aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "globe"
बस्तियाँ चाँद सितारों की बसाने वालोकुर्रा-ए-अर्ज़ पे बुझते चले जाते हैं चराग़
कुर्रा-ए-अर्ज़ ने देखा ही न था वो ख़ुर्शीदजिस की गर्दिश में शब ओ रोज़ मिरी ज़ात रही
'मीर' आवारा-ए-आलम जो सुना है तू नेख़ाक-आलूदा वो ऐ बाद-ए-सबा मैं ही हूँ
वैसे तो मैं ग्लोब को पढ़ता हूँ रात दिनसच ये है इक फ़्लैट है जिस का मकीं हूँ मैं
जिन्हें सब समझते हैं मेहर ओ मह न हों सिर्फ़ चंद नुक़ूश-ए-पाजिसे कहते हैं कुर्रा-ए-ज़मीं फ़क़त एक संग-ए-सफ़र न हो
अर्श पर आज उतरती है ज़मीनों की वहीकुर्रा-ए-ख़ाक सितारों से मुनव्वर निकला
चश्म-ए-नजम सिपहर झपके हैसदक़े उस अँखड़ियाँ लड़ाने के
अजनबी सोच के आना मिरी मिट्टी की तरफ़कुर्रा-ए-अर्ज़ का हर मुल्क फ़िलिस्तीन नहीं
ख़राबों में अब उन की जुस्तुजू का सिलसिला क्या हैमिरे गर्दूं-शिकार आएँ इधर ऐसा नहीं होगा
पहुँचा फ़लक को फ़क़्र का रुत्बा हुज़ूर-ए-ऐशकम्बल चढ़े हैं चर्ख़-ए-दो-शालों के सामने
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