aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "faizi"
परेशाँ दिल हूँ मैं तंहाई से 'मातम' ज़माने मेंन हम-दाैरान-ए-फ़ैज़ी हूँ न हम-अस्र-ए-फ़याज़ी हूँ
फ़ैज़ाबाद से पहुँचा हमें ये फ़ैज़ 'अख़्तर'कि जिगर पर लिए हम दाग़-ए-जिगर जाते हैं
पाया बुलंद क्यूँ न हमारा हो ऐ 'जलील'पाया है फ़ैज़ अमीर-ए-सुख़न दस्तगाह से
'नज़ीर' हूँ वो शराबी ब-फ़ैज़-ए-पीर-ए-मुग़ाँनिगाह डाल दूँ जिस पर वो लड़खड़ा के चले
पहुँचेगा फ़ैज़ जिस से ज़माने को ऐ 'गुहर'इल्म-ओ-हुनर की मैं वो घटा छोड़ जाऊँगा
फ़ैज़ होता है मकीं पर न मकाँ पर नाज़िलहै वही तूर वले शोला-ए-दीदार कहाँ
आगाह हक़ीक़त से न होता कभू 'आसिम'ख़ादिम का अगर फ़ैज़ मदद-गार न होता
'अर्श' क्या तुझ से फ़ैज़ महफ़िल कोतू मिसाल-ए-चराग़ जल न सका
लगाते हैं जो सब आँखों से आब-ए-ज़मज़म को'शरफ़' ये फ़ैज़ का चश्मा मिरी वज़ू से हुआ
वो तो इस के हुक्म से होता है जो भी फ़ैज़ होकीमिया कब है शिफ़ा का माद्दा बाँधे हुए
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