मोमिन ख़ान मोमिन शायरी

मोमिन ख़ान मोमिन क्लासिक उर्दू शायरी में एक अहम् नाम हैं | उन्होंने उर्दू अदब को अपनी कई बेहतरीन ग़ज़लों से नवाज़ा | कहते हैं , मोमिन के एक शेर को सुन कर ग़ालिब इतने ख़ुश हुए कि उन्होंने अपना पूरा दीवान मोमिन के नाम करने की बात कही थी |

तुम मिरे पास होते हो गोया

जब कोई दूसरा नहीं होता

मोमिन ख़ाँ मोमिन

उम्र तो सारी कटी इश्क़-ए-बुताँ में 'मोमिन'

आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे

मोमिन ख़ाँ मोमिन

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि याद हो

वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि याद हो

मोमिन ख़ाँ मोमिन

किसी का हुआ आज कल था किसी का

है तू किसी का होगा किसी का

मोमिन ख़ाँ मोमिन

वो आए हैं पशेमाँ लाश पर अब

तुझे ज़िंदगी लाऊँ कहाँ से

मोमिन ख़ाँ मोमिन

उलझा है पाँव यार का ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में

लो आप अपने दाम में सय्याद गया

मोमिन ख़ाँ मोमिन

गो आप ने जवाब बुरा ही दिया वले

मुझ से बयाँ कीजे अदू के पयाम को

मोमिन ख़ाँ मोमिन

एजाज़-ए-जाँ-दही है हमारे कलाम को

ज़िंदा किया है हम ने मसीहा के नाम को

मोमिन ख़ाँ मोमिन
बोलिए