aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "artificial"
किसी झूटी वफ़ा से दिल को बहलाना नहीं आतामुझे घर काग़ज़ी फूलों से महकाना नहीं आता
गालियों की तरह ही लगती हैये जो नक़ली सी मुस्कुराहट है
न आई रास बनावट की ज़िंदगी मुझ कोमैं शहर छोड़ के फिर आ गया हूँ गाँव में
गरेबाँ के बटन सर का दुपट्टा आँख का पर्दातुम्हारी आर्टिफ़िशियल हया में कुछ नहीं रक्खा
शद्दाद ज़र लगा न बनाता बहिश्त कोगर जानता कि होवेगा आबाद आगरा
वेंटीलेटर जिस्म को नक़ली साँसों से भरता थामैं ज़िंदा था इख़राजात के बोझ तले मरता था
मआल-ए-ग़ुंचा-ओ-गुल है मिरी निगाहों मेंमुझे तबस्सुम-ए-काज़िब का हौसला भी नहीं
शब-ए-ख़ल्वत ये कहना बार बार उस का बनावट सेहमें छेड़े तो ग़ारत हो हमें देखे तो अंधा हो
ये लाली और बिंदी 'रीत' क्यों भाते नहीं तुम कोइसी श्रंगार से तो जिस्म औरत का सँवरता है
नए लहजे में तेरे है बनावटतिरा लहजा पुराना चाहती हूँ
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