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ग़ज़ल की बनावट, उसकी 'रेज़ा-ख़याली' (बिखरे विचारों) और जुड़ाव व निरंतरता की कमी पर कलीमउद्दीन अहमद और अज़मतउल्लाह ख़ाँ की आलोचनाओं का जायज़ा, और ग़ज़ल के बचाव में पूर्वी कला दृष्टिकोण की अहमियत।
मीर तक़ी मीर को 'ख़ुदा-ए-सुख़न' क्यों कहा जाता है? यह ख़िताब महज़ एक तारीफ़ नहीं है, बल्कि शायरी की तमाम अस्नाफ़ (विधाओं ) पर मीर की मुकम्मल महारत का सुबूत है।
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