aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "arab"
तू अरब हो या अजम हो तिरा ला इलाह इल्लालुग़त-ए-ग़रीब जब तक तिरा दिल न दे गवाही
और दो-आतिशा कर देती है आहंग-ए-ग़ज़लहिंदवी लय में नवा-ए-अजमी थोड़ी सी
इस दौर-ए-ना-शनास में हम से अरब-नज़ादलब खोलने लगे तो अजम कर दिए गए
शहर का शहर मिरे हाल से वाक़िफ़ है 'अरीब'तू ही अंजान है अंजान भी ऐसा-वैसा
पिन्हाँ तमाम ज़ुल्मत-ए-कुफ़्र-ओ-सितम हुईतालेअ' जूँही वो मेहर-ए-सिपहर-ए-अरब हुआ
कभी ख़ुदा की परस्तिश कभी सना-ए-बुताँरह-ए-अरब पे कभी जादा-ए-अजम पे चला
फ़न इतना कम क्या है कि इन रोज़ों 'मुसहफ़ी'दिल में इक उन्स रखते हैं शेर-ए-अरब से हम
जंग-ए-अरब में छोड़ गए जब हिमायतीकूफ़ा के इक जवाँ ने मिरी जाँ बचाई थी
उसी का इस्म मुबारक मोहम्मद-ए-अरबीवही शफ़ीअ' है बस रोज़-ए-दार-ओ-गीर अपना
अहल-ए-फ़न अहल-ए-अदब अहल-ए-क़लम कहते रहेबद-ज़बाँ को हम ज़बान-दान-ए-अजम कहते रहे
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