आज के चुनिन्दा 5 शेर

ग़म है आवारा अकेले में भटक जाता है

जिस जगह रहिए वहाँ मिलते-मिलाते रहिए

निदा फ़ाज़ली
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दिल्ली कहाँ गईं तिरे कूचों की रौनक़ें

गलियों से सर झुका के गुज़रने लगा हूँ मैं

जाँ निसार अख़्तर

शहर-ए-दिल आबाद था जब तक वो शहर-आरा रहा

जब वो शहर-आरा गया फिर शहर-ए-दिल में क्या रहा

नज़ीर अकबराबादी

यूँ भी हज़ारों लाखों में तुम इंतिख़ाब हो

पूरा करो सवाल तो फिर ला-जवाब हो

दाग़ देहलवी
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छेड़ मत हर दम आईना दिखा

अपनी सूरत से ख़फ़ा बैठे हैं हम

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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आज का शब्द

अलामत

  • alaamat
  • علامت

शब्दार्थ

symptom/ sign

फूल थे रंग थे लम्हों की सबाहत हम थे

ऐसे ज़िंदा थे कि जीने की अलामत हम थे

शब्दकोश

Quiz A collection of interesting questions related to Urdu poetry, prose and literary history. Play Rekhta Quiz and check your knowledge about Urdu!

In the couplet, 'pyasi jo thi sipaah-e-khuda teen raat ki, saahil se sar paTakti thii.n mauje.n furaat ki', which figure of speech has been put to work?
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क्या आप जानते हैं?

मुजरा का मतलब सिर्फ़ औरतों का महफ़िलों में लोगों की तफ़रीह के लिए गाना-बजाना ही नहीं होता है जो हिंदी फ़िल्मों की वजह से अब नृत्य कला का एक अंदाज़ माना जाता है।
शब्द मुजरा उर्दू अदब में सलाम करने के मायने में भी इस्तेमाल होता है। शायरों के कलाम में, उर्दू नस्र में और हिंदी में भी अक्सर यह इसी मायने में नज़र आता है।
राम झरोके बैठ के सब का मुजरा लेत
जैसी जा की चाकरी वैसा उसको देत
मुजरा से शब्द मुजरई बना जिसका अर्थ होता है सलाम करने वाला। यह उर्दू मरसियों में अलग ही ढंग से इस्तेमाल हुआ है। वह मरसिया जो रूबाई, ग़ज़ल या क़तए के तर्ज़ पर कहा जाता है उसके मतला में शब्द मुजरा या सलाम लाया जाता है:
हुसैन यूं हुए ऐ मुजरई वतन से जुदा
कि जैसे बुलबुल ए नाशाद हो चमन से जुदा
इसके अलावा मुजरा हिसाब-किताब के मायने में भी इस्तेमाल होता है जैसे,
"आप के हिसाब में से इतनी रक़म मुजरा कर दी गई।" अर्थात घटा दी गई।

क्या आप जानते हैं?

अज़ीज़

क्या आप जानते हैं?

लुतफ़ुल्लाह

लुत्फ़ उल्लाह ख़ां ने आधी सदी के अर्से में 5000 अहम शख़्सियात, गायकों, संगीतकारों,अदीबों और शायरों के कलाम और बातचीत को रिकॉर्ड कर के सुरक्षित कर लिया था। अब यह ख़ज़ाना यूट्यूब पर आकर विश्व व्यापी शोहरत पा चुका है। इसकी एक ख़ास बात यह भी है कि इसमें बहुत से अदीबों और शायरों ने अपने बारे में ऐसी बातें भी रिकॉर्ड कराई हैं जो किसी और जगह मौजूद नहीं हैं।
इस ख़ज़ाने में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का सारा कलाम उनकी आवाज़ में मौजूद है जो उन्होंने 25 वर्षों के दौरान क़िस्तों में रिकॉर्ड कराया था। जब भी वह कोई नई नज़्म या ग़ज़ल कहते तो ख़ां साहब के यहां जा कर ज़रूर रिकॉर्ड कराते थे।
लुत्फ़ उल्लाह ख़ां (1916-2012) मद्रास (अब चेन्नई) में पैदा हुए। दस वर्ष बंबई में रहे और देश विभाजन के बाद कराची चले गए और वहां एक एड्वर्टाइजिंग कम्पनी के मालिक थे। बचपन से ही ललित कला में रुचि थी, संगीत के बारे में बहुत मालूमात रखते थे। ख़ुद गायक और फ़ोटोग्राफ़र थे। जवानी में शायरी भी किया करते थे। संगीत और अपनी यादों पर आधारित कई किताबों के लेखक थे। अपनी किताब "तमाशा ए अह्ले क़लम" में उन्होंने कुछ मशहूर अदीबों और शायरों के साथ अपनी मुलाकात और यादों को बहुत दिलचस्प अंदाज़ में पेश किया है।

क्या आप जानते हैं?

