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मौलाना जलालुद्दीन रूमी

मुंशी नवल किशोर, लखनऊ
1914 | अन्य

पुस्तक: परिचय

परिचय

مثنوی معنوی حضرت مولانا رومی کی عالمی شہرت یافتہ مثنوی ہے جسے بلا شک و شبہ ہم عالمی ادب کے مقابلہ میں رکھ سکتے ہیں۔ مثنوی کیا پہلوی زبان کا قرآن ہے ۔جس کے بارے میں خود ہی مولانا رومی فرماتے ہیں کہ میں نے قرآن سے اس کا مغز اکٹھا کر دیا ہے ۔ رومی کی یہ مثنوی ادبی لحاظ سے بہت ہی اعلی درجہ رکھتی ہے۔ اس میں متصوفانہ مضامین کی بھرمار ہے ۔مولانا نے اس کو حسام الدین چلپی کی فرمائش پر نظم کیا بلکہ یہ کہنا زیادہ مناسب ہے کہ الحام ہوئی۔ آج مثنوی معنوی دنیا کی ہر بڑی زبان میں ترجمہ ہو چکی ہے اور اس کو بہت ہی شوق سے پڑھا جاتا ہے اور اپنے دل کو سکون پہونچایا جاتا ہے۔ اردو زبان میں بھی متعدد بار اس مثنوی کے تراجم ہو چکے ہیں۔جن میں قاضی سجاد حسین کا ترجمہ خاصہ مقبول ہے۔ اشرف علی تھانوی کی تقاریر جو کہ کلید مثنوی سے شایع ہو چکی ہے کا بھی الگ مزہ ہے۔ اسی کڑی کی ایک لڑی یہ ترجمہ بھی ہے جسے عبد المجید صاحب نے ترجمہ کیا ہے ۔ زیر نظر ترجمہ دفتر پنجم کا ترجمہ ہے ۔ ترجمہ نہایت ہی صاف و سلیس کیا گیا ہے۔ مگر اپنے زمانے کی قدامت کی وجہ سے تھوڑا زبان کی شستگی میں رکاوٹ ہوتی ہے۔

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लेखक: परिचय

मौलाना जलालुद्दीन रूमी

मौलाना जलालुद्दीन रूमी

पूरा नाम जलालुद्दीन रूमी. इनकी मसनवी को क़ुरआनी पहलवी भी कहते हैं. इसमें 26600 दो-पदी  छंद हैं , कहा जाता है कि निशापुर में इनकी भेंट प्रसिद्ध सूफ़ी संत शेख़ फ़रीदुद्दीन अत्तार से भी हुई थी.  फ़रीदुद्दीन अत्तार ने इन्हें अपनी इलाहीनामा की एक प्रति भेंट भी की थी.  रूमी की दो शादियाँ हुईं, जिनसे इन्हें दो बेटे और एक बेटी पैदा हुई थी.  विनफ़ील्ड के अनुसार रहस्यवाद में रूमी की बराबरी कोई नहीं कर सकता. रूमी शम्स तबरेज़ को अपना मुर्शिद मानते थे और उनकी रहस्यमयी मृत्यु के बाद उन्होंने अपने दीवान का नाम भी अपने मुर्शिद के नाम पर ही रखा. रूमी की मसनवी दुनिया भर में सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली किताबों में शुमार होती है|

प्रमुख रचनायें

१. मसनवी

२. दीवान-ए-शम्स तबरेज़

 

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