़ होते, में और तेज़ हुआ और वो भी और तेज़ हुए। मजबूर हो कर में भागा तो वो भी भागे। अब में ऐसा बे-तहाशा भाग रहा था कि मुझको सर पैर की ख़बर ना थी। नज़र कमज़ोर होने की वजह से ऐनक लगाता था। बग़ैर ऐनक के राह धुँदली नज़र रही थी और फिर अंधेरा हो रहा था, मगर जनाब जिसके पीछे कुत्ते लगे हूँ उस को कुछ वैसे भी दिखलाई नहीं देखता। कुत्तों से बचने के लिए मैंने जान तोड़ कोशिश की और फाटक की राह छोड़कर एक तरफ़ अहाता की दीवार नीची देखकर इस तरफ़ भागा। कुत्ते कमबख़्त अब भाग नहीं रहे थे बल्कि भोंक भी रहे थे। नरम नरम कूड़े के अंबार पर मैं तेज़ी से चढ़ा और अपनी जान से हाथ धो कर ऐसा बे-तहाशा भागा कि दीवार को बग़ैर देखे फाँद गया। घूरे और कूड़े पर से लुढ़कता हुआ कोई पंद्रह फुट की गहराई में गिरा, बौखला कर उठा और गिरा। एक नज़र तो देखा कि कुत्ते ऊपर ही रुक गए हैं और फिर वहां से जिस तरह बन पड़ा जान बचा कर ऐसा भागा कि सड़क पर आराम दम लिया। सारा बदन और कपड़े कूड़े में अट गए थे। पतलून का सत्यानास हो चुका था। झाड़ता पोंछता हुआ घर पहुंचा।

    वो दिन और आज का दिन मैंने कसम खा ली है कि ख़ाह कोई कुछ कहे। मैं बातें और वो भी फ़ुज़ूल बातें करने से बाज़ ना रहूँगा, और अगर ज़रा भी में किसी को ख़ामोश पाता हूँ तो इस को बोलने पर मजबूर करता हूँ, और अपने सवालों का जवाब तो ज़रूर ही लेता हूँ

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