aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "coffee"
उदास रातों में तेज़ कॉफ़ी की तल्ख़ियों मेंवो कुछ ज़ियादा ही याद आता है सर्दियों में
दफ़्तर से उठे कैफ़े में गए कुछ शेर कहे कुछ कॉफ़ी पीपूछो जो मआश का 'इंशा'-जी यूँ अपना गुज़ारा होता है
क़हवा-ख़ानों में बसर करता हूँ दिनक़हबा-ख़ानों में सहर करता हूँ मैं
मैं इस डर से कॉफ़ी पीने तेरे साथ नहीं जातातुझ को तो कॉफ़ी के बहाने मुझ से लड़ना होता है
टाँकती फिरती हैं किरनें बादलों की शाल परवो हवा के हाथ में गोटा कनारी दे गया
अब जो बार में तन्हा पीता हूँ कॉफ़ी के नाम पे ज़हरउस की तल्ख़ सी शीरीनी में उस के लब का हिस्सा है
क़लम याद कॉफ़ी भरम चंद पन्नेबस इतने में भी दिन गुज़ारे हुए हैं
उस के रूप की धूप का साया छाँव बिछाते पेड़ों परउस की शोख़ हँसी का चर्चा शहर के क़हवा ख़ानों में
बर्बाद मैं हुआ तो ये बोला अमीर-ए-शहरकॉफ़ी नहीं है इतना, फ़ना ज़ात भी तो हो
सब ही देते हैं जान यूँ 'कैफ़ी'आप क्या ऐसा काम करते हैं
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