aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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तिरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अहद बोदाकभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार होता
सर ही अब फोड़िए नदामत मेंनींद आने लगी है फ़ुर्क़त में
और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने मेंमौसमों के आने में मौसमों के जाने में
आख़िरी बुत ख़ुदा न क्यूँ ठहरेबुत-शिकन बुत-गरी को भूल गया
जा के कोहसार से सर मारो कि आवाज़ तो होख़स्ता दीवारों से माथा नहीं फोड़ा करते
उस रात देर तक वो रहा महव-ए-गुफ़्तुगूमसरूफ़ मैं भी कम था फ़राग़त उसे भी थी
दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिएजब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए
बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदनउसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे
न तुम्हें होश रहे और न मुझे होश रहेइस क़दर टूट के चाहो मुझे पागल कर दो
यही दिल था कि तरसता था मरासिम के लिएअब यही तर्क-ए-तअल्लुक़ के बहाने माँगे
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