आज के चुनिन्दा 5 शेर

ब-नाम-ए-इश्क़ इक एहसान सा अभी तक है

वो सादा-लौह हमें चाहता अभी तक है

शहराम सर्मदी

वो जिस्म रूह ख़ला आसमान है क्या है

कि रंग कोई हो उस से जुदा नहीं मिलता

विशाल खुल्लर

एक बे-चेहरा सी उम्मीद है चेहरा चेहरा

जिस तरफ़ देखिए आने को है आने वाला

निदा फ़ाज़ली

कोई शय दिल को बहलाती नहीं है

परेशानी की रुत जाती नहीं है

बख़्श लाइलपूरी
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शौक़-ए-सफ़र बे-सबब और सफ़र बे-तलब

उस की तरफ़ चल दिए जिस ने पुकारा था

शहज़ाद अहमद
आज का शब्द

गुंजाइश

  • gunjaa.ish
  • گنجائش

शब्दार्थ

room/capacity

अब दिलों में कोई गुंजाइश नहीं मिलती 'हयात'

बस किताबों में लिक्खा हर्फ़-ए-वफ़ा रह जाएगा

शब्दकोश

Quiz A collection of interesting questions related to Urdu poetry, prose and literary history. Play Rekhta Quiz and check your knowledge about Urdu!

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क्या आप जानते हैं?

गुलज़ार

उर्दू के तरह-दार शायर, गंगा-जमनी तहज़ीब के अमीन और पास-दार जंग-ए-आज़ादी के मुजाहिद जनाब पंडित आनंद मोहन ज़ुत्शी गुलज़ार देहलवी (1926-2020) रमज़ान के महीने में हर साल एक रोज़ा रखते थे जिसे ख़ुद उन्हों ने ‘‘रोज़ा रवादारी’’ का नाम दिया था। आम-तौर पर ‘‘जुमअतुल-विदा’’ या'नी रमज़ान के महीने के आख़िरी जुम’ए को वो ये रोज़ा रखते थे। उनके अहबाब बा-क़ाएदा चंदा कर के बहुत शानदार इफ़्तार की दावत का एहतिमाम करते थे। दावत-नामे डाक से भेजे जाते थे। इस रोज़ा-इफ़्तार में बिला-तफ़रीक़ मज़हब-ओ-मिल्लत अहम शख़्सियात शरीक होती थीं।
वो कहते हैः-
दर्स-ए-उर्दू-ज़बान देता हूँ
अहल-ए-ईमाँ पे जान देता हूँ
मैं अजब हूँ इमाम उर्दू का
बुत-कदे में अज़ान देता हूँ
शायरी के साथ साथ वो उर्दू के पहले उर्दू साइंस मैगज़ीन ‘‘साइंस की दुनिया’’ के बरसों एडिटर भी रहे जिसे हुकूमत-ए-हिन्द ने 1975 में शुरूअ' किया था।

क्या आप जानते हैं?

अख़्तर

अख़्तर शीरानी जो रूमान के शायर कहलाते हैं, उन्होंने पहली बार उर्दू शायरी में महबूबा को कोई नाम दिया। सलमा, रेहाना और अज़रा उनकी नज़्मों में लताफ़त व मुहब्बत का जीता जागता पात्र हैं। उन्होंने ख़ुद अपने एक दोस्त से यह स्वीकार किया था कि सलमा उनकी महबूबा का असल नहीं फ़र्ज़ी नाम है और बाकी नारी नाम भी उसी का बिंब हैं:
यही वादी है वो हमदम जहां रेहाना रहती थी
वो इस वादी की शहज़ादी थी और शाहाना रहती थी
उर्दू में सानेट लिखने की शुरुआत भी उन्होंने ही की थी लेकिन रूमानी शायर के तौर पर उनकी शोहरत उनके कहानी लेखन और अनुवाद पर हावी हो गई। शराब नोशी की ज़्यादती की वजह से अख़्तर शीरानी (1905-1948) सिर्फ़ 43 वर्ष की उम्र में दुनिया से चले गए लेकिन इस छोटी सी अवस्था में उन्होंने नज़्म व नस्र (कविता और गद्य) में इतना कुछ लिखा कि बहुत कम लोग अपनी लम्बी उम्र में भी इतना लिख पाते हैं। उन्होंने मशहूर तुर्की नाटककार सामी बे के नाटक "कावे" को "ज़हाक" के नाम से उर्दू रूप दिया था। "आईना ख़ाने में" उनके पांच अफ़सानों का संग्रह है। कहा जाता है कि यह सब एक ही रात में लिखे गए थे। ये अफ़साने फ़िल्मी अदाकाराओं की आपबीती के रूप में हैं जिनमें औरतों के शोषण की कहानी है। वह बहुत से अख़बारों और पत्रिकाओं के लिए लार्ड बायरन आफ़ राजस्थान, इब्ने बतूता, बालम, राज कुमारी, बकावली, अक्कास वग़ैरह के फ़र्ज़ी नामों से कालम लिखते थे।

क्या आप जानते हैं?

