Added to your favorites
मिर्ज़ा ग़ालिब की शख़्सियत सिर्फ़ एक महान शायर की नहीं थी, बल्कि उनके अख़लाक़, दोस्तों से मोहब्बत और ग़रीब-परवरी उन्हें एक बेहतरीन इंसान भी बनाते थे।
मिर्ज़ा ग़ालिब की याददाश्त और सुख़न-फ़हमी बेमिसाल थी। वह बिना किसी निजी कुतुब-ख़ाने (पुस्तकालय) के, सिर्फ़ अपनी तेज़ याददाश्त और आलोचनात्मक सूझ-बूझ के बल-बूते पर इल्म और अदब (ज्ञान और साहित्य) के मोती बिखेरते थे।
सख़्त माली परेशानी और तंगी के बा-वुजूद मिर्ज़ा ग़ालिब ने कभी अपनी वज़ादारी (रख-रखाव) और ख़ुद्दारी पर आँच नहीं आने दी, और ज़िंदगी के रोज़मर्रा के कामों को एक ख़ास सलीक़े से गुज़ारा।
नई जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए रेख़्ता न्यूज़ लेटर सब्स्क्राइब कीजिए