जाँ

फ़िल्मों के लिए एक सौ इक्यावन ख़ूबसूरत गाने लिखने वाले मद्धिम और ख़ूबसूरत लहजे के शायर जां निसार अख़्तर कई नज़्मों और ग़ज़लों के संग्रहों के रचनाकार हैं। उन्होंने तेरह साल की उम्र से ग़ज़लें कहना शुरू कर दिया था। उन्हें अपने ग़ज़ल गो और हिंदी गीतकार पिता मुज़्तर ख़ैराबादी से हिंदुस्तान की गंगा जमुनी तहज़ीब में रची शायरी की विरासत मिली थी जिसे अब उनके बेटे जावेद अख़्तर बख़ूबी संभाल रहे हैं।
जां निसार अख़्तर ने अलीगढ़ में छात्र जीवन में एक नज़्म "गर्ल्स कॉलेज की लारी"  कही थी जो बहुत मशहूर हुई थी। एक बार अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के मुशायरे में जिगर मुरादाबादी भी शामिल थे जिनकी शोहरत उस वक्त शिखर पर थी। उनके कलाम के बाद मुशायरा ख़त्म होने का एलान हो गया लेकिन छात्रों ने हंगामा किया कि जां निसार अख़्तर "गर्ल्स कॉलेज की लारी" सुनाएं और उन्हें सुनानी पड़ी। वर्षों बाद महिलाओं के संदर्भ से एक महत्वपूर्ण रचना ने धूम मचा दी, वो थी रूबाइयों और क़तात का संग्रह "घर आंगन" जिसने पहली बार दाम्पत्य जीवन और घरेलू महिला को उर्दू शायरी में विशेष महत्व दिया गया था। अपनी बेहद चाहने वाली स्वर्गीय पत्नी सुफ़िया अख़्तर के पत्रों को प्रकाशित करा कर भी उन्होंने नारी साहित्य में इज़ाफ़ा किया। उनकी पहली बरसी पर जां निसार अख़्तर की लिखी हुई नज़्म "ख़ामोश आवाज़" में मुहब्बत का एक अनोखा अंदाज़ है। स्वर्गीय पत्नी ख़ुद उदास पति को दिलासा दे रही है:
कितने दिन में आए हो साथी, मेरे सोए भाग जगाने
मुझसे अलग इस एक बरस में क्या क्या बीती तुम पे न जाने

क्या आप जानते हैं?

अख़्तर

अख़्तर शीरानी जो रूमान के शायर कहलाते हैं, उन्होंने पहली बार उर्दू शायरी में महबूबा को कोई नाम दिया। सलमा, रेहाना और अज़रा उनकी नज़्मों में लताफ़त व मुहब्बत का जीता जागता पात्र हैं। उन्होंने ख़ुद अपने एक दोस्त से यह स्वीकार किया था कि सलमा उनकी महबूबा का असल नहीं फ़र्ज़ी नाम है और बाकी नारी नाम भी उसी का बिंब हैं:
यही वादी है वो हमदम जहां रेहाना रहती थी
वो इस वादी की शहज़ादी थी और शाहाना रहती थी
उर्दू में सानेट लिखने की शुरुआत भी उन्होंने ही की थी लेकिन रूमानी शायर के तौर पर उनकी शोहरत उनके कहानी लेखन और अनुवाद पर हावी हो गई। शराब नोशी की ज़्यादती की वजह से अख़्तर शीरानी (1905-1948) सिर्फ़ 43 वर्ष की उम्र में दुनिया से चले गए लेकिन इस छोटी सी अवस्था में उन्होंने नज़्म व नस्र (कविता और गद्य) में इतना कुछ लिखा कि बहुत कम लोग अपनी लम्बी उम्र में भी इतना लिख पाते हैं। उन्होंने मशहूर तुर्की नाटककार सामी बे के नाटक "कावे" को "ज़हाक" के नाम से उर्दू रूप दिया था। "आईना ख़ाने में" उनके पांच अफ़सानों का संग्रह है। कहा जाता है कि यह सब एक ही रात में लिखे गए थे। ये अफ़साने फ़िल्मी अदाकाराओं की आपबीती के रूप में हैं जिनमें औरतों के शोषण की कहानी है। वह बहुत से अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए लार्ड बायरन आफ़ राजस्थान, इब्ने बतूता, बालम, राज कुमारी, बकावली, अक्कास वग़ैरह के फ़र्ज़ी नामों से कालम लिखते थे।

आज की प्रस्तुति

ग़ालिब और ज़ौक़ के समकालीन। वह हकीम, ज्योतिषी और शतरंज के खिलाड़ी भी थे। कहा जाता है मिर्ज़ा ग़ालीब ने उनके शेर ' तुम मेरे पास होते हो गोया/ जब कोई दूसरा नही होता ' पर अपना पूरा दीवान देने की बात कही थी।

असर उस को ज़रा नहीं होता

रंज राहत-फ़ज़ा नहीं होता

पूर्ण ग़ज़ल देखें

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परवीन शाकिर

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