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सरफ़राज़ ख़ालिद

1980 | अलीगढ़, भारत

सरफ़राज़ ख़ालिद के शेर

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आइने में कहीं गुम हो गई सूरत मेरी

मुझ से मिलती ही नहीं शक्ल-ओ-शबाहत मेरी

रौनक़-ए-बज़्म नहीं था कोई तुझ से पहले

रौनक़-ए-बज़्म तिरे बा'द नहीं है कोई

उस से कह दो कि मुझे उस से नहीं मिलना है

वो है मसरूफ़ तो बे-कार नहीं हूँ मैं भी

उसी के ख़्वाब थे सारे उसी को सौंप दिए

सो वो भी जीत गया और मैं भी हारा नहीं

दिल जो टूटा है तो फिर याद नहीं है कोई

इस ख़राबे में अब आबाद नहीं है कोई

देर तक जागते रहने का सबब याद आया

तुम से बिछड़े थे किसी मोड़ पे अब याद आया

हम किसी और वक़्त के हैं असीर

सुब्ह के शाम के रहे ही नहीं

मिलते हो तो अब तुम भी बहुत रहते हो ख़ामोश

क्या तुम को भी अब मेरी ख़बर होने लगी है

अब मुझ में कोई बात नई ढूँढने वालो

अब मुझ में कोई बात पुरानी भी नहीं है

चाँद का सितारों आफ़्ताब का है

सवाल अब के मिरी जाँ तिरे जवाब का है

अब जिस्म के अंदर से आवाज़ नहीं आती

अब जिस्म के अंदर वो रहता ही नहीं होगा

उसी से पूछो उसे नींद क्यूँ नहीं आती

ये उस का काम नहीं है तो मेरा काम है क्या

जो तुम कहते हो मुझ से पहले तुम आए थे महफ़िल में

तो फिर तुम ही बताओ आज क्या क्या होने वाला है

आँखों ने बनाई थी कोई ख़्वाब की तस्वीर

तुम भूल गए हो तो किसे ध्यान रहेगा

रात बाक़ी है कोई ख़्वाब बाक़ी है

मगर अभी मिरे ग़म का हिसाब का बाक़ी है

लम्बी है बहुत आज की शब जागने वालो

और याद मुझे कोई कहानी भी नहीं है

सियाह रात के पहलू में जिस्म के अंदर

किसी गुनाह की ख़्वाहिश को पालते रहना

ज़ीस्त की यकसानियत से तंग जाते हैं सब

एक दिन तू भी मिरी बातों से उकता जाएगा

मौसम कोई भी हो पे बदलता नहीं हूँ मैं

या'नी किसी भी साँचे में ढलता नहीं हूँ मैं

तुम थे तो हर इक दर्द तुम्हीं से था इबारत

अब ज़िंदगी ख़ानों में बसर होने लगी है

पैरों से बाँध लेता हूँ पिछली मसाफ़तें

तन्हा किसी सफ़र पे निकलता नहीं हूँ मैं

अजीब फ़ुर्सत-ए-आवारगी मिली है मुझे

बिछड़ के तुझ से ज़माने का डर नहीं है कोई

वो चेहरा मुझे साफ़ दिखाई नहीं देता

रह जाती हैं सायों में उलझ कर मिरी आँखें

अपने ही साए से हर गाम लरज़ जाता हूँ

मुझ से तय ही नहीं होती है मसाफ़त मेरी

ये काएनात भी क्या क़ैद-ख़ाना है कोई

ये ज़िंदगी भी कोई तर्ज़-ए-इंतिक़ाम है क्या

ख़्वाब मैले हो गए थे उन को धोना चाहिए था

रात की तन्हाइयों में ख़ूब रोना चाहिए था

शरीक वो भी रहा काविश-ए-मोहब्बत में

शुरूअ उस ने किया था तमाम मैं ने किया

बादा-ओ-जाम के रहे ही नहीं

हम किसी काम के रहे ही नहीं

बात तो ये है कि वो घर से निकलता भी नहीं

और मुझ को सर-ए-बाज़ार लिए फिरता है

मैं अपने-आप से आगे निकल गया हूँ बहुत

किसी सफ़र के हवाले ये जिस्म-ओ-जाँ कर के

किसी ने जाँ ही लुटा दी वफ़ाओं की ख़ातिर

तुम ही बताओ कि क़िस्सा ये किस किताब का है

तिरी दुआएँ भी शामिल हैं कोशिशों में मिरी

मुसीबतों का टलना अजीब लगता है

सितम किए हैं तो क्या तुझ से है हयात मिरी

क़रीब मिरी आँखों के ख़्वाब, ज़िंदा हूँ

इब्तिदा उस ने ही की थी मिरी रुस्वाई की

वो ख़ुदा है तो गुनहगार नहीं हूँ मैं भी

सुनते हैं बयाबाँ भी कभी शहर रहा था

सो शहर भी इक रोज़ बयाबान रहेगा

होश जाता रहा दुनिया की ख़बर ही रही

जब कि हम भूल गए ख़ुद को वो तब याद आया

मैं जिस को सोचता रहता हूँ क्या है वो आख़िर

मिरे लबों पे जो रहता है उस का नाम है क्या

वो मुज़्तरिब था बहुत मुझ को दरमियाँ कर के

सो पा लिया है उसे ख़ुद को राएगाँ कर के

हमारे काँधे पे इस बार सिर्फ़ आँखें हैं

हमारे काँधे पे इस बार सर नहीं है कोई

एक दिन उस की निगाहों से भी गिर जाएँगे

उस के बख़्शे हुए लम्हों पे बसर करते हुए

तमाम उम्र ब-क़ैद-ए-सफ़र रहा हूँ मैं

तवाफ़ फिर किसी काबे का कर रहा हूँ मैं

वो भी आया उम्र-ए-गुज़िश्ता के मिस्ल ही

हम भी खड़े रहे दर-ओ-दीवार की तरह

मिरे मरने का ग़म तो बे-सबब होगा कि अब के बार

मिरे अंदर तो कोई और पैदा होने वाला है

इक तू ने ही नहीं की जुनूँ की दुकान बंद

सौदा कोई हमारे भी सर में नहीं रहा

तो देखें और किसी को जो वो नहीं मौजूद

तो जाएँ और कहीं उस ने जब पुकारा नहीं

पानियों में खेल कुछ ऐसा भी होना चाहिए था

बीच दरिया में कोई कश्ती डुबोना चाहिए था

मैं तो अब शहर में हूँ और कोई रात गए

चीख़ता रहता है सहरा-ए-बदन के अंदर

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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