aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "ashraf"
अस्लाफ़ के अक़दार को अपनाया है जिस नेपस्ती में रहा फिर भी वो अफ़्लाक हुआ है
किए हुए है फ़रामोश तू जिसे 'बासिर'वही है अस्ल में तेरा मक़ाम तेरी जगह
वो कोई दिल नहीं पत्थर है अस्ल में 'अशरफ़'जो आदमी को मोहब्बत से बे-नियाज़ करे
असरार हक़ीक़त का हो अशआ'र में शारेहक्या हौसला है 'नाज़िम'-ए-आशुफ़्ता-नवा का
ऐ 'असर' इंतिशार है मूरतऔर इंसान इक पुजारी है
आशिक़ को 'मुहिब' सल्तनत-ए-हर-दो-जहाँ हैगर यार के कूचे की मयस्सर हो गदाई
ये कार-ए-इश्क़ था 'अश्फ़ाक़' मुझ से हो नहीं पायामुझे भी शाइ'री में साहिब-ए-एजाज़ होना था
काश ये मेरी शाइ'री 'आरिफ़'उस को मेरा मुरीद कर बैठे
रो'ब उस लफ़्ज़ का रहता है मुसल्लत 'अशहर'बे-नियाज़ी में भी मा'बूद जो मेरा है ज़रूर
ये भी अस्लाफ़ की तहज़ीब है 'अज़हर' मैं यहाँअपना किरदार तमाम अम्न-ए-अमाँ तक देखूँ
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