aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "development"
ख़राश-ए-नग़्मा से सीना छिला हुआ है मिराफ़ुग़ाँ कि तर्क न की नग़्मा-परवरी मैं ने
ए'तिराफ़-ए-औज का जज़्बा नहीं अहबाब मेंहर तरक़्क़ी पर तरक़्क़ी की दुआ देने लगे
जल्वा-ए-साग़र-ओ-मीना है जो हमरंग-ए-बहाररौनक़ें तुर्फ़ा तरक़्क़ी पे हैं मय-ख़ानों की
ख़त लिख के आज डाक पे पहुँचेंगे यार कोपहुँचाएगा हमारा पयाम-ओ-सलाम ख़त
गर्मी-ए-इश्क़ माने नश्व-ओ-नुमा हुईमैं वो निहाल था कि उगा और जल गया
तरक़्क़ी पर है रोज़-अफ़्ज़ूँ ख़लिश दर्द-ए-मोहब्बत कीजहाँ महसूस होती थी वहाँ मालूम होती है
तरक़्क़ी का वो दा'वा कर रहा हैमगर हर शख़्स फ़ाक़ा कर रहा है
तिरे ही ख़्वान-ए-ने'मत से है सब की परवरिश वर्नाकोई च्यूँटी से हाथी तक खिला सकता है क्या क़ुदरत
है तनज़्ज़ुल कि ज़माने ने तरक़्क़ी की हैकुफ़्र वो कुफ़्र अब इस्लाम वो इस्लाम नहीं
हर इक लीडर का दा'वा है तरक़्क़ी मुल्क ने कर लीवतन में भूक बेकारी तो पहले से भी बढ़ कर है
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