aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "citizen"
रईस-ए-शहर का ये आली-शान बंगला भीकिसी ग़रीब से छीना हुआ निवाला है
ऐ मेरी फ़ितरत-ए-तरब-आगीं ख़ता-मुआफ़शर्मिंदा हूँ मैं ज़ुल्म के मारों के शहर में
शहरी वतन-ए-अज़ीज़ का हूँलेकिन है शिआ'र अश्क-बारी
खोज में उस की बरसों फिर केचाँद-नगर पहचाना तो है
नाम हो सारे ज़माने में अपने मुल्क कासोचता हर बार है इस वतन का आदमी
है इक बिकाऊ जिंस-ए-सियासत में अब ज़मीरतुम भी लगाओ दाम ख़रीदार मैं भी हूँ
आम सा आदमी हूँ मैं साहिबशेर होता है आम सा मेरा
सिवाए सब्र 'आसी'करूँ क्या आदमी हूँ
मजनूँ हैं हम हमें तो इस शहर से है वहशतशहरी हों और बस्ती सहरा हो और हम हों
जो पड़ोसी हैं वो सब अपने मोहल्ले के हैंकाम आएँगे ये सब इन से झगड़ना छोड़ो
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