aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "kar"
इश्क़-बाज़ी में कहा 'जुरअत' को सब ने देख करये अज़ीज़ अपनी हमेशा जान पर खेला किया
'शिबली' समंद-ए-शौक़ को महमेज़ इक लगी'ग़ालिब' की इस ज़मीन को गुल-कार देख कर
जाने क्या गुज़री कि बाहर घर के आ जाने के बा'दफिर किसी सूरत पलट कर घर न दीवाने गए
अहल-ए-मस्नद तुम से मेरा बस यही है इल्तिमासमुफ़लिसों का ख़ून पी कर हुक्मरानी मत करो
किस को रूदाद-ए-ग़म-ए-ज़ीस्त सुनाऊँ जा करबात करने पे भी तय्यार नहीं है कोई
तेरी आँखों में झिलमिलाऊँ कहींसाथ रह कर नज़र न आऊँ कहीं
ग़म-ए-महबूब से बढ़ कर नहीं ग़मयूँ तो हर तरह के ग़म होते हैं
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