एहसान

शायर-ए-मज़दूर एहसान दानिश की सवानेह ‘‘जहान-ए-दानिश’’ में उन्हों ने अपनी शदीद ग़ुर्बत, बचपन से मुख़्तलिफ़ क़िस्म की मज़दूरी करना और अपनी अदबी जिद्द-ओ-जहद की तफ़्सील बे-हद दिलचस्प अंदाज़ में पेश की है।
एक बार ‘‘बज़्म-ए-शोरिश’’ के दावत-नामा पर वो अमृतसर मुशायरे में शिरकत के लिए पहुँचे तो  टाउन हॉल के बाहर ही मुन्तज़िमीन ने रोक दिया। रास्ते की धूल और बसों के धुएँ से अटी बद-रंग  खद्दर की पुरानी शेरवानी पहने उनका हुलिया देख कर उन्हें शायर ही तस्लीम नहीं किया गया।  एक जानकार की मुदाख़लत पर हॉल में जाने की इजाज़त मिल गई। नाज़िम-ए-मुशायरा ने नाक भौं चढ़ा कर उन्हें दावत-ए-कलाम दी तो हाज़िरीन-ए-मुशायरा ने हूटिंग शुरूअ' कर दी जैसे ही उन्हों ने तरन्नुम के साथ मतला पढ़ा हाज़िरीन पर एक सकते का आलम तारी हो गया और दूसरे शेर पर दाद-ओ-तहसीन के फूल बरसने लगे एहसान दानिश ने ग़ज़ल ख़त्म की और मक़्ता पढ़ कर वहीं ज़मीन पर जा बैठे।
क्या आप जानते हैं सिर्फ़ चौथी क्लास पास करने वाले इस शायर-ए-मज़दूर की तसनीफ़ात में बीस शे'री मजमूए, उनतीस नसरी अदब की किताबें और पाँचवीं जमाअत तक के लिए रियाज़ी की दस किताबें शामिल हैं।

क्या आप जानते हैं?

‘‘दीवान’’ ग़ज़ल के उस मजमूए को कहा जाता है जिसको ब-लिहाज़ रदीफ़ ‘‘अलिफ़’’ से ‘‘या’’ तक सिलसिला-वार मुरत्तब किया जाए। जैसे ग़ालिब के दीवान की पहली ग़ज़ल है
‘नक़्श फ़रियादी है किस की शोख़ी-ए-तहरीर का’
मीर तक़ी ‘मीर’ कहते हैं:
मुझको शायर न कहो 'मीर' कि साहब मैं ने
दर्द-ओ-ग़म कितने किए जम्अ तो दीवान किया
अब ये तरीक़ा तक़रीबन मतरूक हो गया है आज-कल शायर अपने मजमू-ए-कलाम शाए करते हैं जिन में नज़्में और ग़ज़लें और दीगर अस्नाफ़-ए-सुख़न शामिल होते हैं और किताब का कोई शायराना सा नाम भी होता है जो उस मजमूए के मिज़ाज से मुताबक़त रखता है।
शायर अपना कलाम जिस कॉपी या नोट-बुक में लिख कर महफ़ूज़ कर लेते हैं वो ‘‘बयाज़’’ कहलाती है आज-कल तो मोबाइल फ़ोन भी बयाज़ का काम देता है।
लोग अपने पसंदीदा शायरों का कलाम भी किसी कॉपी में लिख लेते हैं वो भी ‘‘बयाज़’’ कहलाती है।
उस ने आँचल से निकाली मिरी गुम-गश्ता बयाज़
और चुपके से मोहब्बत का वरक़ मोड़ दिया
जावेद सबा

क्या आप जानते हैं?

शाहिद

उर्दू ज़बान के नश्व-ओ-नुमा में नवल किशोर प्रेस के बाद मकतबा-ए-जामिआ लिमिटेड का बहुत बड़ा हाथ है और उसकी पहचान और शान थे। उसके जनरल मैनेजर शाहिद अली ख़ाँ लोग मज़ाक़ में कहते थे कि पागर कोई पते की जगह शाहिद अली ख़ान लिमिटेड भी लिख दे तो ख़त पहुँच जाता था शाहिद साहब सन 1957 से 1970 तक  मकतबे की बम्बई ब्रांच के मैनेजर रहे थे। इस दौरान उनकी सरपरस्ती में ये छोटी सी दुकान एक अदबी मरकज़ बन गई थी। बम्बई के सब काबिल-ए-ज़िक्र अदीब और शायर वहाँ आते जाते थे। सनीचर की शाम को ख़ास नशिस्त होती और शामिल होने वाले सनीचरी शायर-ओ-अदीब कहलाने लगे थे। उस अदबी मरकज़ ने तरक़्क़ी-पसंदों का उरूज-ओ-ज़वाल भी देखा और जदीदियत के नशे में डूबे हुए नौजवान भी देखे। वहाँ शेर-ओ-शायरी   भी होती थी और नज़रियाती बहसें भी ज़ोर-ओ-शोर से होती थीं।
शाहिद साहब साहिर, जाँ निसार अख़्तर, और बहुत से शायरों के मुतअल्लिक़ दिलचस्प क़िस्से सुनाते थे। एक क़िस्सा ये भी सुनाया कि एक बार एक बुर्क़ा-पोश ख़ातून ने दुकान में दाख़िल हो कर दरवाज़ा बंद कर दिया तो वो घबरा गए। उर्दू शायरी की कई किताबें ख़रीद कर जब वो ख़ातून बोलीं और नक़ाब उठाई तो मा'लूम हुआ कि मीना कुमारी थीं परस्तारों की भीड़ जमा होजाने के ख़ौफ़ से उन्हों ने दरवाज़ा बंद करलिया था।

आज की प्रस्तुति

प्रतिष्ठित प्रगतिशील शायर,आलोचक,पटकथा लेखक,और गीतकार/ फ़िल्म 'बाजार' के गीत 'करोगे याद तो हर बात याद आएगी' के लिए प्रसिद्ध

चुप-चाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो

किस दर्द को कहते हैं वफ़ा तुम भी तो देखो

पूर्ण ग़ज़ल देखें

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